गरुड़ पुराण का अमर संदेश: बाह्य संकटों से रक्षा करता ‘विष्णुपंजर स्तोत्र’ और परम मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता ‘ध्यान-योग’ विशेष आलेख: रमाकान्त पन्त
पौराणिक धरोहर गरुड़ पुराण के आचार काण्ड में भगवान श्रीहरि और देवाधिदेव महादेव के बीच हुआ संवाद मानव जीवन को संकटों से मुक्ति और आत्मिक शांति का मार्ग दिखाने वाला एक पावन मार्गदर्शक है। इस संवाद में भगवान नारायण ने महादेव को संबोधित करते हुए सर्वप्रथम अत्यंत कल्याणकारी ‘विष्णुपंजर स्तोत्र’ का मर्म उद्घाटित किया, जहाँ ‘पंजर’ का अर्थ रक्षक अथवा सुरक्षा कवच बताया गया है। इस दिव्य स्तोत्र में साधक भगवान के विभिन्न मंगलमय स्वरूपों और उनके अमोघ अस्त्र-शस्त्रों का स्मरण करते हुए सभी दिशाओं से अपनी रक्षा की प्रार्थना करता है। पूर्व दिशा से अपनी सुरक्षा का संकल्प लेते हुए साधक उच्चारित करता है—
“नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम्। प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः॥”
अर्थात् हे गोविंद! आपको बारंबार नमस्कार है, आप सुदर्शन चक्र लेकर पूर्व दिशा में मेरी रक्षा करें, हे विष्णो! मैं आपकी शरण में हूँ। इसी भाव के साथ साधक दक्षिण दिशा में कौमोदकी गदाधारी पद्मनाभ, पश्चिम में सौनंद हलधारी पुरुषोत्तम तथा उत्तर दिशा में शातन मूसलधारी जगन्नाथ की शरण लेता है। सुरक्षा का यह विधान केवल मुख्य दिशाओं तक सीमित नहीं है, अपितु जीवन के प्रत्येक संवेदनशील कोण में प्रभु की अस्त्र-शस्त्र युक्त शक्ति का पहरा स्थापित होता है। ईशान कोण में खड्ग और ढाल लिए दैत्यविनाशक प्रभु, अग्निकोण में पाञ्चजन्य शंख व पद्म धारण किए यज्ञवराह, नैर्ऋत्य कोण में सूर्य-चंद्र के समान तेजस्वी खड्गधारी नृसिंह भगवान तथा वायव्य कोण में वैजयंती माला व श्रीवत्स आभूषण से सुशोभित भगवान हयग्रीव रक्षा करते हैं। इसके साथ ही, गरुड़ पर आरूढ़ जनार्दन अंतरिक्ष से और कूर्मराज व महामीन स्वरूप प्रभु पाताल से साधक की रक्षा करते हुए सिर, हाथ और अंगुलियों सहित संपूर्ण शरीर को अपनी दिव्य भुजाओं के सुरक्षा-कवच में आवेष्टित कर लेते हैं।
गरुड़ पुराण इस स्तुति के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक प्रभाव को उजागर करते हुए बताता है कि प्राचीन काल में स्वयं भगवान शंकर ने भगवती ईशानी कात्यायनी की रक्षा के लिए इस विष्णुपंजर स्तोत्र का उपदेश दिया था। इस अमोघ स्तोत्र की शक्ति और फलश्रुति का निरूपण करते हुए ग्रंथ में कहा गया है—
“नाशयामास सा येन चामरं महिषासुरम्॥ दानवं रक्तबीजं च अन्यांश्च सुरकण्टकान्। एतज्जपन्नरो भक्त्या शत्रून् विजयते सदा॥”
इसी स्तोत्र के प्रभाव से देवी कात्यायनी ने स्वयं को अजेय समझने वाले महिषासुर, रक्तबीज तथा देवताओं के लिए कंटक बने अनेक दुर्दांत दानवों का समूल विनाश किया था। शास्त्र का स्पष्ट उद्घोष है कि जो भी मनुष्य भक्तिभाव से इस पावन स्तुति का नित्य पाठ अथवा जप करता है, वह जीवन में अपने समस्त ज्ञात-अज्ञात शत्रुओं और अनिष्टों पर सदा विजय प्राप्त करता है।
