महाभारत और रामायण का गुप्त संगम: लंका में कटे कुंभकर्ण के शीश का घटोत्कच की मुक्ति से क्या था रहस्यमयी संबंध? स्कंद पुराण की गाथा

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चम्पावत/लोहाघाट। देवभूमि हिमालय की सुरम्य उपत्यकाओं में स्थित पावन ‘कूर्माचल’ पर्वत मात्र एक पर्वत श्रृंखला नहीं, अपितु त्रेता और द्वापर युग के ऐसे अलौकिक रहस्यों का जीवंत संगम है जो किसी को भी विस्मय में डाल दे। स्कंद पुराण के मानसखंड के तिरसठवें और चौंसठवें अध्याय में वर्णित यह प्रसंग स्तब्ध कर देने वाला है कि किस प्रकार लंका के रणक्षेत्र में भगवान श्रीराम के तीक्ष्ण बाणों से विदीर्ण हुए महाबली कुंभकर्ण के विशाल शीश का सीधा संबंध महाभारत युद्ध के महाबली योद्धा घटोत्कच की भटकती आत्मा के मोक्ष से जुड़ता है।

कूर्माचल पर्वत का दिव्य स्वरूप और मानसरोवर का रहस्य
महर्षि व्यास नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों को बताते हैं कि कूर्माचल पर्वत चकवा, बगुले और मोरों के मधुर कलरव से गूंजने वाला एक सिद्ध तपोवन है। यह शैल-शिखर नाना प्रकार की दिव्य वनस्पतियों, औषधीय लताओं और धातुओं से जगमगाता रहता है। घने वनों, हिंसक वन्यजीवों और अमृतमयी जलधाराओं से घिरी यह भूमि अनादिकाल से सिद्धों, गंधर्वों और ऋषियों की साधना-स्थली रही है। त्रिकालदर्शी मुनियों का मानना है कि इसी पर्वत पर कैलाश मानसरोवर के पावन जल का छोर स्थित है। जब निकुम्भ ने देवाधिदेव महादेव से जिज्ञासा की थी, तब स्वयं भगवान शिव ने इसी पर्वत-शिखर पर मानसरोवर के जल का प्रत्यक्ष दर्शन कराया था।
कुंभकर्ण का सत्रह वर्षों का घोर तप और महादेव का वरदान
स्कंद पुराण के अनुसार, महर्षि पुलस्त्य के पुत्र और लंकाधिपति रावण के अनुज महाबली कुंभकर्ण ने बाल्यकाल में ही अतुलनीय बल प्राप्त कर लिया था। उसने अपनी समस्त इंद्रियों को वश में कर सूखे पत्तों को चबाते हुए और केवल वायु का भक्षण करते हुए पूरे सत्रह वर्षों तक भगवान आशुतोष की कठोर तपस्या की। उसने मदार (आंक) के पुष्पों से महादेव का विधिवत पूजन किया। उसकी अविचल निष्ठा से प्रसन्न होकर जब त्रिनेत्रधारी, वृषभध्वज, चिताभस्मधारी, मस्तक पर चंद्रकला और गले में मुंडमाला धारण किए नीलकंठ भगवान शिव प्रकट हुए, तो कुंभकर्ण हर्ष के आंसुओं से सराबोर होकर नतमस्तक हो गया और उसने ऐसा वरदान मांगा जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ था:
 मा मे शिरस्य पतनं लङ्कायां परमेश्वर।
 यत्र वै पतितं लोके किरीटं मे सकुण्डलम्। तत्स्थलं जलमग्नं वै भूयादिति वृणोम्यहम्॥

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कुंभकर्ण ने प्रार्थना की कि हे देवाधिदेव! मेरी मृत्यु के समय मेरा शीश लंका की अपवित्र भूमि पर न गिरे। कुंडलों और मुकुट सहित मेरा यह मस्तक जिस भी धरातल पर गिरे, वह स्थल सदैव के लिए अगाध जल से परिपूर्ण एक पावन सरोवर में परिवर्तित हो जाए। भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए ‘तथास्तु’ कहा और अंतर्धान हो गए।
श्रीराम का आदेश और पवनपुत्र हनुमान का कूर्माचल गमन
त्रेतायुग के अंत में जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने सुग्रीव की वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई की, तब भीषण संग्राम में प्रभु श्रीराम ने अपने सूर्यसमान तेजस्वी बाणों से कुंभकर्ण के मस्तक को धड़ से अलग कर दिया। भगवान शिव के वरदान का स्मरण करते हुए श्रीराम ने वानरश्रेष्ठ हनुमान को अपने समीप बुलाया और आज्ञा दी:
 तस्मात् कूर्माचलं शुद्धं चास्य मौलिं दुरासदम्।
प्रापयस्व महाभाग कृत्वा वामकरे शुभे॥

