पितृ पक्ष विशेष प्रस्तुति: ब्रह्मांड का वह रहस्यमयी चक्रव्यूह: जहां सूर्य के रथ पर सवार हैं सात छंद और देवता भी तरसते हैं भारत में जन्म लेने को!
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस अनंत अंतरिक्ष को हम आज दूरबीनों से टटोल रहे हैं, उसका पूरा खाका सनातन ग्रंथों में सदियों पहले खींच दिया गया था? गरुड़ पुराण के पन्नों में भगवान श्रीहरि विष्णु देवाधिदेव महादेव शिव से एक ऐसा गुप्त ब्रह्मांडीय रहस्य साझा करते हैं, जिसे सुनकर बुद्धि स्तब्ध रह जाती है। यह केवल भूगोल या खगोल नहीं, बल्कि कर्म, समय और आत्मा की अमर यात्रा का वह चक्रव्यूह है, जो पितृ पक्ष की इस पावन वेला में हमारे अस्तित्व का सच उजागर करता है।
गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥ (अर्थ: देवता भी जिनका गान करते हैं कि वे मनुष्य धन्य हैं जो भारतभूमि पर जन्म लेते हैं; क्योंकि यह स्वर्ग और मोक्ष दोनों को प्रदान करने वाली परम पवित्र कर्मभूमि है।)
1. पहला रहस्य: जहां देवता भी हाथ जोड़कर खड़े हैं—’भारतवर्ष’
गरुड़ पुराण में श्रीहरि कहते हैं कि जम्बूद्वीप के विशाल भू-भागों में गंधर्वों और कल्पवृक्षों से सजे कई अलौकिक वर्ष (क्षेत्र) हैं, जहां बिना प्रयास के ही सिद्धियां सुलभ हो जाती हैं। परंतु, चारों ओर समुद्र से घिरे नौवें भू-भाग—’भारतवर्ष’—की बात ही निराली है।
महेंद्र, मलय, सह्य, विंध्य जैसे सात कुलपर्वतों की छांव और गंगा, नर्मदा, गोदावरी, सरस्वती, कावेरी जैसी पापविनाशिनी अमृतमयी नदियों की गोद में बसा यह क्षेत्र भोग भूमि नहीं, बल्कि कर्मभूमि है। स्वर्ग और मोक्ष का द्वार केवल यहीं से खुलता है; इसीलिए परलोक गए पूर्वज भी पितृ पक्ष में इसी पावन धरा की ओर आशा भरी दृष्टि से निहारते हैं।
2. दूसरा रहस्य: पाताल के 70 हजार योजन नीचे का सिहरन भरा सच
जैसे-जैसे हम धरती से नीचे की परतों में उतरते हैं, रहस्य और गहराता जाता है। पुराण के अनुसार भूमि के नीचे दस-दस सहस्र योजन की दूरी पर सात पाताल लोक स्थित हैं—अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान्, महातल, सुतल और पाताल। कहीं भूमि श्वेत है, कहीं पीली, तो कहीं स्वर्णमयी।
किंतु इससे भी आगे पुष्करद्वीप के उस पार अंधकार से घिरे लोकालोक पर्वत के छोर पर वे भयानक नरक स्थित हैं—रौरव, असिपत्रवन, तप्तकुम्भ और वैतरणी। जहां विष देने वाले, निर्दोषों की हत्या करने वाले और अग्निदाह करने वाले अधर्मियों को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। यही वह चेतावनी है जो मनुष्य को सन्मार्ग और पितृ-ऋण मुक्ति की प्रेरणा देती है।
3. तीसरा रहस्य: काल का पहिया और सूर्य का अद्भुत रथ
आकाश की ओर दृष्टि उठाएं तो समय को नापने वाला सूर्य का रथ किसी महा-विज्ञान से कम नहीं लगता। नौ हजार योजन विस्तार वाले इस रथ की धुरी एक करोड़ सत्तावन लाख योजन लंबी है!
इस रथ का पहिया संवत्सर (कालचक्र) का प्रतीक है, जिसकी तीन नाभियां (पूर्वाह्न, मध्याह्न, अपराह्न), पांच अरे और छह ऋतु रूपी नेमियां हैं। सबसे चमत्कारी बात यह है कि इस रथ को खींचने वाले सात घोड़े कोई साधारण अश्व नहीं, बल्कि वेदों के सात पावन छंद हैं—गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और पंक्ति!
हर मास इस रथ पर अलग-अलग आदित्य, ऋषि, गंधर्व, अप्सरा और नाग सवार होकर सृष्टि की रक्षा करते हैं। जैसे आश्विन मास (जिसमें पितृ पक्ष आता है) में पूषा आदित्य, सुरुचि गंधर्व, गौतम ऋषि और धनंजय नाग इस रथ के सारथी बनते हैं।
4. चौथा रहस्य: मघा नक्षत्र, योगिनियां और अमृत योग
यह पूरा ब्रह्मांड वास्तव में श्रीनारायण का ही विराट् शरीर है। अंतरिक्ष में भ्रमण करते ग्रहों और 27 नक्षत्रों का सीधा प्रभाव हमारे जीवन और समय पर पड़ता है।
ज्योतिषचक्र के अनुसार, ‘मघा’ नक्षत्र के अधिपति स्वयं हमारे पितृगण हैं। इसीलिए इस नक्षत्र और कृष्ण पक्ष की तिथियों में किया गया श्राद्ध-तर्पण सीधे पूर्वजों तक पहुंचता है। जहां एक ओर तिथियों और वारों के प्रतिकूल मेल से ‘विषयोग’ और ‘उत्पातिक योग’ बनते हैं, जो विनाश लाते हैं; वहीं शुभ नक्षत्रों के संयोग से ‘अमृत योग’ और ‘सिद्धि योग’ का उदय होता है, जो हर बिगड़े काम को संवार देते हैं। दिशाओं में बैठी ब्राह्मणी, माहेश्वरी और वाराही जैसी योगिनियों की गति को जानकर ही शुभ यात्राएं तय की जाती हैं।
आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्तु तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पिताः॥ (अर्थ: श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध-तर्पण से तृप्त होकर पितृगण अपने वंशजों को दीर्घायु, उत्तम संतान, धन, विद्या, सुख, स्वर्ग और मोक्ष का वरदान देते हैं।)
गरुड़ पुराण का यह प्राचीन संदेश हमें याद दिलाता है कि यह विशाल ब्रह्मांड मात्र ग्रहों और पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित दिव्य व्यवस्था है। पितृ पक्ष का यह पखवाड़ा उसी ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ने, अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ होने और इस दुर्लभ भारतभूमि पर मिले जीवन को सत्कर्मों से संवारने का महापर्व है।
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