विशेष आलेख: राजेन्द्र पन्त ‘रमाकान्त’
बिंदुखत्ता (नैनीताल)। देवात्मा हिमालय के उत्तुंग हिमाच्छादित शिखरों के आंचल में जब भाद्रपद मास की ठंडी हवाएं बहती हैं, तो समूचे उत्तराखंड का लोकमानस एक अनिर्वचनीय भावुकता और रोमांच से भर उठता है। बिंदुखत्ता सहित राज्य के अनेक क्षेत्रों में मां नंदा के पावन मेलों और जागरों की गूंज शुरू हो चुकी है। यह केवल एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मायके (मैत) आई हिमालय की लाडली बेटी ‘नंदा’ के प्रति अगाध वात्सल्य, विरह और आस्था की वह विराट अभिव्यक्ति है, जिसकी स्मृतियां जनमानस के दिलों में पूरे बारह वर्षों तक अमिट और ताजा बनी रहती हैं।
280 किलोमीटर की बीहड़, पथरीली और बर्फीली पगडंडियों पर चलने वाली ‘श्री नंदा देवी राजजात’ को विश्व की सबसे लंबी, दुर्गम और रोमांचकारी पैदल धर्मयात्रा माना जाता है। इतिहास, लोक-मान्यता और तंत्र के ऐसे अद्भुत रहस्यों का संगम शायद ही कहीं और देखने को मिले, जहां एक चार सींगों वाला मेढ़ा (चौसिंगिया खाडू) बिना किसी रस्सी के हजारों पदयात्रियों का नेतृत्व करता है और 16,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित रहस्यमयी ‘रूपकुंड’ सदियों पुराने कंकालों के साए में अतीत की गवाही देता है।
नाम-महिमा: ‘न’ अक्षर से गुंजायमान भगवती के अनंत अलौकिक स्वरूप
मां भगवती नंदा की महिमा अपरंपार है। शास्त्र और पुराण गवाही देते हैं कि अनन्त नामों से चराचर जगत का कल्याण करने वाली मां नंदा ही भगवान नीलकंठ महादेव की परम आश्रयरूपा हैं। हिमालयी भूमि में मां नंदा के अनेक सिद्ध पावन पीठ विद्यमान हैं, जिनके दर्शन मात्र से मानव समस्त पापों से मुक्त हो जाता है—’’दर्शनमात्रेण पापहीनों भवेन्नर’’।
सिद्धि और ऐश्वर्य की कामना रखने वाले साधक भगवती के दिव्य नामों की स्तुति करते हैं:
’’नन्दा, नन्दप्रिया, निद्रा, नृनुता नन्दनात्मिका! नर्मदा नलिनी नीला नीलकण्ठ समाश्रया !!’’
भगवती नंदा के पावन नामों का विस्तार साधक को परम चेतना से जोड़ता है। वे नन्दा (आनंददायिनी), नन्दप्रिया, निद्रा, नृनुता (मनुष्यों द्वारा स्तुत), नन्दनात्मिका, नर्मदा, नलिनी, नीला, नीलकण्ठसमाश्रया, नारायणप्रिया, नित्या, निर्मला, निर्गुणा, निधिः, निराधरा, निरूपमा, नित्यशुद्धा, निरंजना, नादबिन्दुकलात्मिका, नृसिंहरूपा, नगधरा (पर्वत को धारण करने वाली), नृपनागविभूषिता, नरकक्लेशशमनी (नरक के कष्टों का शमन करने वाली), निरविघ्ना, निराकारा, नारदप्रियकारिणी, नानाज्योतिसमाख्याता, निधिदा, निर्मलात्मिका, नवसूत्रधरा, नीतिः, नन्दजा, नवनीतप्रिया, नीलग्रीवा, निशीश्वरी, निशुम्भघ्नी (निशुंभ का वध करने वाली), नागलोकनिवासिनी, नन्दनवन में विहार करने वाली, माता पार्वती, पावनी, पुण्या और परमज्योति सहित अनंत रूपों में पूजित हैं।
सनातन काल से इन पीठों के प्रति गहन आस्था है। जहां भगवती प्रयागराज में ललिता देवी, गया में मंगला, त्रिकूट में रुद्रसुन्दरी, विंध्याचल में विंध्यवासिनी, वैद्यनाथ धाम में आरोग्या और महाकाल उज्जैन में महेश्वरी के रूप में पूजित हैं, वहीं देवात्मा हिमालय के आंगन में वे ‘भगवती नंदा’ के नाम से परम वंदनीय हैं।
