भूमिका एवं रहस्यमयी पृष्ठभूमि
प्रत्येक वर्ष आषाढ़ माह की पूर्णिमा को जब संपूर्ण भारतवर्ष ‘गुरु पूर्णिमा’ का पावन पर्व मनाता है, तब अधिकांश लोग इसके उस अलौकिक रहस्य से अनभिज्ञ रहते हैं जो युगों पुराने इतिहास की गहराइयों में समाया हुआ है। यह पर्व केवल एक परंपरा नहीं, अपितु सनातन संस्कृति के उस सर्वोच्च जगद्गुरु का अवतरण दिवस है, जिनका जीवन किसी अद्भुत चमत्कार और रहस्य से कम नहीं था। वे कोई और नहीं, अपितु भगवान विष्णु के साक्षात अंशावतार महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी थे। वेदों का चार भागों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में विभाजन करने के कारण ही उन्हें ‘वेदव्यास’ का नाम प्राप्त हुआ। परंतु उनके नाम और ज्ञान से भी अधिक कौतूहल से भरी हुई है उनके जन्म और साधना की वह रहस्यमयी गाथा, जो यमुना के एकांत द्वीप से प्रारंभ होकर हिमालय की बर्फ़ीली चोटियों तक फैली हुई है।
अलौकिक जन्म और तीन महाचमत्कार
महर्षि वेदव्यास जी का जन्म प्राकट्य त्रेता और द्वापर युग के संधिकाल की एक ऐसी घटना है, जो आज भी स्तब्ध कर देती है। उनके पिता ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के पौत्र परम तपस्वी महर्षि पराशर थे और माता सत्यवती (मत्स्यगंधा) थीं। सत्यवती एक निषादराज के घर पली-बढ़ी थीं और यमुना नदी में नौका चलाने का कार्य करती थीं।
जब महर्षि पराशर ने अपने दिव्य ज्ञान से यह जान लिया कि सत्यवती के गर्भ से एक ऐसा अलौकिक पुत्र जन्म लेगा जो संपूर्ण सृष्टि को ज्ञान का आलोक देगा, तब उन्होंने सत्यवती के समक्ष संसर्ग का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव के साथ ही तीन ऐसे अद्वितीय चमत्कार घटित हुए जिन्होंने नियति को बदल दिया:
प्रथम चमत्कार: जब सत्यवती ने दिन के उजाले और लोक-लज्जा का संकोच व्यक्त किया, तब महर्षि पराशर ने अपने तपोबल से चिलचिलाती धूप में अचानक एक अत्यंत घना और अलौकिक कोहरा (कुहासा) उत्पन्न कर दिया, जिससे संपूर्ण यमुना क्षेत्र में अंधकार छा गया।
द्वितीय चमत्कार: सत्यवती के शरीर से जन्म से ही मछली की तीव्र दुर्गंध आती थी, जिसके कारण उन्हें ‘मत्स्यगंधा’ कहा जाता था। महर्षि पराशर ने अपने तपोबल से उस दुर्गंध को मिटाकर उन्हें ऐसा दिव्य आशीर्वाद दिया कि उनके शरीर से निकलने वाली सुगंध कई किलोमीटर दूर तक महकने लगी और वे ‘योजनगंधा’ नाम से प्रसिद्ध हुईं।
तृतीय चमत्कार: महर्षि ने माता सत्यवती को अक्षत कौमार्य का वरदान दिया, जिससे पुत्र जन्मोपरांत भी उनकी पवित्रता अक्षुण्ण रही।
तत्पश्चात यमुना नदी के मध्य स्थित एक अत्यंत एकांत और निर्जन द्वीप पर दिव्य बालक का प्राकट्य हुआ। सांवले वर्ण और द्वीप (द्वैप) पर जन्म लेने के कारण उनका नाम ‘कृष्णद्वैपायन’ पड़ा। जन्म लेते ही उस बालक ने मानवीय इतिहास का सबसे बड़ा आश्चर्य दिखाया—वे अपनी योगमाया से तत्काल एक वयस्क, परमज्ञानी और तपस्वी ऋषि के रूप में परिवर्तित हो गए। अपनी माता को वचन देकर कि संकट के समय स्मरण करने पर वे तुरंत उपस्थित होंगे, वे ज्ञान और साधना हेतु सीधे हिमालय के बीहड़ क्षेत्रों की ओर प्रस्थान कर गए।
अष्टादश महापुराणों एवं कालजयी ग्रंथों की रचना
मानव समाज को धर्म, नीति, ज्ञान और मोक्ष का सुगम मार्ग दिखाने के लिए महर्षि वेदव्यास जी ने विशाल साहित्य का सृजन किया। उन्होंने वेदों के गूढ़ अर्थ को कथाओं के माध्यम से समझाने हेतु कुल 18 महापुराणों की रचना की। इसके साथ ही उन्होंने 18 उपपुराणों का भी संपादन किया।
