संसद से लेकर हाई कोर्ट तक जिस परिवार की धाक, उसकी तीसरी पीढ़ी ने क्यों चुनी लालकुआं की माटी और समाज? जानिए पूरा सच

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नौकरी नहीं, समाज सेवा को चुना: स्वतंत्रता सेनानी परिवार की विरासत को आगे बढ़ा रहे जैनेन्द्र मिश्रा

लालकुआं।

कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान केवल उनके व्यवसाय या पद से नहीं, बल्कि समाज के बीच उनकी सक्रियता, व्यवहार और सेवा भाव से बनती है।

लालकुआं क्षेत्र में जैनेन्द्र मिश्रा, जिन्हें लोग स्नेहपूर्वक पियूष मिश्रा के नाम से भी जानते हैं, ऐसा ही एक जाना-पहचाना नाम हैं। निजी व्यवसाय की जिम्मेदारियों के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों में निरंतर सक्रिय रहना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है।

लालकुआं और आसपास के क्षेत्रों में आयोजित होने वाले धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी सक्रिय भागीदारी लंबे समय से देखने को मिलती रही है। विशेष रूप से रामलीला मंचन के प्रति उनका लगाव उल्लेखनीय है।

पिछले कई वर्षों से वह रामलीला में अलग-अलग पात्रों की भूमिकाएं निभाकर अपनी अभिनय प्रतिभा और भारतीय संस्कृति के प्रति अनुराग को मंच पर अभिव्यक्त करते आ रहे हैं। यही सक्रियता और सहज व्यवहार उन्हें क्षेत्र के लोगों के बीच लोकप्रिय बनाता है।
लेकिन जैनेन्द्र मिश्रा की कहानी केवल एक समाजसेवी और सांस्कृतिक कार्यकर्ता की कहानी नहीं है। इसके पीछे एक ऐसी पारिवारिक विरासत भी है, जिसकी जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रभक्ति, शिक्षा और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हैं।

स्वतंत्रता संग्राम की विरासत से मिली समाज सेवा की प्रेरणा

मां अवन्तिका कुंज शक्ति स्थल परिसर में हुई लंबी बातचीत के दौरान जैनेन्द्र मिश्रा ने अपने परिवार की उस विरासत को साझा किया, जिसे वह आज भी अपने जीवन की महत्वपूर्ण प्रेरणा मानते हैं।

बातचीत में उन्होंने बताया कि उनके दादा स्वर्गीय महेन्द्र मिश्रा का नाम जनपद मऊ के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में लिया जाता है।
वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी थी। इस दौरान उन्हें आगरा, लखनऊ और बनारस की जेलों में रखा गया।

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जैनेन्द्र मिश्रा के अनुसार, उनके दादा के जीवन में देशभक्ति की भावना को मजबूत करने में उनकी दादी सूरज दीपा देवी की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। वह अपने समय की मैट्रिक शिक्षित महिला थीं। परिवार संभालने के साथ-साथ उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अपनी अहम भूमिका निभाई।

यही कारण है कि स्वतंत्रता सेनानी परिवार की यह विरासत जैनेन्द्र मिश्रा के लिए केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों और जिम्मेदारी का आधार भी है।

शिक्षा और संस्कारों से समृद्ध पारिवारिक वातावरण

जैनेन्द्र मिश्रा बताते हैं कि उनका परिवार शुरू से ही शिक्षा, संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारियों को विशेष महत्व देता रहा है। उनके पिता द्विजेन्द्र प्रसाद मिश्रा लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए, एलएलबी शिक्षित रहे। वह मऊ से दो बार जिला पंचायत सदस्य रहे और दो बार विधानसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं।
उनकी माता उर्मिला मिश्रा बीए शिक्षित थीं और परिवार में बच्चों की शिक्षा एवं संस्कारों को लेकर बेहद सजग रहीं।

परिवार में शिक्षा की परंपरा आगे भी जारी रही। उनके बड़े भाई ज्ञानेन्द्र मिश्रा एलएलबी हैं और वर्तमान में दिल्ली हाईकोर्ट में वकालत कर रहे हैं। जैनेन्द्र की पत्नी आभा भी प्रतिष्ठित स्वतंत्रता सेनानी परिवार से संबंध रखती हैं। वह एलएलबी और एलएलएम शिक्षित हैं तथा उत्तराखंड बार कौंसिल में पंजीकृत हैं।

ऐसे वातावरण में पले-बढ़े जैनेन्द्र मिश्रा के सामने उच्च शिक्षा के बाद प्रतिष्ठित सरकारी सेवा में जाने के अनेक विकल्प थे, लेकिन उन्होंने अपने लिए एक अलग रास्ता चुना—निजी व्यवसाय के साथ समाज और संस्कृति से जुड़े रहकर समाज के हित में योगदान करने का रास्ता।

बिरला विद्या मंदिर से दिल्ली
विश्वविद्यालय तक का सफर

जैनेन्द्र मिश्रा की प्रारंभिक एवं माध्यमिक शिक्षा नैनीताल स्थित प्रतिष्ठित बिरला विद्या मंदिर से हुई। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और प्रतिष्ठित किरोड़ीमल कॉलेज से राजनीति शास्त्र में स्नातक एवं परास्नातक की डिग्रियां हासिल कीं।

