रहस्यमयी सुरकूट पर्वत की अमर गाथा: जब स्वर्ग छिनने पर कमल-कोश में थर-थर कांपे थे देवराज! जानिए 9995 फीट की ऊंचाई पर स्थित माँ सुरकण्डा के अलौकिक शक्तिपीठ का सम्पूर्ण सत्य

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— विशेष प्रस्तुति: रमाकान्त पन्त

टिहरी गढ़वाल /। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि देवराज इन्द्र, जिनके एक संकेत पर मेघ बरसते हैं और जिनके सम्मुख अप्सराएं नृत्य करती हैं, वे कभी इतने लाचार और भयभीत हो गए थे कि अपनी जान बचाने के लिए उन्हें क्षीरसमुद्र के एक कमल-पुष्प के बीज-कोश में जा छिपना पड़ा था? आखिर क्या था वह भयंकर संकट जिसने स्वर्ग के अधिपति को दर-दर भटकने पर विवश कर दिया? और हिमालय की 9995 फीट की दुर्गम ऊंचाई पर ऐसा कौन सा रहस्य छुपा था, जिसने न केवल इन्द्र का खोया हुआ राज्य लौटाया, बल्कि जहाँ साक्षात् सती के शीश के तेज से यह धरा अमर हो गई?

उत्तराखण्ड के टिहरी गढ़वाल जनपद में चम्बा से मात्र 20 किलोमीटर की दूरी पर सुरकूट पर्वत की चोटी पर स्थित ‘माँ सुरकण्डा देवी’ का दरबार युगों से ऐसे ही अनेक पौराणिक रहस्यों, चमत्कारों और अवर्णनीय आस्था का केंद्र बना हुआ है।

जब स्वर्ग के अधिपति बने शरणार्थी: राजा रजि के 500 पुत्रों का तांडव

स्कन्दपुराण के ‘केदारखण्ड’ में वर्णित गाथा के अनुसार, सतयुग में जब दानवों ने स्वर्ग पर आक्रमण कर देवताओं को पराजित कर दिया था, तब देवराज इन्द्र ने चंद्रवंशी महाबली महाराज रजि की शरण ली थी। महाराज रजि ने अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ 500 वर्षों तक दानवों से भीषण संग्राम किया और समस्त दैत्यों का संहार कर स्वर्ग का राज्य पुनः इन्द्र को सौंप दिया। कृतज्ञ होकर इन्द्र ने महाराज रजि के चरण पकड़ लिए और उन्हें अपना पाँचवाँ पिता घोषित कर दिया।

किन्तु संकट तब उत्पन्न हुआ जब महाराज रजि तपस्या करने हिमालय चले गए। उनके 500 पराक्रमी और दुर्दांत पुत्रों ने इन्द्र से कहा कि “यह स्वर्ग हमारे पिता द्वारा जीता गया है, अतः इस पर हमारा अधिकार है।” इन्द्र के मना करने पर रजिपुत्रों ने अमरावती पर ऐसा विकराल प्रहार किया कि देवता रणभूमि छोड़कर भाग खड़े हुए। भय से कांपते देवराज इन्द्र क्षीरसमुद्र के एक सुनसान द्वीप पर पहुंचे और वहाँ एक विशाल कमल की पंखुड़ियों के भीतर, बीज-कोश (कमल-कोटर) में दुबक कर बैठ गए।

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जब देवगुरु बृहस्पति खोजते हुए वहाँ पहुंचे, तो उन्होंने इन्द्र को पुकारा। कमल के भीतर से इन्द्र की भयभीत वाणी निकली कि वे रजिपुत्रों के डर से बाहर आने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। तब देवगुरु ने उन्हें ढांढस बंधाते हुए जगत के पालनहार भगवान विष्णु की आराधना करने का मार्ग दिखाया।

श्रीहरि का गुप्त उपदेश: “आदिशक्ति के सुरकूट धाम जाओ”

इन्द्र की सहस्रशीर्षा स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान नारायण प्रकट हुए। इन्द्र ने रोते हुए अपना खोया हुआ राज्य और मान-सम्मान वापस मांगा। तब भगवान श्रीहरि ने उन्हें सृष्टि का वह गूढ़ सत्य समझाया, जिसे जानकर बड़े-बड़े ज्ञानी भी चकित रह जाते हैं।