बाहरी जगत में इस अभेद्य सुरक्षा का विधान करने के उपरांत, श्रीहरि साधक को आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाते हुए ‘ध्यान-योग’ का गूढ़ रहस्य समझाते हैं। भोग और परम मोक्ष प्रदान करने वाला यह योग साधक के समस्त पापों और विकारों का शमन कर देता है। इस साधना में साधक यह आत्म-साक्षात्कार करता है कि वह नाशवान शरीर मात्र नहीं, बल्कि छह सांसारिक ऊर्मियों—शोक, मोह, बुढ़ापा, मृत्यु, भूख और प्यास—से सर्वथा परे स्थित अविनाशी चेतना है। मन और पंचेंद्रियों में शक्ति रूप से विद्यमान रहते हुए भी वह इंद्रियों के बंधनों से मुक्त, जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का निष्काम साक्षी है। इस प्रकार, विष्णुपंजर के माध्यम से भयमुक्त होकर जब साधक ध्यान-योग की गहराइयों में उतरता है, तब वह अपने भीतर शांत, भयमुक्त और अहंकाररहित सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा की अनुभूति कर परम आनंद को प्राप्त कर लेता है।
मूल पाठ: श्रीविष्णुपञ्जरस्तोत्रम् (संक्षिप्त रूप)
प्रवक्ष्याम्यधुना ह्येतद्वैष्णवं पञ्जरं शुभम्। नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम्॥ प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः। गदां कौमोदकीं गृह्य पद्मनाभ नमोऽस्तु ते॥ याम्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः। हलमादाय सौनन्दं नमस्ते पुरुषोत्तम॥ प्रतीच्यां रक्ष मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः। मुसलं शातनं गृह्य पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम्॥ उत्तरस्यां जगन्नाथ भवन्तं शरणं गतः। खड्गमादाय चर्माथ अस्त्रशस्त्रादिकं हरे॥ नमस्ते रक्ष रक्षोघ्न ऐशान्यां शरणं गतः। पाञ्चजन्यं महाशङ्खमनुघोष्यं च पङ्कजम्॥ प्रगृह्य रक्ष मां विष्णो आग्नेय्यां यज्ञशूकरे। चन्द्रसूर्यं समागृह्य खड्गं चान्द्रमसं तथा॥ नैर्ऋत्यां मां च रक्षस्व दिव्यमूर्ते नृकेसरिन्। वैजयन्तीं सम्प्रगृह्य श्रीवत्सं कण्ठभूषणम्॥ वायव्यां रक्ष मां देव हयग्रीव नमोऽस्तु ते। वैनतेयं समारुह्य त्वन्तरिक्षे जनार्दन॥ मां रक्षस्वाजित सदा नमस्तेऽस्त्वपराजित। विशालाक्षं समारुह्य रक्ष मां त्वं रसातले॥ अकूपार नमस्तुभ्यं महामीन नमोऽस्तु ते। करशीर्षाद्यङ्गुलीषु सत्यं त्वं बाहुपञ्जरम्॥ कृत्वा रक्षस्व मां विष्णो नमस्ते पुरुषोत्तम। एतदुक्तं शङ्कराय वैष्णवं पञ्जरं महत्॥ पुरा रक्षार्थमीशान्याः कात्यायन्या वृषध्वज। नाशयामास सा येन चामरं महिषासुरम्॥ दानवं रक्तबीजं च अन्यांश्च सुरकण्टकान्। एतज्जपन्नरो भक्त्या शत्रून् विजयते सदा॥
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