श्रीराम ने कहा कि हे पवनपुत्र! इस राक्षस का शीश लंका में नहीं गिर सकता। इसे अपने बाएं हाथ में धारण कर अति पवित्र कूर्माचल पर्वत पर ले जाओ। वहां घोर दानवों का वास है; जब तुम इस शीश को वहां रखोगे, तो यह अपने भार और जलमग्नता से उन असुरों को डुबो देगा।
आज्ञा पाकर हनुमान जी ने एक योजन (लगभग आठ मील) के विस्तार वाले उस कुंडल-मुकुटधारी पर्वताकार मस्तक को अपने बाएं हाथ में उठाया और वायुवेग से उड़कर कूर्माचल के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित कर दिया। मस्तक के गिरते ही शिव-कृपा से वह स्थान एक विशाल, अथाह सरोवर में बदल गया, जिससे वहां के उत्पाती दानव जलमग्न हो गए और कुंभकर्ण को परम शांति प्राप्त हुई। इसके पश्चात हनुमान जी प्रसन्नचित्त होकर लंका लौट आए।
द्वापर में घटोत्कच का स्वप्न और पांडवों का महाप्रस्थान
कालचक्र आगे बढ़ा और द्वापर युग में कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत का महाविनाशकारी युद्ध हुआ। हिडिम्बा के गर्भ से जन्मे और दस हजार हाथियों का अतुल बल रखने वाले घटोत्कच ने लगातार पंद्रह दिनों तक पांडव सेना का नेतृत्व करते हुए कौरवों की विशाल वाहिनी को तहस-नहस कर दिया। अंततः कर्ण ने अपनी अमोघ शक्ति का संधान कर घटोत्कच को वीरगति प्रदान की।
युद्ध समाप्ति और धर्मराज युधिष्ठिर के हस्तिनापुर के सिंहासन पर आरूढ़ होने के बाद, एक रात्रि घटोत्कच ने बालक रूप में पिता भीमसेन के स्वप्न में आकर दर्शन दिए। वह मायावी अस्त्र-शस्त्रों से क्रीड़ा कर रहा था। जब भीम ने भावुक होकर उसे गले लगाया और पूछा कि तुम कहां रहते हो, तो घटोत्कच ने रुंधे कंठ से कहा कि हे तात! इस भूमंडल पर मेरे निवास के लिए कोई ऐसा पवित्र और जल से युक्त स्थान नहीं मिल पा रहा है जो साधारण मनुष्यों के लिए अगम्य हो। मुझे कोई ऐसा पावन तीर्थ प्रदान करें जहां मैं अपने अनुचरों के साथ शांतिपूर्वक निवास कर सकूं।
स्वप्न टूटते ही भीम व्याकुल होकर मूर्च्छित हो गए। युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल और सहदेव ने शीतल जल और शीतल वायु के उपचार से भीम को होश में लाया। जब भीम ने अपनी व्यथा सुनाई, तब धर्मराज युधिष्ठिर और पांडवों ने स्मरण किया कि त्रेतायुग में श्रीराम के समय हनुमान जी द्वारा कूर्माचल पर्वत पर स्थापित कुंभकर्ण का शीश आज भी सरोवर रूप में विद्यमान है। पांडवों ने निश्चय किया कि वे उस स्थान को विदीर्ण कर घटोत्कच के लिए दिव्य धाम बनाएंगे। प्रभात होते ही, चंद्रमा और तारों के लुप्त होने पर सूर्यदेव की आराधना कर समस्त पांडव कूर्माचल की ओर प्रस्थान कर गए।
भीम की गदा का प्रहार, मां अखिलतारिणी का प्राकट्य और पावन नदियां
कूर्माचल पहुंचकर भीमसेन ने देवाधिदेव ऋषेश्वर महादेव की घोर तपस्या की। महादेव की कृपा से अखिल ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री मां योगमाया ‘अखिलतारिणी’ पृथ्वी का भेदन कर साक्षात प्रकट हुईं। देवी और महादेव का आशीष पाकर भीमसेन ने अपनी विशाल गदा से कुंभकर्ण के प्रस्तरीकृत शीश के गण्डस्थल (कनपटी) पर प्रचंड प्रहार किया।
गदा के आघात से वह विशाल पिंड खंड-खंड हो गया और उससे दो दिव्य जलधाराएं फूट पड़ीं—एक ओर गण्डकी नदी और दूसरी ओर अमृतमयी लोहावती नदी। इन दोनों नदियों के पावन संगम पर भीम ने अपने पुत्र घटोत्कच को स्थापित किया, जिससे उसकी आत्मा को तृप्ति और मोक्ष प्राप्त हुआ। चम्पावत जिला मुख्यालय से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर आज भी स्थापित घटोत्कच मंदिर और पास ही स्थित माता हिडिम्बा का मंदिर भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करने वाला जाग्रत तीर्थ माना जाता है।
कूर्म अवतार की भूमि और ऋषेश्वर महादेव की अमर महिमा
स्कंद पुराण के चौंसठवें अध्याय में महर्षि व्यास इस भूमि के नामकरण का रहस्य बताते हैं:
 यथा कूर्मस्वरूपेण देवदेवो जनार्दनः। तस्थौ चाब्दत्रयं विप्रा महेन्द्राद्यैर्निषेवितः।
 ततः प्रभृति वै विप्राः कूर्मपादाङ्कितो गिरिः। कूर्माचलेति विख्यातो दशयोजनविस्तृतः॥
 
