॥ पितृ पक्ष विशेष ॥
कर्म, काल और प्रायश्चित्त का दिव्य दर्पण: महर्षि पराशर की वाणी में कलियुग के धर्म और मर्यादा का अलौकिक विधान
जब गरुड़ पुराण के पन्नों से गूंजी जीवन, मृत्यु, पिण्डदान और आत्मा के रूपांतरण की शाश्वत संहिता
अध्यात्म डेस्क। काल के अनंत प्रवाह में जब-जब कल्पों का परिवर्तन होता है और सृष्टि के सृजन व विनाश के चक्र में प्रजाएं क्षीण होने लगती हैं, तब-तब मन्वादि ज्ञानी वेदों के अमर सूत्रों का पुनः स्मरण कर समाज के लिए मर्यादा का पथ निर्मित करते हैं। संक्षिप्त गरुड़ पुराण के आचार काण्ड (अध्याय १०७) में संकलित सूतजी द्वारा वर्णित महर्षि पराशर और महर्षि वेदव्यास का यह पावन संवाद केवल प्राचीन नियम-पुस्तिका नहीं, अपितु जीवन, मृत्यु और आत्मा के मोक्ष व शांति का ऐसा दिव्य दर्पण है, जो मनुष्य को उसके परम उत्तरदायित्व का बोध कराता है।
१. कलियुग का मर्म: जहाँ दान ही परम धर्म और आचार ही प्राण है
महर्षि पराशर के अनुसार, कलियुग की विषम वेला में कल्याण का सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग ‘दान’ है। इस युग की गति इतनी तीव्र है कि पाप और शाप दोनों ही मात्र एक संवत्सर (एक वर्ष) के भीतर अपना फल प्रदान कर देते हैं। इसलिए कलियुग में केवल पापी के संग का परित्याग करने का विधान दिया गया है।
महर्षि उद्घोष करते हैं कि मनुष्य जीवन की समस्त सिद्धियाँ ‘सदाचार और शौचाचार’ से ही संभव हैं। उन्होंने प्रतिदिन छह कर्मों—संध्या, स्नान, जप, होम, देवपूजन और अतिथिसत्कार—को मनुष्य के दैनिक जीवन का अनिवार्य अंग बताया। समाज के संतुलन हेतु क्षत्रिय का धर्म शत्रु-दमन कर पृथ्वी का रक्षण करना, वैश्य का कार्य कृषि व वाणिज्य तथा शूद्र का कर्तव्य सेवा-धर्म बताया गया है। वहीं, अभक्ष्य-भक्षण, चोरी और अगम्यागमन को आत्मा का पतन कराने वाले घोर कर्मों के रूप में रेखांकित किया गया है।
२. मूक पशुओं के प्रति करुणा और धरती की उपज का न्याय
पराशर स्मृति के इस आख्यान में पर्यावरण और पशु-कल्याण का अनुपम संवेदनशील पक्ष उजागर होता है। यदि द्विज कृषि कार्य करता है, तो उसे यह कठोर निर्देश दिया गया है कि वह थके हुए बैल से हल न खिंचवाए और न ही उस पर क्रूरतापूर्वक भार लादे। गृहस्थ जीवन में चूल्हा, चक्की आदि के उपयोग से होने वाली सूक्ष्म जीव-हिंसा (पंचसूना दोष) के निवारण के लिए ‘बलिवैश्वदेव’ होम का आदेश दिया गया है।
कृषि की उपज पर एकाधिकार का निषेध करते हुए महर्षि कहते हैं कि किसान अपनी फसल का छठा भाग राजा को, बीसवाँ भाग देवताओं को और तैंतीसवाँ भाग वेदपाठी ब्राह्मणों को अर्पित करे। ऐसा करने से कृषि-कर्म में अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है; अन्यथा फसल का न्यायसंगत अंश न देने वाला मनुष्य चोर के समान दंड का भागी होता है।
३. अशौच और पिण्डदान का विधान: देह, संबंध और पितृ-ऋण
