पेड़ से निकलता था औषधीय ‘घी’, माफियाओं की नजर लगी तो होने लगा गायब… आखिर क्या है उत्तराखंड के इस दुर्लभ वृक्ष का रहस्य?

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पेड़ से निकलता था औषधीय ‘घी’, माफियाओं की नजर लगी तो होने लगा गायब… आखिर क्या है उत्तराखंड के इस दुर्लभ वृक्ष का रहस्य?

भुजियाघाट (नैनीताल):

जिस पेड़ के बीजों से कभी शुद्ध पौष्टिक ‘घी’ तैयार होता था और जो सदियों से पहाड़ की आर्थिकी व सेहत का आधार था, आखिर वह हमारी वादियों से अचानक गायब कैसे होने लगा? देवभूमि के इसी विलुप्तप्राय ‘इंडियन बटर ट्री’ यानी च्यूरा के अस्तित्व को बचाने और लुप्त होती औषधीय संपदा को नया जीवन देने के लिए एक अनूठी मुहिम चल रही है। इसी कड़ी में 12 सितम्बर को पूर्व जिला आयुर्वेद अधिकारी एवं पर्यावरणविद डॉ. आशुतोष पन्त के वृहद वृक्षारोपण अभियान की 98वीं श्रृंखला का आयोजन भुजियाघाट के समीप काया आयुर्वेद कॉलेज परिसर में उत्साहपूर्वक किया गया।

माफियाओं के लालच की भेंट चढ़ा ‘इंडियन बटर ट्री’

कार्यक्रम के दौरान डॉ. आशुतोष पन्त ने एक चौंकाने वाली सच्चाई साझा करते हुए बताया कि आयुर्वेद का मुख्य आधार वनस्पतियां हैं, लेकिन अंधाधुंध दोहन के कारण कई जीवनदायिनी प्रजातियां खत्म होने की कगार पर हैं। ‘च्यूरा’ का पेड़ कभी उत्तराखंड में प्रचुर मात्रा में पाया जाता था। इसके पत्ते चारे और पत्तल के काम आते थे, फल बेहद स्वादिष्ट होते थे और इसके बीजों से निकाला गया घी खाने के साथ-साथ त्वचा रोगों में रामबाण माना जाता था। दुर्भाग्यवश, इसकी कीमती लकड़ी के लालच में माफियाओं ने इसे काटकर लगभग समाप्त कर दिया। डॉ. पन्त पिछले वर्ष से इस दुर्लभ पेड़ को पुनर्जीवित करने के लिए लगातार प्रयासरत हैं।

महाविद्यालय परिसर में रोपे पौधे, ग्रामीणों को बांटी हरियाली

काया आयुर्वेद कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम में कॉलेज के निदेशक अशोक पाल और प्रधानाचार्य डॉ. विनय खुल्लर की उपस्थिति में शिक्षकों व विद्यार्थियों ने औषधीय पौधे रोपे। इसके अलावा समीपवर्ती सूर्याजाला गांव के ग्रामीणों को फलदार पौधे निःशुल्क भेंट किए गए।

पहाड़ी क्षेत्रों के लिए वरदान है च्यूरा: निःशुल्क पौधे उपलब्ध

डॉ. पन्त ने जानकारी दी कि 2500 से 5000 फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में च्यूरा का पेड़ आसानी से पनपता है। बरसात के मौसम के अंतिम चरण में होने के बावजूद उनके पास च्यूरा व अन्य प्रजातियों के पौधे उपलब्ध हैं। उन्होंने क्षेत्र के पर्यावरण प्रेमियों और ग्रामीणों से आह्वान किया कि जो भी इस दुर्लभ पौधे को लगाना चाहते हैं, वे उनसे निःशुल्क प्राप्त कर सकते हैं।

​कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों और उपस्थित लोगों ने पॉलीथीन का उपयोग पूरी तरह बंद करने और हर वर्ष कम से कम दो पौधे लगाकर उनका संरक्षण करने का सामूहिक संकल्प लिया।

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