सुरों की अनकही साधना: माँ अवंतिका के दरबार से उठी वो गूंज, जिसने बदल दी लालकुआँ की फिजा!
बिंदुखत्ता के एक साधारण से आंगन से निकलकर संगीत जगत में विशेष ख्याति पाने वाले संजय सिंह देवली, आखिर क्यों इन दिनों बिना कुछ लिए बांट रहे हैं सुरों का सबसे बड़ा खजाना? जानिए इस अद्भुत साधक की कहानी।
शाम ढलते ही जब लालकुआँ के प्रसिद्ध माँ अवंतिका मंदिर परिसर में घंटियों की आवाज शांत होती है, तब हवाओं में एक ऐसा सुरमयी जादू तैरने लगता है जो राह चलते राहगीरों के कदमों को भी ठिठकने पर मजबूर कर देता है। हारमोनियम की मखमली तान, तबले की सधी हुई थाप और उस पर बिखरते शुद्ध शास्त्रीय सुर… आखिर कौन है वो जो इस पवित्र प्रांगण को सुरों की दिव्य स्थली में तब्दील कर रहा है? यह कोई साधारण रियाज़ नहीं, बल्कि संगीत की वह निश्छल और पावन साधना है, जिसने इन दिनों पूरे क्षेत्र के संगीत प्रेमियों को अपने सम्मोहन में बांध रखा है। इस अलौकिक गूंज के पीछे नाम है संजय सिंह देवली।
बिन्दुखत्ता, इन्द्रानगर द्वितीय निवासी संजय सिंह देवली का संगीत से नाता आज का नहीं, बल्कि पीढ़ियों पुराना है। इनके परिवार में संगीत को महज एक कला नहीं, बल्कि साक्षात पूजनीय और ईश्वर का रूप माना गया है। संजय जी को संगीत विरासत में मिला है। इनके पूज्य पिताजी श्री देव सिंह देवली जी उत्तराखंड के अत्यंत प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध संगीतकार हैं। बचपन में जहां आम बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, वहां संजय जी की सुबह और शाम सुरों के उतार-चढ़ाव और वाद्य यंत्रों के बीच बीती। पिता की इसी उंगली को पकड़कर उन्होंने संगीत की दुनिया में कदम रखा और आज अपनी इसी विरासत को पूरे मनोयोग, अटूट निष्ठा और समर्पण से आगे बढ़ा रहे हैं।
साल 2006 से एक कुशल संगीतज्ञ के रूप में देश-दुनिया में अपनी विशेष पहचान दर्ज कराने वाले संजय सिंह देवली की यह यात्रा कठिन तप और गुरु-शिष्य परंपरा का अनुपम उदाहरण है। बचपन की अभिरुचि को शास्त्रीय गरिमा देने के लिए उन्होंने संगीत के कई प्रकांड विद्वानों के सानिध्य में खुद को तपाया है। उनके प्रारंभिक गुरु श्री सोहन लाल जी ने संजय जी के बाल-मन को तराशा और हारमोनियम की जादुई कुंजियों पर उंगलियां थिरकाना सिखाया। इसके बाद संगीत के प्रकांड विद्वान श्री एल. डी. जोशी जी से संजय जी ने तबला वादन की वो गूढ़ बारीकियां और अनूठी थाप सीखी, जो आज उनके प्रदर्शन को विशिष्ट बनाती है। वहीं सुरों को आवाज देने, सुर साधना और गायन की बारीकियों को आत्मसात कराने का श्रेय डा० निर्मला जोशी को जाता है। इस अनवरत साधना और गुरुओं के आशीर्वाद का ही प्रतिफल है कि संजय जी ने संगीत के क्षेत्र में प्रतिष्ठित प्रभाकर की डिग्री हासिल की।
आज का दौर जहां पूरी तरह व्यावसायिक हो चुका है, जहां हर विधा और हुनर की एक भारी-भरकम कीमत वसूली जाती है, वहीं संजय सिंह देवली माँ अवंतिका मंदिर के प्रांगण में एक अद्वितीय और वंदनीय मिसाल पेश कर रहे हैं। वे यहां आने वाले हर संगीत प्रेमी और जिज्ञासु को पूरी तरह निःशुल्क संगीत की शिक्षा दे रहे हैं। उनका यह प्रयास उन होनहार और साधनहीन बच्चों के लिए किसी ईश्वरीय वरदान से कम नहीं है, जो आर्थिक अभावों के कारण अपने भीतर छिपे कलाकार को मार देते हैं। मंदिर की पावन चौखट पर बैठकर बिना किसी स्वार्थ के सुरों का यह महादान देना, संजय जी के ऊंचे व्यक्तित्व, विशाल हृदय और समाज के प्रति उनके गहरे सरोकार को रेखांकित करता है। उनकी यह निस्वार्थ सेवा वाकई समाज के लिए एक महान प्रेरणा है।
संजय सिंह देवली जी के लिए संगीत केवल मनोरंजन, शौक या आजीविका का साधन नहीं है, वे इसे सीधे ब्रह्म से जुड़ने का मार्ग मानते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि संगीत असल में आत्मिक साधना का विषय है। जब सुर और लय का सच्चा मिलन होता है, तो वह मनुष्य के भीतर सोई हुई चेतना को जगाता है, अंतर्मन में भक्ति का दिव्य जागरण करता है और आत्मा को परमात्मा के समीप ले जाता है। आज माँ अवंतिका के साये में संगीत का विस्तार करने का उनका यह संकल्प आने वाली पीढ़ी के दिलों में लोक-संस्कृति और शास्त्रीय संगीत की जो अलख जगा रहा है, उसकी गूंज आने वाले समय में बहुत दूर तक सुनाई देगी।
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