जीवन के आरंभ (जन्म) और अंत (मृत्यु) पर लगने वाले अशौच का अत्यंत सूक्ष्म विभाजन यहाँ प्रस्तुत किया गया है। सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु-अशौच जहाँ ब्राह्मण के लिए तीन दिन (अन्य संदर्भों में दस दिन), क्षत्रिय के लिए दस से बारह दिन, वैश्य के लिए बारह से पंद्रह दिन और शूद्र के लिए एक मास तक मान्य है। वहीं कुल-परंपरा (सपिण्ड) में पीढ़ियों के अनुसार शुद्धि का काल घटता जाता है—चौथी पीढ़ी में दस दिन, पाँचवीं में छह दिन, छठवीं में चार दिन और सातवीं पीढ़ी में मात्र तीन दिन का अशौच रहता है।
पितृ-कर्म के संदर्भ में यह स्पष्ट विधान है कि औरस और क्षेत्रज दोनों ही पुत्र एक पिता के पुत्र माने गए हैं, अतः वे दोनों अपने पिता के लिए पिण्डदान के पूर्ण अधिकारी हैं। समाज के संचालन को गतिमान रखने के लिए राजा, वैद्य, शिल्पी, सेवक और संन्यासी जैसे लोक-उपयोगी व्यक्तियों को ‘सद्यःशौच’ (तत्काल शुद्ध) की श्रेणी में रखा गया है ताकि जनकल्याण के कार्य बाधित न हों।
४. संबंध, विवाह और नारी-सम्मान का यथार्थवादी दृष्टिकोण
पारिवारिक मर्यादा के संदर्भ में महर्षि पराशर अत्यंत व्यावहारिक और मानवीय दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। जहाँ ज्येष्ठ भ्राता के अविवाहित रहते कनिष्ठ के विवाह (परिवेत्ता दोष) पर प्रायश्चित्त व्रत का विधान है, वहीं यदि बड़ा भाई कुबड़ा, बौना, नपुंसक, मूक, बधिर, जन्मांध या हकलाने वाला हो, तो छोटे भाई द्वारा विवाह करने को सर्वथा निर्दोष माना गया है।
विशेष रूप से, वाग्दत्ता (सगाई हो चुकी) कन्या के जीवन को सुरक्षा प्रदान करते हुए महर्षि पाँच विषम परिस्थितियों में स्पष्ट अधिकार देते हैं—यदि होने वाला पति विदेश चला जाए, उसकी मृत्यु हो जाए, वह संन्यास ले ले, नपुंसक हो अथवा पतित हो जाए, तो इन ‘पाँच आपदाओं’ में कन्या को अन्य वर का वरण करने का पूर्ण अधिकार है।
५. प्रायश्चित्त की पावन अग्नि: भूलों के परिमार्जन से आत्मोद्धार
गरुड़ पुराण का यह अध्याय बताता है कि सनातन धर्म दंड से अधिक ‘संस्कार और शुद्धि’ पर बल देता है। आत्महत्या, विषपान अथवा अकाल मृत्यु के मामलों में बिना विशेष प्रायश्चित्त के अंतिम संस्कार का निषेध है। परदेश में देहावसान होने पर कुश और छह सौ पलाश के पत्तों से सांकेतिक शरीर निर्मित कर वैदिक मंत्रों के साथ दाह-संस्कार का विधान दिया गया है, जो दिवंगत आत्मा की शांति के प्रति सनातन आस्था को प्रकट करता है।
पक्षियों (हंस, मोर, सारस) और चौपाए पशुओं के अनजाने वध पर गायत्री जप एवं अहोरात्र उपवास से लेकर मनुष्य-वध के पाप-निवारण हेतु कृच्छ्र, अतिकृच्छ्र और चान्द्रायण जैसे कठोर तपस्या-व्रतों का विधान दिया गया है।
महर्षि पराशर का यह उपदेश स्पष्ट करता है कि मनुष्य का प्रत्येक कर्म यदि विवेक, करुणा, मर्यादा और पितरों के प्रति कृतज्ञता के सूत्र में बंधा है, तो वही सच्चा धर्म है।
प्रस्तुति एवं संकलन: @ रमाकान्त पन्त @
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