परलोक में 5G नेटवर्क: जब तक सौ ‘लाइक्स’ न मिलें, दादाजी को मुक्ति कैसी?

ख़बर शेयर करें

 

— एक व्यंग्यात्मक तर्पण

कलियुग की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने मोक्ष के पुरातन नियमों को संशोधित कर दिया है। पहले पूर्वजों को तृप्त करने के लिए तिल, जौ, कुश और मौन साधना की दरकार होती थी; अब केवल हाई-स्पीड वाई-फाई, एक दुखी इमोजी और चार हैशटैग की आवश्यकता है।

स्वर्ग की सीढ़ियों पर खड़े यमराज भी शायद चकरा गए होंगे कि अचानक इहलोक से आने वाले तर्पण जल के बजाय ‘नोटिफिकेशन’ की शक्ल में क्यों बरस रहे हैं!

तस्वीर पर फिल्टर और निगाहें ‘लाइक्स’ पर

पुण्यतिथि हो या पितृ पक्ष, घर के आधुनिक वारिस तड़के उठकर गंगाजल नहीं तलाशते, बल्कि गैलरी में दादाजी की कोई ऐसी ब्लैक-एंड-व्हाइट तस्वीर ढूंढते हैं, जिस पर ‘रेट्रो फिल्टर’ सबसे ज्यादा जंचे। तस्वीर मिली नहीं कि तुरंत इंस्टाग्राम, फेसबुक और वॉट्सऐप पर प्रसारित कर दी गई—

“मिस यू दादाजी… आपकी यादें हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेंगी! #RestInPeace #FamilyFirst #GrandpaLove (विथ 32 अदर्स)”

तस्वीर ‘पोस्ट’ होते ही असली श्राद्ध कर्म शुरू होता है। अब हर तीन मिनट में स्क्रीन स्क्रॉल की जाती है—“शर्मा जी ने ‘केयर’ वाला रिएक्शन दिया या सिर्फ साधारण लाइक? मौसा जी ने अब तक ‘ओम शांति’ क्यों नहीं कमेंट किया? अरे, केवल 45 लाइक आए, लगता है दादाजी का एल्गोरिदम आज कमजोर चल रहा है!”

जिस पुरखे की जीते-जी पानी की एक घूंट पूछने की फुर्सत किसी को नहीं थी, मरणोपरांत उसकी आत्मा की शांति इस बात पर टिक जाती है कि श्रद्धांजलि वाली पोस्ट पर ‘व्यूज’ का आंकड़ा मिलियन पार हुआ या नहीं।

यह भी पढ़ें 👉  दिखावे से दूर, बिटिया के जन्मदिन पर मानवता की मिसाल: एडवोकेट प्रकाश सनवाल ने 'हीरा एंड टीआर चैरिटेबल ट्रस्ट' को दी ₹21,000 की सहयोग राशि

मुंडेर पर कौआ हैरान, इधर सेल्फी में व्यस्त यजमान

शास्त्र कहते थे कि पितृ पक्ष में छत की मुंडेर पर कौवे को ग्रास दो, गाय को रोटी खिलाओ, किसी भूखे को तृप्त करो। मगर आधुनिक मुंडेर पर कौआ भूखा बैठा सोच रहा है कि यह नई पीढ़ी उसे खीर-पूरी देने के बजाय उसका एंगल सेट करके रील क्यों बना रही है?

