यमलोक की लोहे की जंजीरें और हिमालय का वह गुप्त रहस्य: माँ नन्दा की कृपा का अलौकिक आख्यान

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यमलोक की लोहे की जंजीरें और हिमालय का वह गुप्त रहस्य: माँ नन्दा की कृपा का अलौकिक आख्यान

१. पावन मानसखण्ड और आदि-रहस्य

नैमिषारण्य के शांत तपोवन में जब शौनकादि तपस्वी ऋषियों ने परम तत्ववेत्ता महर्षि व्यास से हिमालय के मानसखण्ड का गूढ़ माहात्म्य जानने की प्रार्थना की, तब महर्षि व्यास ने एक ऐसे पावन क्षेत्र का रहस्य उजागर किया जहाँ कर्म के कठोरतम बंधन भी भगवती की अहैतुकी कृपा से क्षणभर में छिन्न-भिन्न हो जाते हैं।

महर्षि व्यास बोले— “हे मुनिवरों! नन्द पर्वत से लेकर काकगिरि तक का दिव्य विस्तार मानसखण्ड कहलाता है। इसके दक्षिणांचल में महामहिम ‘नन्दगिरि’ अवस्थित है, जहाँ साक्षात जगज्जननी भुवनेश्वरी माँ नन्दा नित्य निवास करती हैं। यह वही योगमाया हैं, जो द्वापर युग के आरम्भ में नन्दगोप के घर अवतरित हुईं और कंस द्वारा शिलापृष्ठ पर पटके जाने पर आकाश मार्ग से इसी पावन नन्द पर्वत पर आकर प्रतिष्ठित हो गईं।”

व्यास जी ने आगे कहा— “इस भूमण्डल पर नन्दगिरि के समान पापहारक कोई अन्य क्षेत्र नहीं है। यहाँ माँ नन्दा के दर्शन मात्र से मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर ऐश्वर्यवान हो जाता है। किन्तु इस पर्वत की सर्वोच्च महिमा यह है कि यहाँ समाज द्वारा तिरस्कृत और धर्मशास्त्रों की दृष्टि में घोर कलंकिता नारी भी यमराज के पाश से मुक्त होकर सीधे परमपद को प्राप्त कर लेती है।”

२. चंद्रमुखी मेनका और नियति का आघात

सत्ययुग के उषाकाल की घटना है। महर्षि पुलस्त्य के पवित्र कुल में एक कन्या का प्रादुर्भाव हुआ, जिसका नाम मेनका था। वह चन्द्रमा की शीतल कान्ति के समान अनुपम सुंदरी, विशालाक्षी और समस्त शुभ लक्षणों से संपन्न थी।

जब मेनका विवाह योग्य हुई, तब उसके पिता ने उसका पाणिग्रहण अत्रि-गोत्र में उत्पन्न परम ज्ञानी, संयमी और सदाचारी ब्राह्मण सन्तनाख्य (सन्तन्) के साथ वैदिक विधि से करा दिया। दोनों का दांपत्य जीवन धर्म और प्रेम की मधुर छाँव में आनंदपूर्वक व्यतीत हो रहा था।

किन्तु नियति का चक्र बड़ा निष्ठुर होता है। एक दिन विप्र सन्तन् पवित्र सरयू नदी के तट पर स्नान करने गए। वे अपनी सुरीली वाणी में वैदिक ऋचाओं का गान करते हुए जैसे ही पावन जल में प्रविष्ट हुए, अचानक एक विशाल ग्राह (मगरमच्छ) ने उन्हें गहरे जल में खींच लिया। देखते ही देखते वे जलसमाधि में लीन हो गए।

पति की मृत्यु का समाचार मिलते ही मेनका पर मानो वज्रपात हो गया। पतिव्रता साध्वी ने सती होने की ठान ली। किन्तु वह गर्भवती थी, अतः धर्मवेत्ताओं और स्वजनों ने शास्त्र-मर्यादा का स्मरण कराकर उसे सती होने से रोक दिया।

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३. कपटी छल और बीहड़ कंदराएँ

पति के वियोग में मेनका ने अपने आंसुओं को पीकर कठोर वैधव्य धर्म स्वीकार किया। दसवें मास में उसने एक देवतुल्य तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। वह अपने आचरण और तपस्या से उस बालक का लालन-पालन कर रही थी।

एक दिन उसके द्वार पर कल्पवृक्ष के समान सौम्य, तेजस्वी ब्रह्मचारी के वेश में एक आगंतुक आया। साध्वी मेनका ने उसे श्रेष्ठ अतिथि मानकर श्रद्धापूर्वक फल-जल से उसका सत्कार किया और रात्रि विश्राम के लिए स्थान दिया।

