/ धर्म डेस्क: क्या मनुष्य अपने जाने-अनजाने किए गए घोर पापों के फल और यम के दंड से कभी बच सकता है? आखिर वे कौन से कर्म हैं जिन्हें सृष्टि में अक्षम्य माना गया है, और क्या उन पापों के बाद भी आत्मा की शुद्धि का कोई मार्ग शेष रहता है? गरुड़ पुराण के ‘प्रायश्चित्त-निरूपण’ प्रसंग में ब्रह्माजी ने एक ऐसा ही गूढ़ और रहस्यमय विधान उजागर किया है, जो मनुष्य को कर्मों के भयानक परिणामों के साथ-साथ उनसे मुक्ति पाने के गुप्त उपायों से भी परिचित कराता है।
कौन हैं सृष्टि के पाँच ‘महापातकी’?
गरुड़ पुराण के अनुसार, कर्मों की अदालत में चार अपराधों को सबसे जघन्य ‘महापाप’ की श्रेणी में रखा गया है। ब्रह्माजी बताते हैं कि मदिरापान में लिप्त रहने वाला, चोरी करने वाला, गुरुपत्नी के साथ गमन करने वाला और ब्राह्मण की हत्या करने वाला—ये चारों महापातकी हैं। किंतु इस रहस्य का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इन चारों में से किसी का भी साथ या संसर्ग करने वाला व्यक्ति स्वतः ही पाँचवाँ महापातकी बन जाता है, जबकि गोहत्या जैसे कृत्यों को ‘उपपातक’ माना गया है।
जब तप और त्याग से पिघलते हैं पापों के पहाड़
शास्त्रों में इन पापों के शमन के लिए अत्यंत कठिन और कठोर तपस्या का उल्लेख मिलता है। ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति के लिए वन में बारह वर्षों तक कुटी बनाकर उपवास करने अथवा अगाध जल, अग्नि या ऊंचे पर्वत से प्राण विसर्जन तक का कठोर विधान वर्णित है, जिसमें प्राण त्याग से पूर्व ब्राह्मण को अन्नदान करना अनिवार्य कहा गया है। इसके अतिरिक्त, अश्वमेध यज्ञ के स्नान, वेदविद् ब्राह्मण को सर्वस्व दान, सरस्वती, गंगा और यमुना के संगम पर तीन रात्रियों के उपवास सहित तीनों कालों के स्नान तथा सेतुबन्ध रामेश्वरम् व काशी (वाराणसी) जैसे पावन तीर्थों में स्नान से भी ब्रह्महत्या का निवारण संभव बताया गया है।
वहीं, सुवर्ण की चोरी करने वाले के लिए दंड भोगना अथवा जीर्ण वस्त्र पहनकर वन में प्रायश्चित्त-व्रत करना, और मद्यपान के निवारण हेतु तप्त मदिरा, दुग्ध अथवा गोमूत्र का सेवन जैसे अचूक नियम बताए गए हैं।
चतुर्दशी का गुप्त यम-तर्पण और अमावस्या की शक्ति
गरुड़ पुराण में यह रहस्य भी खुलता है कि काल और तिथियों के विशेष संयोग से बड़े से बड़े पापों की जड़ें कट जाती हैं।
- कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि पर पवित्र नदी में स्नान करके शांत मन से ॐकार सहित यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल और सर्वभूतक्षय—इन सात नामों का उच्चारण करते हुए तिल युक्त सात जलांजलियों से तर्पण करने पर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
- अमावस्या तिथि पर देवाधिदेव महादेव की सम्यक् आराधना करने और ब्राह्मणों को भोजन कराने से भी सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं।
- इसके साथ ही, कार्तिक शुक्ल षष्ठी के उपवास के बाद सप्तमी को सूर्य पूजन और शुक्ल एकादशी के निराहार व्रत के बाद द्वादशी को भगवान विष्णु की पूजा करने से महापापों से छुटकारा मिल जाता है।
दान का अक्षय फल और गया का परम मोक्ष-द्वार
पुराण के अनुसार, सूर्य और चन्द्र ग्रहण, विषुवकाल, उत्तरायण, दक्षिणायन और संक्रान्ति के समय दिया गया दान अक्षय हो जाता है। वस्त्र, गौ, बैल, धान्य, छत्र (छाता), उपानह (जूते) और औषधि का दान मनुष्य को परलोक के भीषण कष्टों और असिपत्रवन जैसे भयानक मार्गों की पीड़ा से बचा लेता है।
इस संपूर्ण रहस्यमयी गाथा का चरम निष्कर्ष ‘गया’ तीर्थ से जुड़ा है। स्वयं भगवान विष्णु के वचनों का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि गया तीर्थ स्थित फल्गु नदी में श्रद्धापूर्वक स्नान, पूजन और श्राद्ध-तर्पण करने वाला मनुष्य बड़े से बड़े पातकों के बंधन से सदा के लिए मुक्त होकर परम पुण्य और सदाचरण का फल प्राप्त कर लेता है।
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