थाली सजी है, पर पहले उसका ‘एस्थेटिक शॉट’ लिया जाएगा। कैप्शन लिखा जाएगा—“फीलिंग स्पिरिचुअल विथ पुरखाज”। जब तक कौआ रोटी छूने की जहमत उठाए, तब तक यजमान अगली सोशल मीडिया रील के लिए बैकग्राउंड म्यूजिक चुन चुका होता है। कौआ भूखा उड़ जाए तो गम नहीं, बस कैमरे का फोकस नहीं बिगड़ना चाहिए।

यह भी पढ़ें 👉  दिखावे से दूर, बिटिया के जन्मदिन पर मानवता की मिसाल: एडवोकेट प्रकाश सनवाल ने 'हीरा एंड टीआर चैरिटेबल ट्रस्ट' को दी ₹21,000 की सहयोग राशि

‘बफरिंग’ करता मंत्र और क्यूआर कोड वाला मोक्ष

तकनीकी क्रांति ने पुरोहित वर्ग को भी ‘अपडेट’ कर दिया है। अब मोक्ष ‘क्लाउड’ पर होस्ट हो रहा है। वीडियो कॉल पर पंडित जी आसन जमाए बैठे हैं और स्क्रीन के इस पार यजमान सोफे पर लेटे-लेटे तर्पण कर रहा है।

उधर से आवाज आती है—“यजमान… ॐ पितृभ्यः… (आवाज कट गई)… हेलो, आवाज आ रही है? स्क्रीन फ्रीज हो गई आपकी!” यजमान कहता है—“पंडित जी, दो मिनट रुकिए, वाई-फाई रीस्टार्ट कर रहा हूं, कहीं दादाजी बीच नेटवर्क में न अटक जाएं!”

मंत्र समाप्त होते ही पंडित जी दक्षिणा के लिए स्क्रीन पर क्यूआर कोड चिपका देते हैं। “तुरंत स्कैन कीजिए, तभी पुण्य का इंस्टेंट ट्रांसफर होगा।” पुरखों की मुक्ति अब आस्था का विषय नहीं, बल्कि ऑनलाइन ई-कॉमर्स की ‘एक्सप्रेस डिलीवरी’ बन चुकी है।

एआई का अवतार: परलोक से वीडियो कॉल

गनीमत थी कि बात केवल तस्वीरों तक थी, अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने दिवंगत पुरखों को भी चैन से बैठने नहीं दिया है। डीपफेक तकनीक से परदादा की हिलती-डुलती तस्वीर बनाकर उनसे बुलवाया जा रहा है—“अरे चिंटू, पढ़-लिखकर नाम रोशन करना!”

जो दादाजी जीवन भर अपनी मर्जी से दो शब्द नहीं बोल पाए, उन्हें अब एआई के जरिए परलोक में भी जबरन बुलवाया और नचाया जा रहा है। भय तो इस बात का है कि कहीं आने वाले दिनों में पितृ पक्ष पर पूर्वजों के चैटबॉट न आ जाएं, जो ऑटो-रिप्लाई में लिख रहे हों—“थैंक यू फॉर रिमेंबरिंग मी, कीप शेयरिंग!”

असली तर्पण का सन्नाटा

इस समूचे डिजिटल तमाशे की सबसे कड़वी सच्चाई यही है कि जीते-जी जिस बुजुर्ग की खाट घर के सबसे अंधेरे कोने में पड़ी रही, जिसके अकेलेपन की आवाज दीवारों से टकराकर लौटती रही, मरने के बाद वह परिवार के स्टेटस सिंबल का सबसे बड़ा विज्ञापन बन गया।

यह भी पढ़ें 👉  दिखावे से दूर, बिटिया के जन्मदिन पर मानवता की मिसाल: एडवोकेट प्रकाश सनवाल ने 'हीरा एंड टीआर चैरिटेबल ट्रस्ट' को दी ₹21,000 की सहयोग राशि

पुरखे न फेसबुक की वॉल पर रहते हैं, न उन्हें इंस्टाग्राम के कमेंट्स में शांति मिलती है। वे तो अगली पीढ़ी के आचरण, उसकी वाणी और उसके संस्कारों में सांस लेते हैं। अगर जीवित रहते बुजुर्गों को थोड़ा वक्त, सम्मान और अपनत्व दे दिया जाए, तो मरणोपरांत उनके लिए सोशल मीडिया पर नौटंकी की रत्ती भर जरूरत नहीं पड़ेगी।

ADVERTISEMENTS Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad