धर्म एवं अध्यात्म डेस्क। गरुड़ पुराण के आचार काण्ड (अध्याय ८४) में ब्रह्मा जी और महर्षि व्यास के संवाद में वर्णित यह गाथा केवल एक पौराणिक वृत्तांत नहीं, बल्कि श्रद्धा, मोक्ष और पितृ-ऋण से मुक्ति का एक रहस्यमयी एवं अलौकिक दस्तावेज है। आकाश के शून्य में अचानक तीन भिन्न रंगों की आकृतियों का प्रकट होना और घोर नरक की यातना झेल रहे पूर्वजों का एक ही क्षण में स्वर्ग के विमान पर आरूढ़ हो जाना—यह ऐसा रहस्य है, जो गया तीर्थ और विशेषकर ‘गयाशीर्ष’ में पिण्डदान के असीम सामर्थ्य को उजागर करता है।
रहस्यमयी दृश्य: आकाश में तीन छायाएं और राजा का विस्मय
विशाला नगरी के यशस्वी राजा विशाल एक दिन राजमहल की प्राचीर से गगन की ओर देख रहे थे। तभी अचानक मेघों के मध्य तीन दिव्य पुरुष प्रकट हुए। उनका स्वरूप अत्यंत विचित्र और रहस्य से भरा था—उनमें से पहला पुरुष श्वेत (सफेद) वर्ण का था, दूसरा रक्त (लाल) वर्ण का और तीसरा घोर कृष्ण (काले) वर्ण का था।
विस्मय और कौतूहल से भरकर राजा विशाल ने हाथ जोड़कर पूछा, “हे दिव्य आत्माओ! आप कौन हैं? आपकी यह विचित्र वेशभूषा और वर्ण-भेद किस रहस्य की ओर संकेत कर रहे हैं?”
तभी श्वेत वर्ण वाले पुरुष ने स्नेहभरी वाणी में जो रहस्योद्घाटन किया, उसने राजा के रोंगटे खड़े कर दिए।
उसने कहा— “हे राजन! मैं तुम्हारा पिता हूँ। तुमने गयाशीर्ष तीर्थ में जो श्रद्धापूर्वक पिण्डदान किया, उसी के पुण्य-प्रताप से मुझे देवराज इंद्र के अमरावती लोक (इंद्रलोक) की प्राप्ति हुई है और मेरा वर्ण उज्ज्वल श्वेत हो गया है। परंतु, यह रहस्य यहीं समाप्त नहीं होता…”
ब्रह्महत्या, ऋषियों का संहार और ‘अवीचि नरक’ से मुक्ति का रहस्य
श्वेत पुरुष ने आगे संकेत करते हुए कहा— “हे पुत्र! तुम्हारे पीछे जो रक्त वर्ण वाले पुरुष दिखाई दे रहे हैं, वे मेरे पिता (तुम्हारे पितामह) हैं। इन्होंने अपने जीवनकाल में ब्रह्महत्या जैसा महापाप और अनेक घृणित कर्म किए थे। वहीं, जो तीसरे अत्यंत भयानक काले वर्ण वाले पुरुष हैं, वे तुम्हारे प्रपितामह (परदादा) हैं। इन्होंने अपने जीवन में अनेकों तपस्वी ऋषियों का निर्मम वध किया था। अपने इन अक्षम्य कर्मों के कारण ये दोनों जीवात्माएं युगों-युगों से घोर ‘अवीचि’ नामक नरक की भीषण ज्वालाओं में जल रहे थे। किंतु हे वत्स! तुम्हारे द्वारा गयाशीर्ष में किए गए एकमात्र पिण्डदान के महापुण्य ने नरक के द्वारों को तोड़ दिया। आज हम तीनों पापमुक्त होकर दिव्य विमान से उत्तम स्वर्गलोक को प्रस्थान कर रहे हैं!”
