रुद्रप्रयाग जिले के उस हरियाली भरे दुर्गम शिखर का विस्मयकारी रहस्य जहाँ आज भी जीवंत है द्वापर युग की महागाथा और सदियों से अडिग है प्रकृति के संरक्षण का एक अनोखा दिव्य विधान

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उत्तराखंड की अनंत वादियों में न जाने कितने ऐसे रहस्य छुपे हैं, जो सदियों से इंसानी चेतना को झकझोरते रहे हैं। देवभूमि के पर्वत शिखरों पर कुछ ऐसा अनकहा और अलौकिक है, जिसे शब्दों में समेटना आसान नहीं है। इसी रहस्यमयी श्रृंखला में रुद्रप्रयाग जिले की अत्यंत दुर्गम और सुरम्य ऊंचाइयों पर बसा एक ऐसा धाम है, जहाँ कदम रखते ही इंसान एक अलग ही दुनिया में प्रवेश कर जाता है। समुद्र तल से लगभग 2850 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह पावन स्थल कोई साधारण स्थान नहीं है, बल्कि यह साक्षात आस्था, प्रकृति के अनुपम सौंदर्य और एक प्राचीन दिव्य विधान का जीवंत केंद्र है, जिसे दुनिया माँ हरियाली देवी के नाम से जानती है। यहाँ की हवाओं में एक अनूठी खामोशी है और उसी खामोशी में छुपा है एक ऐसा सत्य जो आज के आधुनिक समाज को हैरान कर देता है।
इस पावन धाम की उत्पत्ति की कहानी हमें सीधे द्वापर युग के उस अंधकारमय कारागार में ले जाती है, जहाँ कंस की क्रूरता अपने चरम पर थी। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब कंस ने देवकी की आठवीं संतान को पत्थर पर पटककर मारना चाहा, तो वह दिव्य कन्या अचानक उसके हाथों से छूटकर आकाश की ओर उड़ गई। वह साक्षात योगमाया थीं, जिन्होंने कंस को उसकी मृत्यु का संदेश दिया था। कहा जाता है कि आकाश मार्ग से अनंत की ओर जाते समय देवी की पावन भुजाएं इसी दुर्गम पर्वत शिखर पर गिरी थीं। उसी कालखंड से इस ऊंचे पर्वत को हरियाली कांठ कहा जाने लगा और यहाँ माँ हरियाली देवी की पूजा-अर्चना शुरू हुई। स्थानीय समाज माँ को महालक्ष्मी, वैष्णो देवी और बाला त्रिपुरा सुंदरी के विग्रह रूप में पूजता है और मानता है कि इस पूरे क्षेत्र की समृद्धि और खुशहाली माता की इसी दिव्य उपस्थिति के कारण है।
जखोली विकासखंड के जसोली गाँव के ठीक ऊपर स्थित इस धाम तक पहुँचने का मार्ग किसी आध्यात्मिक परीक्षा से कम नहीं है। चारों ओर फैले घने जंगलों, मखमली घास के मैदानों यानी बुग्यालों और हिमालय की चांदी जैसी चमकती बर्फीली चोटियों के बीच से गुजरते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति स्वयं माता के स्वागत में बिछी हुई है। यहाँ की शुद्ध ठंडी हवाएं और एकांत वातावरण किसी भी व्याकुल मन को पल भर में परम शांति से भर देता है। लेकिन इस स्थान का सबसे बड़ा कौतूहल और चमत्कार यहाँ का वह प्राचीन देववन है, जो आज के वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के लिए भी किसी अजूबे से कम नहीं है।
दरअसल इस मंदिर को घेरे हुए जो विशाल जंगल है, उसे लेकर एक बेहद कड़ा और अटूट नियम सदियों से चला आ रहा है। माता के प्रति गहरी श्रद्धा के कारण इस पूरे वन क्षेत्र से एक हरी पत्ती तोड़ना या सूखी लकड़ी उठाना भी पूरी तरह वर्जित माना जाता है। इस कड़े लोक नियम का परिणाम यह है कि यहाँ बांझ, बुरांश और देवदार के सदियों पुराने वृक्ष आज भी पूरी शान से खड़े हैं। इंसानी दखल न होने के कारण यह पूरा जंगल दुर्लभ जड़ी-बूटियों और विलक्षण वन्यजीवों का एक सुरक्षित संसार बन चुका है। पर्यावरण संरक्षण का यह ऐसा अनूठा स्वरूप है जो बिना किसी सरकारी कानून या जुर्माने के, केवल शुद्ध आस्था के बल पर सदियों से अक्षुण्ण बना हुआ है।
इस शांत और रहस्यमयी पर्वत शिखर की खामोशी साल में कुछ विशेष अवसरों पर एक बेहद ऊर्जावान उत्सव में बदल जाती है। नवरात्र, कृष्ण जन्माष्टमी और हरियाली अमावस्या के पावन मौकों पर यहाँ का पूरा परिदृश्य बदल जाता है। माता की दिव्य डोली को जब उनके शीतकालीन प्रवास जसोली गाँव से उठाकर इस ऊंचे पर्वत शिखर पर लाया जाता है, तो पूरा इलाका भक्ति के रस में सराबोर हो उठता है। पारंपरिक ढोल-दमाऊ की गूंज, भंकोरों की गंभीर आवाज और पहाड़ी लोक गीतों की तानों के बीच जब माता की डोली आगे बढ़ती है, तो श्रद्धालुओं की आँखों से श्रद्धा के आंसू छलक पड़ते हैं। प्रकृति और परमात्मा का यह अनूठा संगम न केवल आँखों को सुकून देता है, बल्कि आत्मा को भी एक नई चेतना से भर देता है, जो हमें सिखाता है कि प्रकृति की रक्षा ही वास्तव में ईश्वर की सच्ची आराधना है।