महर्षि व्यास द्वारा रचित 18 महापुराण निम्नलिखित हैं:
1. ब्रह्म पुराण
2. पद्म पुराण
3. विष्णु पुराण
4. शिव पुराण (अथवा वायु पुराण)
5. श्रीमद्भागवत पुराण
6. नारद पुराण
7. मार्कंडेय पुराण
8. अग्नि पुराण
9. भविष्य पुराण
10. ब्रह्मवैवर्त पुराण
11. लिंग पुराण
12. वराह पुराण
13. स्कंद पुराण
14. वामन पुराण
15. कूर्म पुराण
16. मत्स्य पुराण
17. गरुड़ पुराण
18. ब्रह्मांड पुराण
महापुराणों के अतिरिक्त उन्होंने विश्व के सबसे विशाल महाकाव्य ‘महाभारत’ (जय संहिता), अमर आध्यात्मिक उपदेश ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ और वेदांत दर्शन के आधार स्तंभ ‘ब्रह्मसूत्र’ की रचना करके संपूर्ण मानव जाति को ऋणी बना दिया।
हिमालय की पावन कंदराओं में व्यास जी की तपोभूमियाँ
ज्ञान के इस अटूट भंडार को सिद्ध करने और दिव्य ऊर्जा प्राप्त करने के लिए महर्षि वेदव्यास जी ने संपूर्ण हिमालय पर्वतमाला को अपनी साधना का केंद्र बनाया। हिमालय की विभिन्न कंदराओं और पावन नदियों के तटों पर उनकी तपस्या के पदचिह्न आज भी विद्यमान हैं:
1. माणा और बद्रीनाथ की व्यास गुफा (उत्तराखंड): उत्तराखंड के चमोली जिले में बद्रीनाथ धाम के पास स्थित भारत के सीमांत गाँव माणा में अलकनंदा और सरस्वती नदी के पावन संगम के पास ऐतिहासिक ‘व्यास गुफा’ स्थित है। इसी पवित्र गुफा में रहकर महर्षि व्यास ने कठोर साधना की थी और महाभारत का गान किया था, जिसे भगवान श्री गणेश जी ने लिपिबद्ध किया। यहाँ की शिलाएं आज भी ग्रंथ के पन्नों (व्यास पोथी) की तरह प्रतीत होती हैं।
2. व्यास घाटी एवं काली नदी का तट (पिथौरागढ़, उत्तराखंड): कुमाऊँ क्षेत्र में स्थित व्यास घाटी महर्षि की अत्यंत प्रिय साधना स्थली रही। कैलाश-मानसरोवर मार्ग और ॐ पर्वत के समीप गुंजी तथा कालापानी क्षेत्रों में उन्होंने दीर्घकाल तक गहन ध्यान लगाया था।
3. उत्तरकाशी का भागीरथी तट (उत्तराखंड): केदारखंड में भागीरथी (गंगा) के पावन तट पर बसा उत्तरकाशी क्षेत्र महर्षि व्यास की तपोभूमि रहा, जहाँ उन्होंने अनेक ऋषियों-मुनियों को वेदों का गूढ़ ज्ञान प्रदान किया।
4. व्यास कुंड एवं ब्यास नदी का उद्गम (हिमाचल प्रदेश): हिमाचल के कुल्लू-मनाली क्षेत्र में रोहतांग दर्रे के पास स्थित ‘व्यास कुंड’ वह सिद्ध स्थल है जहाँ महर्षि ने बर्फ़ीले वातावरण में वर्षों तक समाधि लगाई थी। इसी कुंड से निकलने वाली पावन नदी को उनके नाम पर ‘विपाशा’ या ‘ब्यास’ नदी कहा गया।
5. व्यास नगर एवं मंडी क्षेत्र (हिमाचल प्रदेश): हिमाचल प्रदेश का ऐतिहासिक मंडी नगर प्राचीन समय में ‘व्यास नगर’ के नाम से जाना जाता था, जहाँ व्यास नदी के किनारे स्थित गुफाओं में महर्षि ने एकांत साधना की थी।
5. गुरु पूर्णिमा का शाश्वत संदेश
इस प्रकार, यमुना के रहस्यमयी द्वीप पर अवतरित होकर हिमालय की गगनचुंबी चोटियों को अपनी तपस्या से पवित्र करने वाले महर्षि वेदव्यास जी केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, अपितु ज्ञान के अमर पुंज हैं। आषाढ़ पूर्णिमा यानी ‘गुरु पूर्णिमा’ वस्तुतः ‘व्यास पूर्णिमा’ ही है, जो हमें उस महान जगद्गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की सीख देती है। उनका जीवन, उनके द्वारा रचित 18 पुराण और महाभारत आज भी अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।
@# रमाकान्त पन्त@#
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