(संक्षिप्त गरुड़ पुराण के पन्नों से उद्घाटित परलोक का गूढ़ सत्य)
धर्म-संस्कृति डेस्क: मृत्यु के उस पार की दुनिया में आखिर क्या घटित होता है? क्या वे आत्माएं, जो अचानक किसी भीषण दुर्घटना, जहर, फांसी, वज्रपात या जंगली जानवरों के हमलों का शिकार होकर असमय काल के गाल में समा गईं, कभी शांति पा पाती हैं? या फिर वे सदियों तक यमदूतों की असहनीय यातनाओं, घोर अंधकार और कुंभीपाक जैसे खौफनाक नरकों में तड़पती रहती हैं?
सनातन ज्ञान के अप्रतिम ग्रंथ संक्षिप्त गरुड़ पुराण के ८५वें अध्याय में स्वयं सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने मृत्यु के इस रहस्यमयी चक्रव्यूह को भेदते हुए एक ऐसा मोक्षमार्ग बताया है, जो रोंगटे खड़े कर देने वाली परलोक-वेदना से भी आत्मा को मुक्ति दिला सकता है।
अदृश्य लोक से आती पुकार: जब राह भटक जाती हैं जीवात्माएं
गरुड़ पुराण के अनुसार, ब्रह्मांड में अनगिनत ऐसे जीवात्मा भटक रहे हैं जिनका कोई नाम-गोत्र तक स्मरण करने वाला नहीं बचा। कई ऐसे हैं जिनकी मृत्यु दाँत निकलने से पहले ही हो गई या जो गर्भकाल में ही नष्ट हो गए। कई आत्माएं ऐसी हैं जिन्होंने अवसाद या संकट में आकर आत्महत्या (उद्बन्धन या विषपान) का मार्ग चुना, या जिनकी हत्या चोरों, अस्त्र-शस्त्रों अथवा आकाशीय बिजली द्वारा कर दी गई।
शास्त्र साक्षी है कि ऐसी अकाल मृत आत्माएं अक्सर ‘प्रेतरूप’ धारण कर भटकती हैं या यमराज के कठोर दंडादेश से पक्षी, कीट-पतंग, सर्प, सरीसृप, पशु अथवा वृक्ष की योनियों में गिरकर हजारों जन्मों तक असहनीय कष्ट भोगती हैं। क्या इस अंतहीन अंधकार से बाहर निकलने का कोई मार्ग है?
गयातीर्थ का दिव्य आह्वान: कुशा की नोक पर मुक्ति का संकल्प
इस घोर संशय और वेदना का समाधान देते हुए ब्रह्माजी बताते हैं कि जब कोई श्रद्धावान वंशज प्रेतशिला जैसे पावन तीर्थों में स्नान कर, वरुणा नदी के अमृततुल्य जल और कुश-तिल हाथ में लेकर अपने पूर्वजों का आह्वान करता है, तो यमलोक की बेड़ियां भी टूटने लगती हैं।
इस आह्वान का आरंभ उस कालजयी मंत्र से होता है, जो अदृश्य जगत में शांति की गूंज भर देता है:
अस्मत्कुले मृता ये च गतिर्येषां न विद्यते। आवाहयिष्ये तान् सर्वान् दर्भपृष्ठे तिलोदकैः॥
(अर्थ: हमारे कुल में जो भी प्राणी मृत्यु को प्राप्त हुए हैं और जिन्हें अब तक सद्गति प्राप्त नहीं हुई है, मैं उन सभी को इस दर्भ (कुश) की पीठ पर तिल और जल के माध्यम से सादर आमंत्रित करता हूँ।)
इस मंत्र के साथ जब तिलोदक दिया जाता है, तो केवल माता-पिता ही नहीं, बल्कि नाना-नानी का कुल (मातामह), गुरुजन, ससुराल पक्ष, नेत्रहीन, पंगु, संतानहीन सम्बन्धी और पूर्वजन्मों के वे सभी साथी, जिनका पिंडदान करने वाला कोई नहीं बचा, उस दिव्य ऊर्जा से तृप्त होने खिंचे चले आते हैं।
रौरव और कुंभीपाक की ज्वाला से बाहर निकालने वाला महा-अनुष्ठान
गरुड़ पुराण में विस्तार से उल्लेख मिलता है कि जो पूर्वज रौरव, अंधतामिस्र, कालसूत्र, असिपत्रवन और घोर कुंभीपाक नामक नरकों की ज्वालाओं में जल रहे हैं या प्रेतलोक में असह्य यातनाएं सह रहे हैं, उनके लिए गया में समर्पित एक-एक पिंड अमृत बन जाता है।
पिंडदानकर्ता पूरे आर्तभाव से प्रार्थना करता है कि चाहे वे पशु-पक्षी बन चुके हों या यमदूतों की प्रताड़ना सह रहे हों, यह पिंड अक्षय होकर उन्हें वैकुंठ का मार्ग दिखाए।
परम साक्षी भगवान गदाधर: जब मनुष्य होता है तीनों ऋणों से मुक्त
इस महा-अनुष्ठान के अंत में स्वयं देवाधिदेव महादेव (ईशान), ब्रह्माजी तथा साक्षात् भगवान गदाधर (श्री विष्णु) को साक्षी बनाया जाता है। साधक हाथ जोड़कर भगवान गदाधर के सम्मुख उपस्थित होकर यह अंतिम श्लोक दोहराता है, जो आत्मा और परमात्मा के संबंध को अमर कर देता है:
आगतोऽहं गयां देव पितृकार्ये गदाधर। तन्मे साक्षी भवत्वद्य अनृणोऽहमृणत्रयात्॥
(अर्थ: हे देवाधिदेव भगवान गदाधर! मैं पितरों के उद्धार निमित्त गयातीर्थ में उपस्थित हुआ हूँ। आज मेरे द्वारा किए गए इस पितृकार्य के आप परम साक्षी बनें; आपकी कृपा से आज मैं देव-ऋण, गुरु-ऋण और पितृ-ऋण—इन तीनों ऋणों से पूर्णतः विमुक्त हो गया हूँ।)
इस पावन विधान के संपन्न होते ही परलोक में तड़पते भटकते पितरों को अक्षय तृप्ति और मोक्ष प्राप्त होता है, और पृथ्वी पर रहने वाले वंशज को पूर्वजों का अमर आशीष तथा समस्त बंधनों से मुक्ति मिल जाती है।
@ रमाकान्त पन्त .@
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