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स्कूल के दिनों से ही उनकी रुचि सांस्कृतिक कार्यक्रमों, रंगमंच और नाट्य गतिविधियों में रही। विद्यालय में होने वाली विभिन्न प्रस्तुतियों में उन्होंने भाग लिया।

उच्च शिक्षा के दौरान दिल्ली में भी वह प्रतिष्ठित रंगमंच संस्थानों से जुड़े और भारतीय संस्कृति एवं कला के प्रति अपने लगाव को निरंतर आगे बढ़ाते रहे।
यही रंगमंच से जुड़ा अनुभव बाद में लालकुआं की रामलीलाओं में उनके अभिनय के रूप में भी दिखाई दिया।

मऊ से लालकुआं तक पहुंची परिवार की कारोबारी विरासत

जैनेन्द्र मिश्रा बताते हैं कि उनके पिता द्विजेन्द्र प्प्रसाद मिश्रा सत्तर के दशक में व्यवसाय के सिलसिले में उत्तर प्रदेश के मऊ से लालकुआं आए थे। यहां उन्होंने निजी व्यवसाय शुरू किया और धीरे-धीरे क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यवसायियों में अपनी पहचान बनाई।

उनकी माता उर्मिला मिश्रा धर्मपरायण, शिक्षित और संस्कारित महिला थीं। परिवार के बच्चों की शिक्षा, संस्कार और व्यवसाय को आगे बढ़ाने में उन्होंने अपने पति का निरंतर सहयोग किया और परिवार के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।

वर्तमान में जैनेन्द्र के पिता द्विजेन्द्र मिश्रा मऊ में रह रहे हैं और अपने पिता स्वर्गीय महेन्द्र मिश्रा की स्मृति में “स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महेन्द्र पीजी कॉलेज” का संचालन कर रहे हैं। वहीं अपनी माता सूरज दीपा देवी की स्मृति में एक निजी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान भी संचालित किया जा रहा है।

परिवार में राजनीति और सामाजिक चेतना की भी रही मजबूत परंपरा

जैनेन्द्र मिश्रा की पारिवारिक पृष्ठभूमि का एक और महत्वपूर्ण पक्ष राजनीतिक एवं सामाजिक चेतना से जुड़ा है। उन्होंने बताया कि उनकी माता उर्मिला मिश्रा के दादा, अर्थात जैनेन्द्र के परनाना सरजू पांडे, अपने समय के चर्चित एवं लोकप्रिय कॉमरेड नेता थे। उनके अनुसार सरजू पांडे वर्ष 1957 से 1977 तक गाजीपुर-बलिया क्षेत्र से सांसद रहे तथा वर्ष 1977 से 1989 तक विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) रहे।

इस तरह उनके परिवार की तीन पीढ़ियों में स्वतंत्रता आंदोलन, शिक्षा, राजनीति, व्यवसाय और सामाजिक सरोकारों की अलग-अलग धाराएं दिखाई देती हैं, जिनका प्रभाव जैनेन्द्र मिश्रा के व्यक्तित्व में भी नजर आता है।

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परिवार, व्यवसाय और समाज—तीनों के बीच संतुलन

आज जैनेन्द्र मिश्रा लालकुआं में रहकर पारिवारिक व्यवसाय को संभालने के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। क्षेत्र में होने वाले आयोजनों में उनकी भागीदारी और सहज उपलब्धता उन्हें आम लोगों से जोड़ती है।

खास बात यह है कि सामाजिक सक्रियता के साथ वह अपने पारिवारिक दायित्वों को भी उतनी ही गंभीरता से निभाते हैं। अपने दो बच्चों अभ्यजा और श्री शिव की शिक्षा-दीक्षा को लेकर वह विशेष रूप से सजग और प्रतिबद्ध हैं।

उनका जीवन यह संदेश देता है कि आधुनिक व्यावसायिक जीवन और सामाजिक जिम्मेदारियां एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि इच्छाशक्ति और संस्कार हों तो व्यक्ति अपने व्यवसाय को संभालते हुए भी समाज, संस्कृति और परंपराओं के लिए समय निकाल सकता है।

विरासत केवल स्मृति नहीं, जिम्मेदारी भी है

जैनेन्द्र मिश्रा की कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात शायद यही है कि उन्होंने अपने परिवार की गौरवशाली विरासत को केवल स्मृतियों तक सीमित नहीं रखा। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दादा की राष्ट्रभक्ति, परिवार की शिक्षा परंपरा, सांस्कृतिक संस्कार और सामाजिक सरोकारों को वह अपने तरीके से आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।

रामलीला के मंच पर निभाए जाने वाले विभिन्न पात्र हों, धार्मिक आयोजनों में सहभागिता हो या सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय उपस्थिति—इन सबके पीछे उनके व्यक्तित्व में दिखाई देने वाला सेवा, संस्कार और संस्कृति का भाव उन्हें लालकुआं क्षेत्र में एक अलग पहचान देता है।

आज जब नई पीढ़ी के सामने करियर और व्यक्तिगत सफलता की दौड़ तेजी से बढ़ रही है, ऐसे में जैनेन्द्र मिश्रा की जीवन यात्रा यह संदेश भी देती है कि सफलता केवल स्वयं आगे बढ़ने का नाम नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, परिवार की विरासत और समाज से जुड़े रहकर आगे बढ़ने का नाम भी है।

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