कैलाश के हिमशिखरों में छुपा ब्रह्मांडीय सरोवर का रहस्य और दो महाअवतारों के महामिलन की संपूर्ण गाथा

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कैलाश के हिमशिखरों में छुपा ब्रह्मांडीय सरोवर का रहस्य और दो महाअवतारों के महामिलन की संपूर्ण गाथा
धारचूला/स्कन्दपुराण के परम पावन मानसखण्ड के सोलहवें अध्याय से एक ऐसा विस्मयकारी और अलौकिक सत्य निकलकर सामने आया है, जो मानव चेतना को झकझोर कर रख देता है। यह महागाथा केवल एक पवित्र स्थल की कहानी नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड की उन गुप्त शक्तियों, रहस्यों से भरी दिव्य नदियों और पूर्वजों के मोक्ष का वो चरम सत्य है जिसे सदियों तक गुप्त रखा गया। इस विस्मयकारी वृत्तांत की शुरुआत महर्षि व्यास, देव-वैद्य धन्वन्तरि और परम योगी दत्तात्रेय के संवाद से होती है, जो अंततः कैलाश शिखर पर भगवान शिव और माता पार्वती के बीच हुए उस परम गोपनीय संवाद की ओर ले जाती है, जहाँ ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों से परदा उठा था। जब माता पार्वती परम भक्ति के साथ जगत के स्वामी के सम्मुख प्रस्तुत हुईं, तो समूचा कैलाश एक अलौकिक ऊर्जा से ऊर्ध्वायित हो उठा।
कैलासरूपासीनं देवदेवं जगत्पतिम्।
प्रणम्य परया भक्त्या पप्रच्छ गिरिकन्यका॥
माता पार्वती के मन में एक गहरा संशय था। उन्होंने देवाधिदेव से पूछा कि हे प्रभु, आखिर क्या कारण है कि आपने इस परम पावन मानसरोवर के जल में हंसरूप धारण करके अपना निवास स्थान बनाया है? आपके इस सामान्य जलमय देह को छोड़कर साक्षात सुवर्णमय शरीर धारण करने का क्या रहस्य है? वहाँ कौन से पवित्र तीर्थ हैं और वहाँ प्रवाहित होने वाली नदियों का गुप्त सत्य क्या है?
कथं चापोमयं देहं त्यक्त्वा स्वर्णमयं प्रभो।
ध्रियते मानसजले भवता धातुरूपिणा॥
इस रहस्यमयी जिज्ञासा को सुनकर त्रिलोकीनाथ मुस्कुराए और उन्होंने उस सत्य को प्रकट किया जो सतयुग के प्रारंभ से छिपा हुआ था। शिवजी ने बताया कि जब वेदपाठी तपस्वी वन में भयंकर जीवों और असुरों से भयभीत होकर योगमार्ग में लीन थे, तब उनके कल्याण और रक्षा के लिए उन्होंने यह सुनहला धातुमय रूप धारण किया और मानसरोवर में क्रीड़ा करने लगे।
तस्मादहं महाभागे भक्तानुग्रहकारणम्।
वसामि मानसक्षेत्रे त्वया सह न संशयः॥
महादेव ने इस अध्याय में उन रहस्यमयी नदियों और दिव्य जलधाराओं के प्राकट्य का वर्णन किया है जो सीधे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती हैं। मानसरोवर के इस अलौकिक क्षेत्र में साक्षात गंगा माता भगवान शिव की जटाओं के मध्य से एक कोमल कमल के तंतु के समान निकलकर सातों लोकों को पवित्र करने के लिए अवतरित हुई हैं। इस क्षेत्र के उत्तर द्वार की ओर से एक ऐसी चमत्कारी नदी प्रवाहित होती है जो चाँदी और सीसे की गुप्त खानों से होकर गुजरती है। यह नदी शिव के गणों, गंधर्वों और निकुंजों से सेवित है और जो भी पापी इसके जल का स्पर्श करता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं और वह नदी अंत में मानसरोवर में विलीन हो जाती है। यहीं पर मोक्षदायिनी शेषिणी नदी बहती है, जो राजा मान्धाता के प्राचीन मार्ग का अनुसरण करते हुए मानस क्षेत्र को समृद्ध करती है। इसके अतिरिक्त, यहाँ मोतियों के समान चमकते जल वाली शंकर नदी प्रवाहित होती है, जिसके तट पर कभी तैंतीस करोड़ देवताओं ने घोर तपस्या की थी। जहाँ इन दिव्य नदियों का संगम होता है, उसे देवतीर्थ कहा जाता है, जहाँ साक्षात ब्रह्मा, विष्णु और महेश सदैव निवास करते हैं।
