हल्दूचौड़ का वह अदम्य शिवभक्त जो गोमुख के बीहड़ रास्तों को लांघकर पहुँचा अपने गाँव, जानिए बचपन के एक अनसुने संकल्प से उपजी 31वीं दिव्य साधना का अलौकिक सच!

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हल्दूचौड़ (नैनीताल)
गहन शांति में डूबे दीना गाँव की फिज़ाओं में उस दिन अचानक एक अलौकिक हलचल महसूस होने लगी। सैकड़ों किलोमीटर के दुर्गम, कंटीले और पथरीले रास्तों को लांघकर जब एक निष्ठावान साधक गाँव की सीमा में प्रविष्ट हुआ, तो हर आँख उसे देखने के लिए आतुर हो उठी। कंधे पर पवित्र कांवड़ और हाथों में गोमुख का गंगाजल लिए यह कोई साधारण यात्री नहीं, बल्कि अदम्य शिवभक्ति की मिसाल बन चुके मोहन चन्द्र दुर्गापाल थे, जो महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर अपने जीवन की 31वीं कठिन साधना पूरी कर हल्दूचौड़ लौटे थे।
जैसे ही उन्होंने हल्दूचौड़ क्षेत्र के अपनें गाँव के प्राचीन शिव मंदिर और कहारा महादेव मंदिर में भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक किया, संपूर्ण परिसर ‘हर हर महादेव’ के गगनभेदी उद्घोष से गुंजायमान हो उठा। इस भावुक कर देने वाले पल के साक्षी बने हर श्रद्धालु का हृदय असीम आध्यात्मिक आनंद से भर गया। अपनी इस असाधारण यात्रा के संस्मरण साझा करते हुए श्री दुर्गापाल ने बताया कि भक्ति का यह पावन सफर इस वर्ष 19 जुलाई को शुरू हुआ था, जब वे अपने सहयोगियों के साथ गोमुख के लिए रवाना हुए थे। 21 जुलाई की संध्या को गंगोत्री धाम में प्रभु दर्शन के पश्चात्, 22 जुलाई की पवित्र भोर में उन्होंने गोमुख के पतित-पावनी जल में स्नान किया और विधि-विधान से गंगाजल भरकर अपनी पैदल कांवड़ यात्रा का शुभारंभ किया।
करीब 20 दिनों तक चले इस कठिन तप में उन्होंने भैरव घाटी के संकरे मोड़ों, झाला, लाटा, डुंडा, चम्बा, नरेंद्र नगर के पर्वतीय मार्गों से लेकर हरिद्वार, नगीना, काशीपुर, बाजपुर के टांडा बाबा आश्रम और गुलरभोज जैसे अनगिनत पड़ावों को अपने कदमों से नापा। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और शारीरिक थकान के बावजूद उनके कदम कभी नहीं डगमगाए। मार्ग में उमड़े कांवड़ियों के जनसैलाब, सेवा-शिविरों के सहयोग और वातावरण में फैले भक्ति रस ने उनकी आत्मा को असीम शांति प्रदान की।
लेकिन इस अदम्य साधना के पीछे का असली रहस्य क्या है? श्री दुर्गापाल ने बताया कि इस भक्ति मार्ग का बीजारोपण तब हुआ था जब वे महज कक्षा 8 में पढ़ते थे। हरिद्वार की एक यात्रा के दौरान उनके बाल-मन में कांवड़ लाने का जो दिव्य संकल्प जागा था, उसने आगे चलकर एक अद्वितीय इतिहास रच दिया। आज वे वर्ष में दो बार यह कठोर नियम निभाते हैं। उनके नाम गोमुख से हल्दूचौड़ की 5, हरिद्वार से जागेश्वर की 8, हरिद्वार से काशी की 2 डाक कांवड़, और हरिद्वार से हल्दूचौड़ की 16 यात्राएँ पूर्ण करने का अद्भुत रिकॉर्ड दर्ज है।
हल्दूचौड़ पहुँचने पर परिजनों, शुभचिंतकों और स्थानीय शिवभक्तों ने उन पर पुष्प वर्षा कर इस अमर साधक का भावभीना अभिनंदन किया। जलाभिषेक संपन्न करने के बाद उन्होंने समस्त क्षेत्र की खुशहाली और सुख-समृद्धि की प्रार्थना की। बचपन के एक छोटे से संकल्प से शुरू हुई यह यात्रा आज पूरे हल्दूचौड़ क्षेत्र के लिए लोक-आस्था और ईश्वर-भक्ति का अनुपम प्रतीक बन चुकी है।