पुराणों के अनुसार माँ गंगा का अद्भुत रहस्य: ‘त्रिपथगा’ स्वरूप और ब्रह्मांडीय उत्पत्ति
सनातन धर्म के विभिन्न पुराणों (जैसे स्कंद पुराण, विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण) में माँ गंगा के कई रहस्य और अद्भुत कथाएं वर्णित हैं। इनमें से सबसे रहस्यमयी और अद्भुत तथ्य उनका “त्रिपथगा” (तीन पथों या रास्तों पर गमन करने वाली) स्वरूप और उनकी ब्रह्मांड के पार की उत्पत्ति है।
यहाँ पुराणों में वर्णित माँ गंगा के कुछ सबसे अद्भुत रहस्य दिए गए हैं:
एक नहीं, तीन लोकों में बहती हैं गंगा (त्रिपथगा)
हम सामान्यतः केवल पृथ्वी पर बहने वाली गंगा को जानते हैं, लेकिन पुराणों के अनुसार गंगा पूरे ब्रह्मांड के तीनों मुख्य लोकों में प्रवाहित होती हैं। जब गंगा पृथ्वी पर अवतरित होने के लिए भगवान शिव की जटाओं में समाईं और वहां से छूटीं, तो वे तीन अलग-अलग धाराओं में विभाजित हो गईं:
स्वर्ग लोक (मंदाकिनी): स्वर्ग में बहने वाली धारा को ‘मंदाकिनी’ कहा गया, जो देवताओं को पवित्र करती है (केदारनाथ में इसी धारा का अंश माना जाता है)।
पृथ्वी लोक (भागीरथी/गंगा): राजा भगीरथ के कठोर तप से जो धारा पृथ्वी पर आई, वह ‘भागीरथी’ कहलाई, जो मनुष्यों और जीवों का कल्याण करती है।
पाताल लोक (भोगवती):तीसरी धारा पाताल लोक चली गई, जिसे ‘भोगवती’ कहा जाता है। यह धारा नागों, दैत्यों और पाताल वासियों को पवित्र कर उन्हें सद्गति प्रदान करती है। कपिल मुनि के श्राप से भस्म हुए राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को इसी धारा ने पाताल में जाकर तार दिया था।
ब्रह्मांड के आवरण को भेदकर हुआ था जन्म (विष्णुपदी)
पुराणों के अनुसार, गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय जल का दिव्य अंश हैं।
श्रीमद्भागवत के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और अपना दूसरा कदम उठाया, तो उनका पैर इतना विशाल हो गया कि उनके अंगूठे के नाखून से ब्रह्मांड का ऊपरी आवरण (कवच) फट गया। उस दरार से ब्रह्मांड के बाहर का दिव्य कारण-जल अंदर आ गया। ब्रह्मा जी ने उसी जल से भगवान विष्णु के चरण धोए और उसे अपने कमंडल में धारण कर लिया। भगवान विष्णु के चरणों से उत्पन्न होने के कारण ही गंगा को “विष्णुपदी”कहा जाता है।
श्राप से मुक्ति के लिए आठ बच्चों को जल में प्रवाहित करना
महाभारत और पुराणों में यह रहस्य भी मिलता है कि माँ गंगा ने एक बार मनुष्य रूप में भी जन्म लिया था और वे हस्तिनापुर के राजा शांतनु की पत्नी बनी थीं।
कथा के अनुसार, अष्ट वसुओं (आठ देवताओं) को महर्षि वशिष्ठ ने मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दिया था। उन्हें इस श्राप के कष्ट से शीघ्र मुक्त करने के लिए, गंगा ने उनकी माता बनना स्वीकार किया। उन्होंने जन्म लेते ही अपने सात पुत्रों को अपनी ही नदी की धारा में डुबो दिया, ताकि वे धरती के कष्ट भोगे बिना तुरंत देवलोक वापस लौट सकें। आठवें पुत्र को राजा शांतनु ने बचा लिया, जो आगे चलकर ‘भीष्म पितामह’ कहलाए।
दूसरों के पाप धोने वाली गंगा स्वयं कैसे पवित्र होती हैं?
यह एक बहुत बड़ा दार्शनिक रहस्य है कि जब लाखों-करोड़ों लोग गंगा में स्नान कर अपने पाप धोते हैं, तो गंगा उन पापों के बोझ से अशुद्ध क्यों नहीं होतीं?
पुराणों में उल्लेख मिलता है कि माँ गंगा ने भी यही चिंता व्यक्त की थी। तब उन्हें यह वरदान मिला कि जब उच्च कोटि के सिद्ध संत, वीतराग संन्यासी, तपस्वी और ब्रह्मज्ञानी (जिनके हृदय में स्वयं ईश्वर का वास होता है) गंगा के जल में स्नान करेंगे, तो उनके तपोबल और असीम आध्यात्मिक ऊर्जा के स्पर्श से गंगा में संचित सभी पाप और नकारात्मकता भस्म हो जाएगी।
पुराणों की दृष्टि में माँ गंगा महज़ एक भौतिक जलधारा नहीं हैं, बल्कि यह वह परालौकिक ऊर्जा है जो स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—तीनों को एक सूत्र में बांधती है और इस पूरे ब्रह्मांड में चेतना और पवित्रता का संचार करती है।
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