सनातन पुराणों के साक्ष्य: मुक्ति क्षेत्र और नंदा का प्राकट्य
पुराणों ने हिमालय के इन सिद्धपीठों को प्रत्यक्ष ज्ञान स्वरूप और मोक्ष का द्वार माना है। स्कंद पुराण के ‘मानसखंड’ और ‘केदारखंड’ में इन्हें ’’इमानि मुक्तिक्षेत्राणि’’ कहकर मनुष्य को इनका आश्रय लेने का निर्देश दिया गया है। पुराणों का स्पष्ट उद्घोष है:
’’य एवं कुरुते यात्रां श्री नन्दा देव्याः प्रीतमानसः! सहस्रकल्प पर्यन्तं ब्रह्मलोके महतरे!!’’ (अर्थात, जो मनुष्य मां नंदा देवी के सिद्धपीठों की प्रसन्न और शुद्ध मन से यात्रा करता है, उसके पितर हजार कल्पों तक महतर ब्रह्मलोक में आदरपूर्वक निवास करते हैं।)
- मार्कंडेय पुराण (दुर्गा सप्तशती): दुर्गा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय (नारायणी स्तुति) में देवी अपने नंदा अवतार की भविष्यवाणी करते हुए कहती हैं:
ततश्चाहं करिष्यामि नन्दगोपगृहे वपुः। नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा। ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी॥ पहाड़ के जागरों में भी यही गूंजता है कि कंस के हाथों से छूटकर जो योगमाया आकाश में विलीन हुई, वही हिमवंत और मैना की पुत्री नंदा के रूप में अवतरित हुईं।
- श्रीमद्देवीभागवत एवं कालिका पुराण: देवीभागवत के शक्तिपीठ प्रसंग में और कालिका पुराण में भाद्रपद शुक्ल अष्टमी (नंदाष्टमी) के दिन नंदा के विशिष्ट पूजन-अर्चन और जात (यात्रा) का स्पष्ट विधान मिलता है।
कुमाऊं और गढ़वाल का अखंड सेतु: कुलदेवी ‘राजराजेश्वरी’ से घर की ‘ध्याणी’ तक
लोक इतिहास के अनुसार, मां नंदा गढ़वाल के पंवार राजाओं के साथ-साथ कुमाऊं के कत्युरी राजवंश की भी कुल ईष्टदेवी रही हैं। ईष्टदेवी होने के कारण उन्हें ‘राजराजेश्वरी’ कहा जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार ई.टी. एटकिंसन ने अपने ग्रंथ ‘द हिमालयन गजेटियर’ में हर बारहवें वर्ष आयोजित होने वाली इस राजजात का विस्तार से वर्णन किया है।
धार्मिक रूप से नंदा पूरे प्रदेश को एकता के सूत्र में पिरोती हैं। लोकगाथाओं में कहीं वे दक्ष प्रजापति की कन्या हैं, कहीं ऋषि हिमवंत व मैना की पुत्री, तो कहीं चांदपुर गढ़ के राजा भानुप्रताप की कन्या। परंतु लोक-हृदय में वे सबसे बढ़कर हिमालय की विवाहिता बेटी (‘ध्याणी’) हैं। मान्यता है कि एक बार नंदा मायके आईं और मायके के अगाध मोह में 12 वर्षों तक यहीं रह गईं। 12 वर्ष बाद जब उन्हें ससुराल (सौरास) यानी देवाधिदेव महादेव के निवास कैलाश पर्वत विदा किया गया, तो मायके वाले रो पड़े। वही वियोग और सस्नेह विदाई की रस्म हर बारहवें वर्ष ‘राजजात’ के रूप में जीवंत होती है।