इस अध्याय का सबसे मर्मस्पर्शी और रहस्यमयी भाग पूर्वजों के तर्पण और पिण्डदान के विधान से जुड़ा है। महादेव माता पार्वती को समझाते हैं कि ब्रह्मांड में मानस क्षेत्र से बढ़कर पितरों की मुक्ति का कोई दूसरा स्थान नहीं है। देवतीर्थ के इस पावन संगम पर जो भी मनुष्य अपने पूर्वजों के निमित्त पिण्डदान करता है, वह निःसंदेह अपने तैंतीस कुलों के पूर्वजों को यमलोक के कष्टों से मुक्त कराकर परम पद की ओर ले जाता है। यहाँ स्थित यमतीर्थ और यमसरोवर का रहस्य तो और भी विस्मयकारी है। चित्रगुप्त और यमदूतों के प्रभाव से घिरे इस क्षेत्र में यदि कोई व्यक्ति श्रद्धापूर्वक अपने पितरों का श्राद्ध और तर्पण करता है, तो उसके पूर्वजों को चौदह इन्द्रों के शासनकाल की अवधि तक यानी युगों-युगों तक अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है। इस पवित्र जल में केवल एक बार स्नान करने से मनुष्य देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण जैसे तीनों भयंकर ऋणों से सदा के लिए मुक्त हो जाता है और उसका मर्त्य शरीर एक दिव्य देवस्वरूप धारण कर लेता है। इसी क्षेत्र में चार सौ हाथ की दूरी पर बारह परम पवित्र तीर्थों से घिरा मेनका तीर्थ है, जहाँ स्वयं अप्सरा मेनका अपनी सखियों सहित स्नान कर दिव्यता पाती है। इसके उत्तर में नलगिरि पर्वत से निकलने वाली कपिला नदी बहती है, जिसका जल साक्षात सुवर्ण के समान पीला और औषधीय गुणों से भरपूर है, जिसे स्वयं ब्रह्मा जी ने राजा मान्धाता को दिखाया था।
इसी पावन भूमि पर महागाथा एक और रोमांचक और अंतिम सस्पेंस की ओर बढ़ती है, जब परशुराम जी के अमरत्व और श्री राम के महामिलन का प्रसंग सामने आता है। महर्षि जमदग्नि के पुत्र वीर परशुराम ने जब इक्कीस बार अत्याचारी राजाओं का संहार कर संपूर्ण पृथ्वी कश्यप ऋषि को दान कर दी, तब उनके पास पैर रखने की भूमि नहीं बची। वे निवास के लिए समुद्र के पास गए, परंतु अगाध सागर ने उनकी शक्ति को नहीं पहचाना। क्रोधित परशुराम ने जब धनुष पर बाण चढ़ाया, तो भयभीत समुद्र ने साठ योजन पीछे हटकर कोंकण देश की भूमि उन्हें सौंप दी। इसके बाद परशुराम जी इसी मानस क्षेत्र के कपिला-संगम पर आए और बारह वर्षों तक घोर तपस्या कर महादेव से चिरंजीवी होने का वरदान प्राप्त किया।
त्रेतायुग में जब भगवान विष्णु ने श्री राम के रूप में अवतार लिया, तब परशुराम जी उनके भीतर के ईश्वरत्व की परीक्षा लेने पहुँचे और अपना दिव्य वैष्णव धनुष उन्हें सौंपते हुए बाण चढ़ाने की चुनौती दी। श्री राम ने जैसे ही सहजता से उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दी, वैसे ही परशुराम जी का सारा संशय दूर हो गया। परंतु रघुकुल का बाण कभी निष्फल नहीं जाता था, इसलिए श्री राम ने कहा कि हे ब्रह्मन, अब मुझे आपकी किसी एक शक्ति या गति को नष्ट करना ही होगा।
मया सोदाहृतं चापि तथ्यं कटुं वचो हरिः।
रघूणां न शरा ब्रह्मन् यान्ति चात्र निरर्थकाः॥
इस क्षण महाप्रतापी परशुराम अत्यंत दीन और विनीत हो गए। उन्होंने श्री राम के साक्षात नारायण रूप को पहचान लिया और प्रार्थना की कि हे रघुनंदन, मैं स्वर्ग की सुख-सुविधाओं का आकांक्षी नहीं हूँ, इसलिए आप मेरी स्वर्ग जाने की गति को भले ही नष्ट कर दें, परंतु मुझे इस पावन पृथ्वी के पर्वतों और वनों में रहकर सदा तपस्या करने की अनुमति दें।
नाहं स्वर्गगतिं पुण्यां व्रजामि रघुनंदन।
तपामि भूतले पुण्ये गिरिकाननशोभिते॥
शरणागतवत्सल श्री राम ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर उनके स्वर्ग-गमन के मार्ग को समाप्त कर दिया और उसी क्षण उस दिव्य धनुष के माध्यम से परशुराम जी का समस्त वैष्णव तेज श्री राम के विग्रह में समाहित हो गया। सारे संशयों और अहंकारों से मुक्त होकर, शांत चित्त से परशुराम जी इस सुंदर पृथ्वी पर एक अमर योगी के रूप में वास करने लगे। स्कन्दपुराण के मानसखण्ड का यह सोलहवाँ अध्याय इस प्रकार पवित्र नदियों के उद्गम, पूर्वजों के तर्पण की परम महिमा और दो महाअवतारों के इस अलौकिक मिलन के साथ संपन्न होता है, जो आज भी संपूर्ण सृष्टि के लिए एक परम पावन और विस्मयकारी सत्य बना हुआ है।