किन्तु वह ब्रह्मचारी नहीं, अपितु वेश बदलकर आया एक धूर्त वनचर (भील) था। अर्धरात्रि के गहन सन्नाटे में, जब मेनका अपने नवजात शिशु को सीने से लगाए गहरी नींद में सो रही थी, उस भील ने पलंग सहित उसे उठा लिया और बीहड़ वनों को पार करते हुए हिमालय की दुर्गम गुफाओं में बंदी बना लिया।

असहाय मेनका को उस वनचर के अधीन रहना पड़ा। इस अवांछित परिस्थिति के कारण सांसारिक और सामाजिक दृष्टि से उस पर ‘पुंश्चली’ (पति-विहीन होकर अन्य पुरुष के अधीन रहने वाली) का अमिट कलंक लग गया।

४. गुप्त स्वर्ण और चेतना का जागरण

दिन बीतते गए। मेनका ने उस बीहड़ वन में एक रहस्यमयी क्रम देखा। वह भील प्रतिदिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठता, गंगाजल, चन्दन, अक्षत, धूप और सुगन्धित वन्य पुष्पों का थाल सजाता और चुपचाप कहीं चला जाता। लौटते समय उसके पास भारी मात्रा में विशुद्ध स्वर्णराशि (सोने का ढेर) होती थी।

एक दिन मेनका ने कौतूहल और विनम्रता से पूछा— “हे वनचर! यदि मैं तुम्हारी प्रिय हूँ, तो सच बताओ—तुम प्रतिदिन यह पूजा की सामग्री लेकर किस बीहड़ में जाते हो और यह अकूत स्वर्ण कहाँ से लाते हो?”

भील ने रहस्य पर से पर्दा उठाते हुए कहा— “मेनके! यहाँ से कुछ ही दूरी पर जो उत्तुंग हिमशिखर दिखता है, वह पुण्यमय नन्दगिरि है। वहाँ दो शिखरों के मध्य एक परम पावन ‘नन्दासर’ (नन्दा सरोवर) विद्यमान है। मैं वहाँ नियमपूर्वक स्नान कर पहले नन्दिकेश्वर महादेव की अर्चना करता हूँ और फिर शिखर पर विराजमान जगदम्बा भुवनेश्वरी माँ नन्दा को गंध-पुष्प और वस्त्र अर्पित करता हूँ। मेरी पूजा से संतुष्ट होकर जगन्माता मुझे प्रतिदिन यह स्वर्णभार प्रदान करती हैं।”

भील की यह बात सुनते ही मेनका के भीतर सोई हुई चेतना की दिव्य अग्नि प्रज्वलित हो उठी। उसने सोचा— “जो करुणामयी माँ एक वनचर की साधारण पूजा से इतना ऐश्वर्य दे सकती हैं, क्या वे मुझ जैसी विवश, आहत और संसार द्वारा त्यागी गई नारी के संचित पापों का नाश नहीं कर सकतीं?”

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५. नन्दासर का महातप और आर्त पुकार

उस दिन के बाद मेनका का जीवन पूर्णतः बदल गया। सांसारिक सुख और स्वर्ण की माया उसके लिए तिनके के समान हो गई। वह प्रतिदिन नन्द पर्वत की ओर प्रस्थान करती, हिमाच्छादित नन्दा सरोवर के शीतल जल में डुबकी लगाती और नन्दिकेश्वर शिव की आराधना करती।

तदुपरांत, वह कठिन चढ़ाई चढ़कर नन्दगिरि के शिखर पर पहुँचती और भगवती योगमाया नन्दा के श्रीचरणों में अपना माथा टेककर अश्रुधारा बहाते हुए प्रार्थना करती:

नारायणि महामाये हिमाद्रितनये शुभे। पुंश्चल्या धर्महीनायाः पातकान् मे विनाशय॥ (स्कन्दपुराण, मानसखण्ड २२/५४-५५)

भावार्थ: “हे नारायणी! हे महामाये! हे गिरिराज हिमाद्रि की पावन पुत्री! हे मंगलकारिणी माँ नन्दा! मुझ जैसी असहाय, धर्महीन और लोकनिंदित नारी के समस्त पापों और कर्मबंधनों का समूल नाश कर मुझे अपनी शरण में ले लो।”

मेनका वर्षों तक इसी अनन्य भाव, उपवास और पश्चाताप की अग्नि में तपती रही। अंततः वृद्धावस्था में काल के प्रभाव से उसका भौतिक शरीर शांत हो गया।

६. यमलोक की जंजीरें और कालिका का प्राकट्य

चूँकि सामाजिक और स्थूल कर्मकांडीय नियमों के अनुसार मेनका को ‘पुंश्चली’ माना गया था, अतः देहत्याग करते ही भयानक यमदूत वहाँ पहुँचे। उन्होंने मेनका की आत्मा को लोहे की भारी, दहकती जंजीरों में जकड़ लिया और घसीटते हुए सीधे यमलोक ले गए। धर्मराज यम ने उसे घोर नरक की यातना भुगतने का आदेश दिया।

उसी क्षण नन्द पर्वत पर विराजित माँ नन्दा के करुणामय नेत्रों ने अपनी शरणागत भक्त पर आए इस संकट को देखा। माँ का वात्सल्य जाग उठा। उन्होंने तुरंत महाप्रलयंकारी माँ कालिका को सम्मुख बुलाया और आज्ञा दी— “हे कल्याणी! अविलंब धर्मराज यम की सभा में जाओ। जिस जीवात्मा ने मेरे नन्दासर में स्नान कर मेरी शरण ली हो, उसे यमदंड का स्पर्श भी नहीं हो सकता। मेरी भक्त मेनका को आदरपूर्वक यहाँ ले आओ!”