श्रीहरि ने कहा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी जिस महामाया की इच्छा से संसार का सृजन, पालन और संहार करते हैं, वह आदिशक्ति ही तुम्हारा उद्धार कर सकती हैं। भगवान विष्णु ने इन्द्र को केदारमण्डल स्थित सुरकूट पर्वत पर जाने का आदेश देते हुए कहा:

सैव सर्वकरी देवी तां भजस्व भयापहाम्। नारायणीं हिमवतः शुभे केदारमण्डले॥ गङ्गायाः पश्चिमे भागे सर्वदेवैरनुष्ठिते। तत्र सा देवता देवसर्वकामप्रदायिनी॥

(अर्थ: वही पराम्बा देवी सब कुछ करने वाली और समस्त भयों को हरने वाली हैं। हिमालय के परम पवित्र केदारमण्डल में, गंगा के पश्चिम भाग में स्थित उस नारायणी देवी का भजन करो, जो सभी देवताओं द्वारा पूजित हैं और समस्त मनोकामनाओं को सिद्ध करने वाली हैं।)

सुरकूट पर्वत पर इन्द्र की घोर तपस्या और महामाया का प्राकट्य

श्रीहरि का आदेश पाकर इन्द्र सुरकूट पर्वत की ओर चल पड़े। घने अरण्यों, बर्फ से ढकी चोटियों और पावन जलधाराओं के बीच पहुंचकर देवराज ने अन्न-जल त्यागकर कठोर तप आरम्भ किया। इन्द्र ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से जगतजननी की स्तुति में स्तवराज का गायन किया:

नारायणीं नमस्यामि सृष्टिसंहारकारिणीम्। जगदानन्दरूपां तां जगदम्बां नतोस्म्यहम्॥

(अर्थ: सृष्टि का सृजन और संहार करने वाली माँ नारायणी को मैं प्रणाम करता हूँ। संपूर्ण जगत को आनन्द प्रदान करने वाली साक्षात् जगदम्बा के श्रीचरणों में मेरा बारम्बार नमन है।)

इन्द्र की निष्कपट भक्ति से पिघलकर महामाया सुरेश्वरी सहसा अपने विराट रूप में प्रकट हो गईं। उनका तेज करोड़ों सूर्यों की भांति प्रज्वलित था; सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि उनके तीन दिव्य नेत्र थे। सिंह पर सवार, मणियों के हार और दिव्य आयुधों से सुशोभित माँ के उस दिव्य दर्शन को पाकर इन्द्र साष्टांग चरणों में गिर पड़े।

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देवी का अभयदान: निष्कंटक राज्य और वरदानों की वर्षा

माँ सुरेश्वरी ने इन्द्र को उठाया और कहा—”हे देवश्रेष्ठ! भय त्याग दो। मैं तुम्हारे शत्रुओं को कुमार्ग और मोह में डाल दूँगी, जिससे उनका वीर्य व पराक्रम नष्ट हो जाएगा और तुम्हें तुम्हारा निष्कंटक राज्य पुनः प्राप्त होगा।” इसके साथ ही माँ ने इस पर्वत-शिखर को कलियुग के मनुष्यों के लिए वरदान स्थल घोषित किया:

इदं मे परमं पीठं सद्यः प्रत्ययकारकम्। अत्र ये मां देवदेव भजिष्यन्ति महेश्वरीम्॥ अनेन स्तवराजेन त्वत्प्रोक्तेन सुरेश्वर। कृतकृत्यो विधानाद्धि तस्य सर्वं ददाम्यहम्॥

(अर्थ: देवी ने कहा—हे सुरेश्वर! यह मेरा परम गोपनीय शक्तिपीठ तत्काल प्रत्यक्ष फल और विश्वास देने वाला है। जो भी मनुष्य तुम्हारे द्वारा गाए गए इस स्तवराज से यहाँ मेरा विधिपूर्वक पूजन करेगा, वह कृतकृत्य हो जाएगा और मैं उसे मनवांछित सब कुछ प्रदान करूँगी।)

