सिर्फ एक बार मुलाकात का मौका दे दे…

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शाम धीरे-धीरे पहाड़ की देहरी पर उतर आई थी। ठंडी हवा में देवदार की खुशबू घुली हुई थी और आंगन में जलता दीया मानो किसी की राह देख रहा हो। उसी दीये की लौ के सामने बैठा वह बुज़ुर्ग, हर रोज़ की तरह आज भी उसी पगडंडी की ओर टकटकी लगाए था जहाँ से बरसों पहले उसका अपना शहर की भीड़ में खो गया था।
उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे, शायद आँसू भी थक चुके थे। बचा था तो सिर्फ़ इंतज़ार… और एक ऐसी ख़ामोशी, जो शब्दों से ज़्यादा बोलती है। वह कभी शिकायत नहीं करता, न किसी से नाराज़ होता। बस हर शाम ईश्वर से एक ही विनती करता
“सब कुछ ले लेना प्रभु… बस एक बार मुलाकात का मौका दे देना।”
घर की दीवारों पर टंगी तस्वीरें आज भी बीते कल की कहानी कहती हैं। किसी तस्वीर में बेटे की मुस्कान है, किसी में माँ के आँचल की छाँव। कभी इसी आंगन में हँसी गूंजती थी, पर्व-त्योहारों में ढोल-दमाऊ बजते थे। आज वही आंगन सूना है, और उस सन्नाटे में सिर्फ़ बूढ़े दिल की धड़कन सुनाई देती है।
वह बूढ़ा अक्सर बेटे की छोड़ी हुई कुर्सी को सहलाता है, मानो वह वहीं बैठा हो। कभी चाय का कप दो रख देता है फिर खुद ही मुस्कुरा कर एक हटा लेता है।
“शायद अगली बार…” वह खुद से कहता है।
उधर शहर की चमक-दमक में उलझा बेटा शायद नहीं जानता कि उसके “फिर मिलेंगे” कहने के पीछे किसी की रातें जाग-जाग कर कट जाती हैं। किसी की सुबह उसी उम्मीद से जन्म लेती है कि आज दरवाज़ा खुलेगा और सामने वही अपना होगा—बिना जल्दबाज़ी, बिना मोबाइल की घंटी के, बस दो पल का सुकून लेकर।
यह कहानी सिर्फ़ एक पिता की नहीं है। यह उन तमाम माँ-बाप की पीड़ा है, जिनके बच्चे सपनों की तलाश में दूर चले गए हैं। यह उस प्रेम की कहानी है, जो बदले में कुछ नहीं चाहता—न पैसा, न शोहरत—बस अपने होने का एहसास।
कभी-कभी ज़िंदगी से बहुत ज़्यादा नहीं चाहिए होता।
कभी-कभी तो बस इतना ही काफ़ी होता है—
सिर्फ़ एक बार मुलाकात का मौका दे दे…

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