हाथों में चमचमाता त्रिशूल लिए जब महाकालिका यमपुरी में प्रविष्ट हुईं, तो यमलोक का कोना-कोना कांप उठा। कालिका ने गर्जना करते हुए कहा— “धर्मराज! जगन्माता नन्दा की अनन्य सेविका मेनका को तुमने लोहे की जंजीरों में क्यों बांधा है? इसे तुरंत मुक्त करो!”

७. महाकालिका का दिव्य उद्घोष

धर्मराज यम ने भयभीत होकर हाथ जोड़े और विनम्रता से शास्त्र-मर्यादा का तर्क प्रस्तुत किया— “हे देवी! देवलोक में केवल पतिव्रताओं का वास नियत है। जो स्त्री पर-पुरुष के संग रही हो, वह यमलोक के दण्ड की ही पात्री है। सैकड़ों तीर्थ, महायज्ञ और कायक्लेश भी ऐसी पतित नारी को शुद्ध नहीं कर सकते। यही सनातन कर्म-सिद्धांत है।”

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यमराज की बात सुनकर माँ कालिका ने मुस्कुराते हुए हिमालय के उस परम गोपनीय सत्य का अनावरण किया:

नन्दासरस्य माहात्म्यं त्वया न ज्ञायते यम। तथैव पर्वते पुण्ये देवीपूजनजं फलम्॥ ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते यत्र वै जनः। (स्कन्दपुराण, मानसखण्ड २२/६८-६९)

भावार्थ: “हे यमराज! तुम नन्दा सरोवर की महिमा और नन्दगिरि पर माँ नन्दा के पूजन का आध्यात्मिक प्रभाव नहीं जानते! यह साधारण पर्वत नहीं, अपितु यहाँ साक्षात भगवान जनार्दन (विष्णु) पर्वत रूप में प्रतिष्ठित हैं। इस क्षेत्र में माँ नन्दा की शरण लेने पर मनुष्य ब्रह्महत्या जैसे घोर पातक से भी मुक्त हो जाता है, फिर सामाजिक विवशताओं के कलंक की क्या बिसात?”

८. जंजीरों का भंजन और दिव्य परमपद

इतना कहकर माँ कालिका ने आगे बढ़कर अपने दिव्य कर-कमलों से मेनका को छू लिया। देवी का स्पर्श होते ही लोहे की भारी जंजीरें मोम की तरह पिघलकर टूट गईं।

क्षणभर में मेनका का समस्त संताप, मलिनता और कलंक तिरोहित हो गया। वह साक्षात भगवती महालक्ष्मी के समान दिव्य रूप और तेजोमय कान्ति धारण कर जगमगाने लगी।

माँ कालिका उसे ससम्मान नन्द पर्वत पर ले आईं। जगज्जननी माँ नन्दा ने अपनी इस तपस्वी पुत्री को अमृतमयी दृष्टि से निहारा और उसे दिव्य विमान में आरूढ़ कर अप्सराओं से सुशोभित अमरलोक (परमधाम) में प्रतिष्ठित कर दिया।

कालांतर में माँ नन्दा की पूजा के प्रभाव से वह वनचर भी अपने समस्त विकारों से मुक्त हुआ और अंत में शिवलोक को प्राप्त हुआ।

९. शाश्वत संदेश और फलश्रुति

महर्षि व्यास शौनकादि ऋषियों से कहते हैं— “हे मुनिश्रेष्ठों! हिमालय की ईष्ट देवी माँ नन्दा की यह कथा प्रत्यक्ष प्रमाण है कि संसार जिसे ठुकरा देता है, काल जिसे दंडित करता है, जब वह सच्चे मन से माँ नन्दा के चरणों में समर्पित हो जाता है, तो स्वयं यमराज का विधान भी निष्प्रभावी हो जाता है। जो मनुष्य इस नन्दा-माहात्म्य को श्रद्धापूर्वक पढ़ता या सुनता है, वह इस लोक में आरोग्य, ऐश्वर्य, सुख और संतति को प्राप्त करता है तथा अंत काल में भवबंधन से मुक्त होकर परम मोक्ष पाता है।”

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणान्तर्गत मानसखण्डे नन्दामाहात्म्यं सम्पूर्णम् ॥ @ रमाकांत पंत@

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