माँ का आशीर्वाद पाकर इन्द्र ने देवसेना को संगठित किया, युद्ध में विजय प्राप्त की और पुनः अमरावती के सिंहासन पर आरूढ़ हुए।

जहाँ गिरा माँ सती का पावन शीश: सुरकण्डा का रहस्य

इस तपोभूमि का दूसरा सिरा दक्ष प्रजापति के उस कनखल (हरिद्वार) यज्ञ से जुड़ा है, जहाँ शिव का अपमान देखकर माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए थे। जब भगवान शिव सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर रखकर वैराग्य व क्रोध में ब्रह्मांड में विचरण करने लगे, तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के अंगों को विभाजित किया।

कहा जाता है कि सुरकूट पर्वत की इसी चोटी पर माँ सती का मस्तक (सिर) गिरा था। इसी कारण इस स्थान का नाम पहले ‘सिरकण्डा’ पड़ा, जो समय के साथ लोकवाणी में ‘सुरकण्डा’ बन गया। 51 शक्तिपीठों में शुमार इस मंदिर के गर्भगृह में माता की पूजा काली स्वरूप में होती है।

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केदारखण्ड में इस पावन धाम का गौरवगान करते हुए महर्षि व्यास लिखते हैं:

शृण्वत्र परमं पीठं सद्यः प्रत्ययकारकम्। गङ्गायाः पश्चिमे भागे सुरकूटगिरिः स्थितः॥ तत्र सुरेश्वरीनाम्नी सर्वसिद्धिप्रदायिनी। यस्याः सन्दर्शनादेव शिवलोके महीयते॥

(अर्थ: हे मुने! गंगा के पश्चिम भाग में सुरकूट पर्वत स्थित है, जो तत्काल फल देने वाला परम पीठ है। वहाँ सर्वसिद्धिप्रदायिनी माँ सुरेश्वरी निवास करती हैं, जिनके केवल दर्शन मात्र से ही मनुष्य शिवलोक में स्थान पाता है।)

वनराजों का गुप्त पहरा और त्रैलोक्य का दुर्लभ धाम

सुरकण्डा धाम केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि एक जीवंत तपोभूमि है। केदारखण्ड के अनुसार, इस पर्वत के चारों ओर विचरण करने वाले सिंह, व्याघ्र, भालू और वनपशु कोई साधारण जीव नहीं, बल्कि देवी के गण हैं, जो दुष्टों और संशयवादियों से इस पीठ की रक्षा करते हैं। मान्यता है कि प्रत्येक मास की अष्टमी, चतुर्दशी और नवमी की मध्यरात्रि को स्वयं देवगण और अप्सराएं यहाँ आकर माँ की स्तुति व नृत्य करते हैं। यहाँ बहने वाली प्रत्येक प्राकृतिक जलधारा गंगा के समान पावन मानी गई है।

शास्त्रों का यह उद्घोष इस पीठ की महत्ता पर अंतिम मुहर लगाता है:

एतत्पीठसमं पीठं त्रैलोक्ये न हि विद्यते। यस्त्वत्र जापी विप्रेश त्रिरात्रं नियतेन्द्रियः। प्राप्नोति परमां सिद्धिं सत्यमेव न संशयः॥

(अर्थ: तीनों लोकों में इस शक्तिपीठ के समान कोई अन्य तीर्थ नहीं है। जो साधक यहाँ इन्द्रियों को वश में रखकर तीन रात्रियों तक जप और ध्यान करता है, वह परम सिद्धि को प्राप्त करता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।)

समुद्रतल से 9995 फीट की ऊंचाई पर बांज और बुरांश के जंगलों से घिरा यह शक्तिपीठ वर्ष के बारहों महीने खुला रहता है। यहाँ मांगी गई मन्नत कभी निष्फल नहीं होती। जो भी भक्त सुरकूट पर्वत की चढ़ाई पूरी कर माँ के चरणों में शीश नवाता है, उसके जीवन से निराशा का अंधकार उसी प्रकार विलीन हो जाता है, जैसे कभी देवराज इन्द्र का संकट दूर हुआ था।

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