कैलाश का वह अदृश्य द्वार जहाँ मृत्यु भी प्रवेश नहीं पा सकती
धारचूला/ यह कथा सनातन चेतना के उस अगाध सागर से अवतरित हुई है, जहाँ जिज्ञासा और ज्ञान का मिलन होता है। प्राचीन काल की बात है, ज्ञान के पिपासु काशिराज के मन में तीर्थों की महिमा जानने की तीव्र उत्कंठा जागृत हुई। उन्होंने आरोग्य के देवता धन्वन्तरि से प्रार्थना की। धन्वन्तरि जी ने परम ज्ञानी व्यास जी के सम्मुख अपने हृदय के भाव रखे कि वे उस पावन सरोवर की महिमा सुनना चाहते हैं जिसके जल का स्पर्श मात्र ही जीवन के समस्त पापों का शमन कर देता है। तब श्रेष्ठ संयमी भगवान दत्तात्रेय ने काशिराज को उस परम गोपनीय संवाद की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त किया, जो कभी देवों के देव महादेव और जगतजननी माता पार्वती के बीच कैलाश के धवल शिखरों पर घटित हुआ था।
कथा के रहस्यमयी पट तब खुलते हैं जब माता पार्वती विस्मित होकर देवाधिदेव शिव से एक अत्यंत गूढ़ प्रश्न पूछती हैं। वे मानसरोवर के शांत और पारदर्शी जल को देखते हुए कौतुक से भर जाती हैं। माता पार्वती के मुख से निकले शब्द संपूर्ण सृष्टि की जिज्ञासा बन जाते हैं। वे पूछती हैं कि हे सर्वेश्वर, भक्तों के दुखों का निवारण करने वाले प्रभु, आपने इस मानसरोवर के शीतल जल में एक स्वर्णहंस का रूप धारण कर अपना निवास क्यों बनाया है? इस जल में ऐसा क्या छिपा है जिसे जानने के लिए ऋषि-मुनि युगों-युगों तक तपस्या करते हैं?
पार्वती जी के इस सहज और सुंदर प्रश्न पर महादेव मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने अपनी अर्धांगिनी को अत्यंत प्रिय शब्दों में संबोधित करते हुए इस रहस्य पर से परदा उठाया। महादेव ने कहा कि हे वरवर्णिनि, सतयुग के प्रारंभ में जब वेद सम्मत तपस्वियों ने घोर तपस्या की, तब उनकी निष्कपट भक्ति से प्रसन्न होकर मैं उनके सम्मुख प्रकट हुआ। उन ऋषियों ने सांसारिक भयों और विघ्न-बाधाओं से रक्षा की गुहार लगाई। अपने भक्तों पर अनंत करुणा की वर्षा करने के लिए ही मैंने उस समय इस दिव्य जल में एक सुनहरे हंस का रूप धारण किया।
शिवजी आगे कहते हैं:
देवदेव महादेव प्रपन्नार्तिहर प्रभो।
भवता मानसजले वासो वै केन हेतुना॥
हे देवी, जो मनुष्य इस मानस क्षेत्र में पवित्र भाव से आते हैं और मुझे इस स्वर्णिम हंस के रूप में देखते हैं, वे केवल साधारण मनुष्य नहीं रह जाते, वे साक्षात देवस्वरूप हो जाते हैं। उनकी चेतना इतनी निर्मल हो जाती है कि वे प्रलय पर्यंत शिवलोक में आनंदपूर्वक निवास करते हैं। लेकिन यह रहस्य सबके लिए सुलभ नहीं है। जो कपटी हैं, चोर हैं, पापी हैं या कुल का विनाश करने वाले हैं, उन्हें मेरे इस दिव्य रूप के दर्शन कभी नहीं होते। इस पावन मानसरोवर में स्नान करने का फल हजारों अश्वमेध यज्ञों के पुण्य से भी बढ़कर है।
अतस्त्वदहं महाभागे भक्तानुग्रहकारणम्।
वसामि मानसक्षेत्रे त्वया सह न संशयः॥
इस दिव्य संवाद में महादेव मानसरोवर की अलौकिक भूगोल का वर्णन करते हुए बताते हैं कि साक्षात भगवान विष्णु और ब्रह्मा भी इस जलमंडल में व्याप्त हैं। महादेव की जटाओं से निकलने वाली पतितपावनी गंगा एक कोमल मृणाल तंतु की भांति सात लोकों को पवित्र करती हुई इसी क्षेत्र से होकर बहती है। मानसरोवर के दक्षिण भाग में साक्षात शंभुगिरि पर्वत विराजमान है, जहाँ अनेक पवित्र शिवलिंग स्थापित हैं। वहीं शेषेश्वर महादेव की गुहा है, जहाँ कपिल आदि श्रेष्ठ मुनि निरंतर तपस्या में लीन रहते हैं।
कथा का प्रवाह आगे बढ़ता है तो हमें देवतीर्थ की महिमा का पता चलता है। यह वह स्थान है जहाँ तैंतीस करोड़ देवताओं ने कठोर तपस्या की थी। इस स्थान पर किया गया पिंडदान मनुष्य के पैतृक कुल की तैंतीस पीढ़ियों को सीधे यमलोक के बंधनों से मुक्त कर देता है। इसके समीप ही मेनका तीर्थ है, जहाँ स्वयं अप्सरा मेनका अपनी सखियों के साथ स्नान करने आती है। इस जल की महिमा इतनी अपार है कि यहाँ स्नान करने के बाद जीव को पुनः माता के गर्भ में नहीं आना पड़ता, अर्थात वह जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
रहस्य की यह कड़ियां यहीं समाप्त नहीं होतीं। यम सरोवर के पास जहां पितृ-तर्पण करने से पूर्वजों को अक्षय तृप्ति मिलती है, वहीं उत्तर दिशा में नलगिरि पर्वत से निकलकर कपिला नदी मानसरोवर में आकर मिलती है। इसी क्षेत्र के एक अत्यंत एकांत और सुरम्य गुफा में साक्षात जगदीश भगवान विष्णु योगेश्वर रूप में निवास करते हैं, जिनकी पूजा करने से मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है।
मानस खण्ड के सोलहवें अध्याय में इस अलौकिक कथा के अंतिम चरण में महादेव बत्तीस कोस की परिधि में फैले उस महान कपिल तीर्थ की चर्चा करते हैं, जो समस्त पातकों का समूल नाश करने वाला है। कपिला नदी के तट पर ही महर्षि जमदग्नि के प्रतापी पुत्र भगवान परशुराम का आश्रम है। यह वही भूमि है जहाँ परशुराम जी ने अप्रतिम तप करके अजर-अमर होने का अर्थात चिरंजीवित्व का वरदान प्राप्त किया था। कथा के इस मोड़ पर माता पार्वती अत्यंत कौतूहल से भर जाती हैं और पूछती हैं कि हे देवदेवेश, भगवान परशुराम ने पृथ्वी पर आकर ऐसा कौन सा महान कर्म किया जिससे उन्हें अमरता प्राप्त हुई?
इस प्रकार मानसरोवर के तट पर बिखरे ये दिव्य तीर्थ केवल जल के स्रोत नहीं हैं, बल्कि ये मनुष्य की आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाले स्वर्णिम सोपान हैं। इस अलौकिक रहस्य को जो भी सुनता है, उसका अंतःकरण शिवत्व के प्रकाश से आलोकित हो उठता है।
लेखक @ रमाकान्त पन्त
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