कुमाऊं में भाद्रपद शुक्ल प्रतिपदा से ही मंदिरों और घरों में नंदा के जागर (मित्तलीपाती) गूंजने लगते हैं। जागरी डमरू और थाली की थाप पर करुण, वात्सल्य और भक्ति रस से ओत-प्रोत गाथाएं गाते हैं। अष्टमी को नंदाष्टमी का मेला लगता है। अल्मोड़ा और नैनीताल में कदली (केले के पेड़) के तनों से नंदा-सुनंदा की भव्य प्रतिमाएं बनाई जाती हैं—जो पूरे भारत में केवल कुमाऊं की विशिष्ट परंपरा है—और अंततः नैनी झील में विसर्जित की जाती हैं। वहीं, गरुड़ के कोट भ्रामरी मंदिर में नंदा देवी का अवतरण स्त्री के बजाय एक पुरुष (डंगरिया) के शरीर में होना उपासना का एक विस्मयकारी रहस्य है।
चौसिंगिया खाडू: प्रकृति का अविश्वसनीय चमत्कार
राजजात का सबसे बड़ा कौतुक और अलौकिक रहस्य है—चार सींगों वाले मेढ़े (चौसिंगिया खाडू) का जन्म। जिस वर्ष यात्रा होनी होती है, चमोली जनपद के कांसुवा गांव के ग्रामीण वसंत पंचमी के दिन मनौती मांगते हैं।
मान्यता है कि राजजात के वर्ष में चार सींगों वाला खाडू स्वतः जन्म लेता है। जिस गौशाला में इसका जन्म होता है, वहां उसी दिन से बाघ या हिंसक वन्यजीव पहरा देने लगते हैं, परंतु खाडू को छूते तक नहीं। जब तक पशुपालक उसे राजजात को समर्पित करने की मनौती नहीं रखता, तब तक बाघ का आना जारी रहता है; मनौती रखते ही वह भय समाप्त हो जाता है।
यात्रा की तिथि पर कांसुवा के राजवंशी कुंवर इस चौसिंगिया खाडू और रिंगाल की पवित्र छतोली को नौटी गांव के राजगुरु नौटियालों को सौंपते हैं। खाडू की पीठ पर ऊन के दो मुंहे झोले में देवी के आभूषण, वस्त्र और कलेवा सजा दिए जाते हैं। हजारों की भीड़, गाजे-बाजे और संकरे रास्तों के बीच यह खाडू बिना किसी रस्सी के सबसे आगे-आगे चलकर पूरी यात्रा का मार्गदर्शन करता है। रात में भी यह छतोली के पास ही विश्राम करता है।
नौटी से वाण: भूमिगत यंत्रों और लाटू देवता की साधना
यात्रा का शुभारंभ समुद्र तल से 1,650 मीटर ऊंचे नौटी गांव से होता है। नौटी की विशेषता यह है कि यहां नंदा देवी का कोई दृश्य मंदिर नहीं है; नौवीं शताब्दी में राजा शालिपाल ने देवी के सिद्ध ‘श्रीयंत्र’ को यहीं भूमिगत स्थापित कराया था। नौटी से कांसुवा, चांदपुर गढ़ी (जहां राजपरिवार पूजा करता है) होते हुए यह कारवां आगे बढ़ता है।
- कुलसारी का मध्यरात्रि अनुष्ठान: कुलसारी के काली मंदिर में स्थापित भूमिगत काली यंत्र को केवल राजजात की अमावस्या की आधी रात को बाहर निकाला जाता है, तांत्रिक विधान से पूजा होती है और फिर अगले 12 वर्षों के लिए भूमिगत कर दिया जाता है।
- नंदकेसरी और कुरुड़: नंदकेसरी में कुरुड़ की नंदा देवी की डोली यात्रा में शामिल होती है।
- वाण गांव और लाटू देवता: वाण यात्रा का 12वां पड़ाव और अंतिम मानव बस्ती है। यहां मां नंदा के धर्मभाई ‘लाटू देवता’ का प्रसिद्ध मंदिर है। लाटू के मंदिर के कपाट केवल राजजात के समय 12 वर्ष में एक बार खुलते हैं। नौटियाल पुजारी भी आंखों और मुंह पर पट्टी बांधकर गर्भग्रह में पूजा करते हैं, क्योंकि मान्यता है कि वहां नागराज का साक्षात वास है।
पातर नौचणियां और रूपकुंड के 800 साल पुराने नरकंकाल
वाण गांव और रिणकीधार से आगे कदम रखते ही यात्रा अत्यंत कठोर और निषेधात्मक हो जाती है। यहां से चमड़े की वस्तुएं (जूते, बेल्ट), गाजे-बाजे, तामसिक आहार और स्त्रियों व बच्चों का आगे जाना पूर्णतः वर्जित हो जाता है।
यात्री नंगे पांव गैरोली पाताल होते हुए 3,354 मीटर ऊंचे बेदिनी बुग्याल पहुंचते हैं, जहां हरी मखमली घास का संसार और वैतरणी कुंड स्थित है।
- पातर नौचणियां (नर्तकियों का पाषाण बनना): बेदिनी से 10 किमी आगे पातर नौचणियां है। लोककथा के अनुसार, कन्नौज के राजा जसधवल (यशोधवल) अपनी गर्भवती रानी वल्लभा और नर्तकियों को लेकर यात्रा के नियमों को तोड़ते हुए यहां पहुंचे थे। घमंड में चूर राजा ने यहां नर्तकियों का नाच करवाया। मर्यादा टूटने पर कुपित भगवती ने सभी नर्तकियों को पत्थर बना दिया। आज भी वहां शिलाओं के गोल घेरे देखे जा सकते हैं।
- रूपकुंड का कंकाल रहस्य (4,061 मीटर): आगे कैलुआ विनायक, बगुवाबासा और चिड़ियानाग होते हुए यात्रा रूपकुंड पहुंचती है। लगभग 16,000 फीट पर स्थित इस बर्फीले कुंड में सैकड़ों मानव कंकाल, खोपड़ियां, लोहे के त्रिशूल, रुद्राक्ष और प्राचीन आभूषण बिखरे पड़े हैं। रेडियो कार्बन डेटिंग इन कंकालों को लगभग 600 से 800 वर्ष पुराना बताती है। माना जाता है कि राजा जसधवल का दल नर्तकियों के पत्थर बनने पर भी नहीं चेता और रूपकुंड के समीप भयंकर आकाशीय आपदा (हिम-तूफान व बड़े ओलों) का शिकार होकर काल-कवलित हो गया। राजजात में नौटियाल ब्राह्मण आज भी रूपकुंड के तट पर कुंवरों के हाथों उनके पितरों का तर्पण करवाते हैं।
होमकुंड में अंतिम विदाई: जब अश्रुपूरित होकर अकेला निकल पड़ता है खाडू
रूपकुंड से आगे समुद्र शिला और ‘ज्यूंगरालीधार’ (लगभग 18,000 फीट) की जानलेवा बर्फीली चढ़ाई पार कर भाद्रपद मास की नवमी को यात्रा होमकुंड पहुंचती है। त्रिशूल पर्वत की तलहटी में स्थित होमकुंड इस महायात्रा का अंतिम पड़ाव है।
यहां हवनकुंड में वैदिक पूजा-अर्चना संपन्न होती है। इसके बाद जो दृश्य उपस्थित होता है, वह पाषाण हृदय को भी पिघला देता है। चौसिंगिया खाडू की पीठ पर बंधी देवी की पोटली को अंतिम बार छुआ जाता है। पूजा समाप्त होते ही वह चार सींगों वाला खाडू अचानक मुड़ता है और जनसमूह को पीछे छोड़कर हिमाच्छादित त्रिशूल पर्वत की दुर्गम, निर्जन ऊंचाइयों की ओर अकेला दौड़ पड़ता है।
यात्रियों और मैतियों की आंखों से अश्रुधारा बह निकलती है। लोक-आस्था है कि खाडू देवी के उपहारों को लेकर सीधे भगवान शिव के धाम कैलाश पहुंच जाता है। इसके बाद नम आंखों से यात्री चंदनिया घाट, सूतोल (जहां धौसिंह देवता का मंदिर है) और रूपगंगा-नंदाकिनी के विहंगम संगम से होते हुए वापस लौटते हैं।
नौटी में महायज्ञ और भोज के साथ राजजात संपन्न होती है। हिमालय की दुर्गम चोटियों में रची-बसी मां नंदा की यह अलौकिक गाथा समस्त पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली और शरणागत की रक्षा करने वाली पराशक्ति को कोटि-कोटि नमन है:
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
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