संसार में जब साक्षात मृत्यु झपटती है, तो क्या कोई ऐसा गुप्त विधान है जो यमराज की गति को भी रोक दे? संक्षिप्त गरुड़ पुराण के आचार काण्ड (अध्याय १९-२०) के दुर्लभ पन्नों से एक ऐसा ही विस्मयकारी और रोंगटे खड़े कर देने वाला रहस्य उजागर हुआ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पक्षीराज गरुड़ को प्रदान की गई ‘प्राणेश्वरी विद्या’ और अलौकिक तंत्र-मंत्रों की अचूक शक्ति का वर्णन मिलता है। यह केवल मंत्र-साधना नहीं, बल्कि कालचक्र, खगोलीय गति और मानव देह के सूक्ष्म विज्ञान का ऐसा अद्भुत संगम है, जो मृत्यु के पंजों से भी जीवन को खींच लाने का सामर्थ्य रखता है।
जब काल स्वयं भेजता है दूत: मृत्यु के पूर्व संकेत सूतजी द्वारा शौनक आदि ऋषियों को बताए गए इस वृत्तांत में सबसे पहले उन परिस्थितियों का खुलासा किया गया है, जहाँ सर्पदंश होने पर प्राणी का बचना असंभव माना गया है। यदि श्मशान, बांबी (वल्मीक), पर्वत, कुआं या किसी पुराने पेड़ के कोटर में सांप डस ले और घाव के स्थान पर तीन गुप्त रेखाएं बन जाएं, तो विष का वेग काल बन जाता है। षष्ठी तिथि, कर्क व मेष राशि के नक्षत्रों तथा मूल, अश्लेषा और मघा जैसे क्रूर नक्षत्रों में विष का प्रभाव अत्यंत प्राणघातक होता है। सबसे रहस्यमयी बात यह बताई गई है कि यदि सर्पदंश के ठीक समय किसी दंडी, शस्त्रधारी, भिक्षु या नग्न प्राणी के दर्शन हो जाएं, तो शास्त्रों के अनुसार उसे यमराज का ही दूत समझना चाहिए। इसके अलावा, दिन-रात के विभिन्न यामों में जब बृहस्पति या शनि-राहु का भोगकाल चलता है, तब तक्षक और कर्कोटक जैसे नागों का विष देवताओं का भी अंत करने वाला माना गया है।
देह में चंद्रमा का वास और ‘प्राणेश्वरी’ सुरक्षा चक्र किंतु, इस भयानक कालचक्र के बीच गरुड़ पुराण जीवन रक्षा का वह गुप्त द्वार खोलता है, जहाँ प्रकृति स्वयं ढाल बन जाती है। ग्रंथ के अनुसार, प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा और अमावस्या तक चंद्रमा मानव शरीर के विभिन्न अंगों (पैरों से लेकर मस्तक तक) में निरंतर भ्रमण करता है। पुरुष के दाहिने और स्त्री के बाएं अंग में चंद्रमा की स्थिति होती है; यदि सर्प उस अंग में डसे जहाँ उस दिन चंद्रमा का वास हो, तो साक्षात यमराज की छाया में भी प्राणी के प्राण बच जाते हैं।
इसके साथ ही गरुड़ पुराण में कई चमत्कारी मंत्र-प्रयोगों का उल्लेख किया गया है:
- स्फटिक के समान निर्मल बीजमन्त्र ‘ॐ हंसः’ का प्रयोग मूर्च्छित व्यक्ति के शरीर से विषरूपी पाप को खींचकर बाहर कर देता है।
- ‘ॐ कुरु कुल्ले स्वाहा’ वह महामंत्र है, जिसे घर में विधिवत लिख देने मात्र से विषधर सर्प उस स्थान को हमेशा के लिए छोड़कर भाग जाते हैं।
- अष्टदल कमल पर ‘ॐ सुवर्णरेखे कुक्कुटविग्रहरूपिणि स्वाहा’ लिखकर ‘ॐ पक्षि स्वाहा’ से अभिमंत्रित जल का स्नान कराने पर विष का प्रभाव तुरंत समाप्त हो जाता है।
- ‘ॐ पक्षि स्वाहा’ मंत्र की एक लाख आहुति से सिद्धि प्राप्त साधक केवल अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी विषैले व्यक्ति के शरीर का विष उतारने की क्षमता हासिल कर लेता है; यहाँ तक कि विषधर नाग ऐसे साधक की छाया को भी लांघने का साहस नहीं करते।
जड़ी-बूटियों का चमत्कार और आकाशीय आपदाओं पर नियंत्रण इस विद्या में मंत्रों के साथ दुर्लभ वनस्पतियों का भी गहरा तालमेल दिखाया गया है। प्रत्यङ्गिरा की जड़ को चावल के पानी के साथ पीसकर पिलाने, अथवा पुनर्नवा, प्रियंगु, ब्राह्मी, श्वेत बृहती, अपराजिता और कमलगट्टे के फल को जल व घी में पीसकर लेप करने से घातक विष शांत हो जाता है। शिरीष वृक्ष के पंचांग और गाजर के बीजों का लेप भी विष को निष्प्रभावी कर देता है।
इतना ही नहीं, इस साधना का प्रभाव केवल विष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आकाशीय आपदाओं को भी थामने का सामर्थ्य रखती है। त्रिशूल के तीनों शिखरों पर ‘ॐ ह्रीं ह्रीं’ लिखकर उसे आकाश में घुमाने से दुष्ट ग्रह, विषैले सर्प और विनाशकारी मेघ तितर-बितर हो जाते हैं। वहीं, ‘ॐ जूं सूं हूं फट्’ मंत्र से खैर (खदिर) की आठ लकड़ियों या कीलों को अभिमंत्रित कर आठों दिशाओं में गाड़ देने से उस पूरे क्षेत्र में आकाशीय बिजली (वज्रपात), टिड्डी दल और चूहों के उपद्रव का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है।
सदाशिव का भैरव पिण्ड और प्रकृति पर विजय ग्रंथ के अंतिम चरण में पञ्चवक्त्र-पूजन और शिवार्चन की वह पराकाष्ठा सामने आती है, जहाँ साधक अनार के फूल के समान कांतिमान् पिण्ड का निर्माण कर ‘ॐ ह्रां सदाशिवाय नमः’ का उच्चारण करता है। इसके प्रभाव से दुष्ट जन, मेघ, राक्षस, भूत और डाकिनी दसों दिशाओं को छोड़कर भाग खड़े होते हैं। इसके अलावा, गणेश, स्तम्भन चक्र और ब्राह्मय के संयुक्त ‘भैरव पिण्ड’ से पापग्रहों के कुप्रभाव शांत होते हैं। किसानों की फसलों की रक्षा के लिए ‘ॐ लसद्द्विजिव्हाक्ष स्वाहा’ का ध्यान तथा रक्त-वर्ण की स्याही से नगाड़े पर ‘ॐ क्ष्व नमः’ लिखकर बजाने का विधान बताया गया है, जिसकी प्रचंड ध्वनि सुनते ही समस्त उपद्रवी और नकारात्मक शक्तियां थर-थर कांपने लगती हैं।
गरुड़ पुराण के ये पृष्ठ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि प्राचीन काल में हमारे ऋषियों ने जीवन रक्षा, आयुर्वेद और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के गूढ़ सूत्रों को किस तरह एक सूत्र में पिरोकर मानवता के कल्याण के लिए सुरक्षित रखा था।
@ रमाकान्त पंत@
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