नैनीताल/हल्द्वानी: कुमाऊँ अंचल की ऐतिहासिक एवं शास्त्रीय गायन शैली पर आधारित रामलीलाओं के मंचन से पूर्व कलाकारों के चयन को लेकर सनातन धर्मशास्त्रों और पुराणों के प्रामाणिक संदर्भ सामने आए हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की माता अथवा पिता का देहांत हुआ हो और एक वर्ष पूर्ण होकर वार्षिक श्राद्ध (बरसी) न हुआ हो, तो उसके लिए रंगमंच पर अभिनय, रूप-सज्जा और गायन-वादन पूर्णतः वर्जित है।
गरुड़ पुराण: प्रेत कल्प (अध्याय 13 एवं अध्याय 34) का शास्त्रीय प्रमाण धार्मिक विद्वानों और कर्मकांड आचार्यों के अनुसार गरुड़ पुराण (प्रेत कल्प / उत्तर खण्ड) के अध्याय 13 (सपिण्डीकरण व एकोद्दिष्ट श्राद्ध विधान) तथा अध्याय 34 (संवत्सर अशौच एवं आचरण नियम) में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि माता-पिता के निधन के बाद पूरे एक वर्ष (संवत्सर) तक पुत्र को विलास व आमोद-प्रमोद से दूर रहना चाहिए:
“यावत् संवत्सरो नास्ति तावत् प्रेतत्वमुच्यते। गीतं वाद्यं तथा नृत्यं उत्सवं च विवर्जयेत्॥” (गरुड़ पुराण, प्रेत कल्प)
अर्थ: जब तक एक वर्ष पूर्ण होकर वार्षिक श्राद्ध और सपिण्डीकरण संस्कार संपन्न नहीं हो जाता, तब तक वह काल ‘संवत्सर’ (शोक व संयम काल) कहलाता है। इस अवधि में पुत्र को गीत, वाद्य, नृत्य, रंगमंच अभिनय, उत्सव और श्रृंगार का पूरी तरह त्याग करना चाहिए।
शास्त्रों के अनुसार यह अवधि दिवंगत आत्मा की सद्गति और शांति हेतु तपस्या, सादगी और आत्म-संयम की मानी जाती है। ऐसे में मंच पर पात्र बनकर मुकुट, वेशभूषा और रंग-रोगन (श्रृंगार) धारण करना गरुड़ पुराण की मर्यादाओं के सर्वथा प्रतिकूल है।
कुमाऊँनी लोक परंपरा में ‘बरसी’ की मर्यादा कुमाऊँ की लोक संस्कृति में इस शास्त्रीय नियम का पालन कड़ाई से किया जाता है:
- जिस परिवार में माता-पिता की बरसी (वार्षिक श्राद्ध) न हुई हो, उस परिवार का सदस्य रामलीला मंचन, होली गायन या किसी भी सार्वजनिक मांगलिक उत्सव में सक्रिय भागीदारी नहीं करता।
- स्थानीय मान्यता के अनुसार, शोक-काल के भीतर मंच पर नवरसों (हास्य, वीर, श्रृंगार आदि) का प्रदर्शन करना और प्रशंसा प्राप्त करना दिवंगत मातृ-पितृ ऋण की मर्यादा के विपरीत माना गया है।
कथा श्रवण व सेवा का मार्ग खुला धर्माचार्यों का कहना है कि यदि व्यक्ति प्रभु श्री राम के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करना चाहता है, तो वह मंच पर अभिनय करने के बजाय दर्शक दीर्घा में बैठकर साधारण रूप से रामकथा का श्रवण कर सकता है अथवा मंच के पीछे व्यवस्थाओं में बिना किसी उत्सव-भाव के सादगीपूर्ण सहयोग दे सकता है।
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