यह सुनते ही राजा विशाल का हृदय कृतज्ञता और अश्रुओं से भर गया। उन्होंने जाना कि उनके द्वारा किए गए तर्पण ने किस प्रकार युगों के संचित अंधकार को एक पल में मिटा दिया।
पूर्वजन्म का बंधन: एक प्रेत की पुकार और वणिक का संकल्प
इस अलौकिक सिद्धि के मूल में राजा विशाल के पूर्वजन्म की एक अत्यंत मार्मिक घटना छिपी थी। अपने पूर्वजन्म में विशाल एक साधारण वणिक (व्यापारी) थे। एक बार एक भटके हुए प्रेत ने अत्यंत विलाप करते हुए उस वणिक से प्रार्थना की थी: “हे वणिक! मुझ अभागे के निमित्त गयाशीर्ष तीर्थ में जाकर पिण्डदान कर दो, जिससे मेरी इस कष्टकारी प्रेत-योनि से मुक्ति हो सके। इसका पुण्य तुम्हें भी स्वर्ग और उत्तम गति प्रदान करेगा।’
दयालु वणिक ने उस प्रेतराज और अपने भाइयों व पूर्वजों के निमित्त गया जाकर विधिपूर्वक पिण्डदान संपन्न किया। परिणाम यह हुआ कि वह प्रेत तत्क्षण मुक्त हो गया। मृत्यु के उपरांत वही धर्मात्मा वणिक विशाला नगरी में एक तेजस्वी राजकुमार के रूप में जन्मा। जब युवावस्था में वह निस्संतान था, तब वेदज्ञ ब्राह्मणों ने उसे गयातीर्थ में पिण्डदान करने का वही मार्ग बताया, जिसके प्रभाव से उसे तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति भी हुई और उसकी तीन पीढ़ियों का उद्धार भी हो गया।
कथा में अनुस्यूत पावन संस्कृत श्लोक
गया यात्रा के असाधारण प्रभाव को स्पष्ट करते हुए गरुड़ पुराण में ब्रह्मा जी कहते हैं कि व्यक्ति के घर से निकलते ही उसके पितरों के लिए स्वर्ग के सोपान तैयार होने लगते हैं:
गृहाच्चलितमात्रस्य गयायां गमनं प्रति। स्वर्गारोहणसोपानं पितॄणां तु पदे पदे॥ (८४/३) (अर्थात: गया यात्रा के उद्देश्य से मनुष्य के घर से कदम बढ़ाते ही, उसका एक-एक पग पितरों के स्वर्गारोहण के लिए एक-एक सीढ़ी बनता चला जाता है।)
इसी प्रकार गयाशीर्ष और मुण्डपृष्ठ तीर्थ के अमोघ प्रभाव का वर्णन करते हुए शास्त्र निर्देश करते हैं:
मुण्डपृष्ठे पदं न्यस्तं महादेवेन धीमता। अल्पेन तपसा तत्र महापुण्यमवाप्नुयात्॥ गयाशीर्षे तु यः पिण्डान्नाम्ना येषां तु निर्वपेत्। नरकस्था दिवं यान्ति स्वर्गस्था मोक्षमाप्नुयुः॥ (८४/२८-३०) (अर्थात: मुण्डपृष्ठ तीर्थ पर देवाधिदेव महादेव ने अपना चरण स्थापित किया है, जहाँ थोड़ी सी तपस्या से भी महान पुण्य प्राप्त होता है। गयाशीर्ष में जो व्यक्ति नामोच्चारण के साथ पितरों के लिए पिण्डदान करता है, उसके नरक में पड़े हुए पितर स्वर्ग चले जाते हैं और स्वर्ग में स्थित पितर मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं।)
गया तीर्थ का रहस्यमयी महात्म्य और पांच दिवसीय पावन परिक्रमा
शास्त्रों के अनुसार कुरुक्षेत्र, विशाला, विरजा और गया—इन चार तीर्थों को छोड़कर अन्य सभी तीर्थों में मुण्डन एवं उपवास का कड़ा विधान है, जबकि गया में दिन अथवा रात किसी भी प्रहर में श्राद्ध किया जा सकता है। गरुड़ पुराण में गया के पांच दिवसीय श्राद्ध-क्रम का अद्भुत आध्यात्मिक विधान दिया गया है:
- प्रथम दिवस: फल्गु तीर्थ में स्नान-तर्पण, कव्यवाह, सोम, यम, अर्यमा आदि नव-पितृदेवताओं का आह्वान, पितामह एवं भगवान गदाधर (विष्णु) के दर्शन, जिससे इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार होता है।
- द्वितीय दिवस: धर्मारण्य एवं मातंगवापी में श्राद्ध (वाजपेय यज्ञ का फल), ब्रह्मतीर्थ (राजसूय व अश्वमेध का फल) तथा कूप-यूप तीर्थों में पिण्डोदक क्रिया।
- तृतीय दिवस: ब्रह्मसद् तीर्थ, यूप-कूप तीर्थ तथा गोप्रचार तीर्थ में ब्रह्मानुकल्पित ब्राह्मणों का सत्कार।
- चतुर्थ दिवस: फल्गु तीर्थ, गयाशीर्ष, मुण्डपृष्ठ (रुद्रपाद) तथा दशाश्वमेध तीर्थ। यहाँ शमीपत्र के बराबर भी पिण्डदान करने से संपूर्ण पृथ्वी के तीन बार दान का अक्षय फल मिलता है।
- पंचम दिवस: गदालोल तीर्थ में स्नान और अक्षयवट के मूल में पिण्डदान। अक्षयवट के नीचे एक ब्राह्मण को भी उष्णोदक अथवा शाक मात्र भोजन कराने से करोड़ों ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल मिलता है।
राजा विशाल की यह कथा सिद्ध करती है कि गया का पावन क्षेत्र केवल एक भौगोलिक तीर्थ नहीं, बल्कि लोक और परलोक के मध्य बंधे ऋणों को काट देने वाली एक साक्षात मोक्ष-स्थली है।
— रमाकान्त पन्त
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