सृष्टि के पालनकर्ता भगवान श्रीहरि जनार्दन ने यहां लगातार तीन वर्षों तक ‘कूर्म’ (कच्छप) रूप धारण कर तपस्या की थी, जहां इंद्र आदि समस्त देवताओं ने उनकी सेवा की। भगवान विष्णु के कूर्म चरणों से अंकित होने के कारण ही दस योजन विस्तृत यह पर्वत ‘कूर्माचल’ कहलाया। पुराणों की मान्यता है कि कूर्माचल के चरणों से निकलने वाली समस्त नदियां साक्षात मां गंगा (जाह्नवी) के समान पापनाशिनी और पुण्यदायिनी हैं।
इसी पावन धरा पर महर्षि वशिष्ठ और सप्तऋषियों ने युगों तक शिव-आराधना की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयं ऋषेश्वर महादेव के ज्योतिर्मय शिवलिंग रूप में स्थापित हुए। किष्किंधा के वानरराज बाली ने भी यहीं शिव साधना कर अतुलनीय बल का वरदान पाया था, जिसकी गवाह आज भी ऐतिहासिक बालेश्वर महादेव का मंदिर देता है।
प्राचीन काल में कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाने वाले शिवभक्त लोहावती नदी में स्नान कर सबसे पहले ऋषेश्वर महादेव के दर्शन करते थे; मान्यता है कि इस मंदिर के एक बार दर्शन करने से मनुष्य को अश्वमेघ यज्ञ के समान अक्षय पुण्य मिलता है।
घने अरण्य से भव्य तीर्थ तक की यात्रा
सदियों तक घने जंगलों के मध्य बारह गांवों के श्रद्धालुओं द्वारा पूजित इस शिवलिंग स्थल को आधुनिक स्वरूप देने का कार्य संतों ने किया। सन् 1960 में 108 श्री बालक बाबा जी ने लोहावती नदी तक उतरने के लिए सीढ़ियों का निर्माण कराया। इसके उपरांत सन् 1970 में श्री श्री 108 बाबा हीरानंद जी महाराज ने जनसहयोग से यहां विशाल धर्मशाला और भव्य मंदिर परिसर की आधारशिला रखी।
आज ऋषेश्वर महादेव के पावन प्रांगण में श्रीराम, लक्ष्मण, मां काली, श्री हनुमान, नवदुर्गा, विघ्नहर्ता गणेश और कालभैरव के मंदिर स्थापित हैं। त्रेता में श्रीराम-हनुमान की लीला, द्वापर में पांडवों-घटोत्कच की मुक्ति और कलियुग में संतों की साधना का साक्षी यह तीर्थ आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।