सनातन धर्म में सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण को केवल एक खगोलीय घटना ही नहीं, बल्कि एक अत्यंत संवेदनशील और आध्यात्मिक समय माना जाता है। पौराणिक व ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण के दौरान ब्रह्मांड में नकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ जाता है, जिसे ‘सूतक काल’ कहा जाता है। इस अवधि में देवी-देवताओं की मूर्तियों की पवित्रता बनाए रखने के लिए देश के लगभग सभी छोटे-बड़े मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और पूजा-पाठ वर्जित होता है।
लेकिन, भारत की इस पुण्य भूमि पर कुछ ऐसे जाग्रत और सिद्ध मंदिर भी मौजूद हैं, जो प्रकृति के इन खगोलीय नियमों और सूतक की सीमाओं से पूर्णतः मुक्त हैं। इन मंदिरों की परंपराएं अद्भुत हैं और यहाँ ग्रहण के दौरान भी कपाट खुले रहते हैं। आइए, उन विशेष मंदिरों के दर्शन करें:
१. श्रीकालहस्ती मंदिर (आंध्र प्रदेश) – ब्रह्मांडीय ऊर्जा का केंद्र
दक्षिण भारत का यह प्राचीन शिव मंदिर संभवतः देश का सबसे प्रमुख ऐसा स्थान है, जहाँ ग्रहण काल के दौरान न केवल कपाट खुले रहते हैं, बल्कि विशेष अनुष्ठान भी संपन्न होते हैं।
पौराणिक महत्व: श्रीकालहस्ती मंदिर में भगवान शिव ‘वायु लिंग’ (पंचभूत लिंगों में से एक) के रूप में विराजमान हैं। यहाँ के मुख्य देवता के कवच पर सभी २७ नक्षत्रों और ९ ग्रहों के प्रतीक स्पष्ट रूप से अंकित हैं। इसका अर्थ यह है कि भगवान शिव स्वयं संपूर्ण ब्रह्मांड और ग्रहों के अधिपति हैं, अतः उन पर किसी ग्रह दोष या ग्रहण का प्रभाव नहीं पड़ सकता।
विशेषता: जब पूरी दुनिया के मंदिर सूतक में बंद होते हैं, तब यहाँ ‘ग्रहण कालाभिषेकम’ (Grahana Kalabhishekam) किया जाता है। जिन भक्तों की कुंडली में राहु-केतु दोष या कालसर्प योग होता है, वे विशेष रूप से ग्रहण के समय यहाँ शांति पूजा कराने आते हैं।
२. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग (उज्जैन, मध्य प्रदेश) – कालों के काल महाकाल
उज्जैन स्थित भगवान महाकालेश्वर १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं और इन्हें तीनों लोकों का स्वामी व ब्रह्मांड का अधिपति माना जाता है।
पौराणिक महत्व: ‘महाकाल’ का शाब्दिक अर्थ ही है जो समय (काल) और मृत्यु की सीमाओं से परे हो। जब समय स्वयं उनके अधीन है, तो खगोलीय समय-चक्र की एक घटना (ग्रहण) उन पर अपना क्या प्रभाव डाल सकती है? इसी अगाध विश्वास के कारण महाकाल मंदिर पर सूतक लागू नहीं होता।
विशेषता: यहाँ भक्त ग्रहण के दौरान भी निर्बाध रूप से भगवान के दर्शन कर सकते हैं। यद्यपि सूतक के सामान्य नियमों का सम्मान करते हुए मूर्तियों के स्पर्श पर कुछ प्रतिबंध हो सकते हैं और आरती के समय में थोड़ा बदलाव किया जा सकता है, परंतु मंदिर के कपाट कभी बंद नहीं किए जाते।
३. विष्णुपद मंदिर (गया, बिहार) – मोक्ष और पितृ शांति का द्वार
बिहार के गया में फल्गु नदी के तट पर स्थित यह मंदिर पितरों के श्राद्ध और मोक्ष प्राप्ति के लिए विश्वविख्यात है।
पौराणिक महत्व: शास्त्रों में यह स्पष्ट रूप से वर्णित है कि ग्रहण के समय किया गया दान, जप और पितरों के निमित्त तर्पण हजार गुना अधिक फलदायी होता है। विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के साक्षात् पदचिह्न (पैरों के निशान) मौजूद हैं।
विशेषता: ग्रहण के दौरान इस मंदिर की महत्ता और भी अधिक बढ़ जाती है। यहाँ कपाट खुले रहते हैं क्योंकि इस काल में यहाँ किया गया ‘पिंडदान’ और पितृ-तर्पण आत्माओं को सीधे मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है।
४. लक्ष्मीनाथ मंदिर (बीकानेर, राजस्थान) – वात्सल्य और अगाध भक्ति का प्रतीक
राजस्थान के बीकानेर में स्थित श्री लक्ष्मीनाथ जी का मंदिर अपनी एक अनूठी और भावपूर्ण पौराणिक कथा के लिए जाना जाता है।
पौराणिक महत्व: स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, प्राचीन काल में एक बार ग्रहण के सूतक के कारण मंदिर के कपाट बंद कर दिए गए और भगवान को समय पर भोग नहीं लगाया गया। ऐसा माना जाता है कि तब भगवान लक्ष्मीनाथ ने एक भूखे बालक का रूप धारण किया और पास की एक दुकान पर जाकर मिठाई खाई। अगले दिन मंदिर परिसर में उसी बालक के रहस्यमयी पदचिह्न प्राप्त हुए।
विशेषता: इस वात्सल्यमयी घटना के बाद से पुजारियों ने यह नियम बना लिया कि भगवान को कभी भूखा नहीं रखा जाएगा। इसलिए, खगोलीय स्थिति चाहे जो भी हो, इस मंदिर के कपाट बंद नहीं होते और भगवान को उनके नियत समय पर नियमित रूप से भोग लगाया जाता है।
सनातन धर्म की यह सबसे बड़ी सुंदरता है कि वह जहाँ एक ओर खगोलीय ऊर्जाओं के वैज्ञानिक प्रभावों का सम्मान करते हुए ‘सूतक’ जैसे नियम बनाता है, वहीं दूसरी ओर ‘ईश्वर की सर्वव्यापकता और सर्वोच्च सत्ता’ को उन नियमों से ऊपर रखता है। ये मंदिर इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि ईश्वर प्रकृति के नियमों को बनाते अवश्य हैं, परंतु वे स्वयं उन नियमों से बंधे नहीं हैं। उत्तराखण्ड के भीतर भी कुछ ऐसे मंदिर है जिनके कपाट खुले रहते है
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