बिंदुखत्ता से उठी बदलाव की मौन बयार: जमीन भी अपनी, मुफ्त पौधे और सारा मुनाफा भी किसानों का… आखिर क्या है ‘अमृत वाटिका’ का यह अनूठा महामिशन?

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दो बीघा जमीन पर लहलहाएंगे उच्चकोटि के फलों के बगीचे; पर्यावरणविद् डॉ. आशुतोष पन्त की मुहिम से ग्रामीणों की तकदीर बदलने की तैयारी

बिंदुखत्ता (विशेष संवाददाता)। क्या अपनी ही खाली पड़ी जमीन पर बिना किसी बड़े निवेश के हरियाली के साथ-साथ आजीवन आर्थिक समृद्धि का एक नया साम्राज्य खड़ा किया जा सकता है? पहली नजर में यह बात किसी कल्पना जैसी लग सकती है, लेकिन तराई और पर्वतीय अंचल के ग्रामीण अंचलों में एक ऐसा शांत प्रयोग शुरू हुआ है, जो आने वाले समय में किसानी और बागवानी की पूरी तस्वीर बदलने का दम रखता है। इस पूरी योजना का केंद्र बिंदु है— ‘अमृत वाटिका योजना’।

इस योजना के तहत गांवों में किसानों की अपनी निजी भूमि पर उच्चकोटि के फलदार वृक्षों के बगीचे विकसित किए जाने की गुप्त और व्यवस्थित रूपरेखा तैयार की गई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसके लिए किसानों को उत्तम गुणवत्ता के पौधे पूरी तरह निःशुल्क उपलब्ध कराए जा रहे हैं, जबकि उस भूमि पर लगने वाले फलों और उससे होने वाली पूरी आय पर केवल और केवल उसी किसान का एकाधिकार रहेगा।

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शर्त बस एक: दो बीघा जमीन और पेड़ बचाने का पक्का संकल्प

योजना के सूत्रधार, पूर्व जिला आयुर्वेद अधिकारी एवं जाने-माने पर्यावरणविद् डॉ. आशुतोष पन्त के अनुसार, इस योजना का लाभ उठाने के लिए किसान को अपनी कम से कम २ बीघा जमीन फलदार बगीचे के लिए सुरक्षित रखनी होगी।

जमीन का मालिकाना हक पूरी तरह किसान के पास ही रहेगा और फलने-फूलने के बाद पैदावार का सारा लाभ भी उसी परिवार को मिलेगा। योजना की एकमात्र प्राथमिक शर्त यह है कि किसान को अपने इस बगीचे की सुरक्षा के लिए मजबूत तारबाड़ (फेंसिंग) करनी होगी तथा पौधों की नियमित सिंचाई और देखरेख का उत्तरदायित्व पूरी निष्ठा से निभाना होगा। इस रणनीति के पीछे सोच बिल्कुल स्पष्ट है—जब किसान अपनी रुचि और मनोयोग से पौधे लगाएगा, तो वह संतान की भांति उनकी रक्षा भी सुनिश्चित करेगा।

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बिंदुखत्ता से हुआ पहला शंखनाद: रोपे गए १०० पौधे

इस महामिशन के पहले चरण की शुरुआत बिंदुखत्ता क्षेत्र से कर दी गई है। पिछले सप्ताह इस क्षेत्र में १०० उच्चकोटि के फलदार पौधे रोपकर इस योजना की ठोस नींव रखी गई।

इस संवेदनशील और दूरगामी शुरुआत को प्रशासनिक व सामाजिक स्तर पर भी बड़ा संबल मिला है। कार्यक्रम के संचालन में उत्तराखंड शासन के पूर्व अपर सचिव श्री जीवन चंद्र उप्रेती और पूर्व कैप्टन श्री सुंदर सिंह खनका का विशेष सहयोग प्राप्त हुआ। डॉ. आशुतोष पन्त ने इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर दोनों वरिष्ठ विभूतियों के अमूल्य सहयोग के प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया।

आर्थिक संबल के साथ पर्यावरण का अभेद्य सुरक्षा चक्र

अमृत वाटिका केवल वृक्षारोपण का सामान्य अभियान नहीं है, बल्कि यह गांवों को स्वावलंबी बनाने का एक ठोस आर्थिक मॉडल भी है। उच्चकोटि के फलों की पैदावार जहां बाजार में किसानों को निरंतर नकद आमदनी का साधन देगी, वहीं व्यापक स्तर पर लगने वाले ये बगीचे पर्यावरण के गिरते संतुलन को साधने में ढाल का काम करेंगे।

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मानसून विदाई पर, अब अगले सीजन की महा-तैयारी

योजना के अगले कदम पर बात करते हुए डॉ. पन्त ने बताया कि चूंकि अब बरसात का मौसम विदाई की ओर है, इसलिए अब सारा ध्यान अगले वर्ष की अग्रिम कार्ययोजना पर केंद्रित किया जा रहा है। आने वाले साल में बड़े पैमाने पर फलोत्पादन को बढ़ावा देने के लिए पहले से ही रूपरेखा तय कर गांवों का चयन और किसानों का पंजीकरण किया जाएगा, ताकि सही समय पर बड़े स्तर पर ‘अमृत वाटिकाओं’ का विस्तार हो सके और हर गांव अपनी हरियाली व समृद्धि की नई इबारत लिख सके।

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