शत्रुनाशिनी और संकटमोचनी ‘माँ बगलामुखी’: जानिए विष्णु चिन्ताहरणी पीताम्बरा देवी की अलौकिक महिमा और रहस्य

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विशेष रिपोर्ट: दश महाविद्याओं में पंचम शक्ति माँ पीताम्बरा की महिमा

सृष्टि की दश महाविद्याओं में प्रमुख स्थान रखने वाली माँ बगलामुखी (जिन्हें पीताम्बरी या पीताम्बरा देवी भी कहा जाता है) की साधना तंत्रशास्त्र में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है। आज के भौतिकवादी और संघर्षपूर्ण युग में, जहाँ ईर्ष्या, राग-द्वेष और असुरक्षा का माहौल है, माँ बगलामुखी की शरण लेना भक्तों के लिए सुख, शांति और निर्भयता का सबसे बड़ा मार्ग बन गया है।

आइए जानते हैं माँ पीताम्बरा की उत्पत्ति, उनके स्वरूप और उनकी साधना के उन रहस्यों को, जिनका उल्लेख हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में मिलता है।

पीताम्बरी स्वरूप का रहस्य

धर्मग्रंथों के अनुसार, अपनी उत्पत्ति के समय माँ भगवती पीले सरोवर के ऊपर पीले वस्त्रों से सुशोभित थीं। उनके शरीर से एक अद्भुत कंचन (स्वर्णिम) आभा निकल रही थी। इसी दिव्य स्वरूप के कारण साधकों और भक्तों ने उन्हें ‘पीताम्बरी’ अथवा ‘पीताम्बरा’ देवी के नाम से पुकारा।

क्यों कहलाती हैं ‘विष्णु चिन्ताहरणी’?

पौराणिक कथाओं में उल्लेख है कि ‘कृत’ युग में एक बार अत्यंत विनाशकारी और महाप्रलयंकारी तूफान आया, जिससे पूरी सृष्टि के नष्ट होने का संकट खड़ा हो गया। जगत के पालनहार भगवान विष्णु भी इस वातक्षोभ (तूफान) को देखकर चिंतित हो उठे।

  तब श्री हरि विष्णु ने सौराष्ट्र के ‘हरिद्रा’ नामक सरोवर के किनारे महात्रिपुर सुन्दरी को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की।

 उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर श्री विद्या महात्रिपुर सुन्दरी ने ‘बगलामुखी’ के रूप में प्रकट होकर उस विनाशकारी तूफान को शांत किया और संसार की रक्षा की। इसी कारण माँ को ‘विष्णु चिन्ताहरणी’ भी कहा जाता है।

प्रभु श्री राम और श्री कृष्ण की आराध्या

माँ बगलामुखी का प्रभाव और प्रताप इतना अधिक है कि स्वयं भगवान भी उनकी स्तुति करते हैं।

 प्रभु श्री राम पर माँ की असीम कृपा थी, जिस कारण इन्हें ‘रामाप्रपूजिता’ कहा जाता है।

  योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण की आराध्या होने के कारण माँ को केशवस्तुता’ के नाम से भी वंदित किया जाता है।

बगलामुखी’ नाम का वास्तविक अर्थ

अक्सर जनसामान्य ‘बगलामुखी’ का अर्थ ‘बगुला पक्षी’ के मुख वाली देवी से लगा लेते हैं, जो कि एक भ्रांति है। प्राचीन ग्रंथों में देवी को मूल रूप से बल्गामुखी’ कहा गया है। इसका अर्थ है अखण्ड और असीम तेजयुक्त मुखमण्डल वाली देवी

कृष्ण यजुर्वेद की ‘काठक संहिता’ के अनुसार, यह विष्णु पत्नी वैष्णवी महाशक्ति त्रिलोक की ईश्वरी हैं। इन्हें ‘स्तम्भनकारिणी शक्ति’ (शत्रु या संकट को जड़/स्थिर कर देने वाली शक्ति) कहा गया है।

वर्तमान युग में माँ की साधना का महत्व

उपनिषदों में स्पष्ट है कि ‘ब्रह्म’ भी शक्ति के संयुक्त हुए बिना सृष्टि के कार्य करने में असमर्थ है। माँ की यह स्तम्भन शक्ति भक्तों को असीम सहारा देती है:

 शत्रुओं पर विजय: शास्त्रकारों के अनुसार, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने, प्रभाव बढ़ाने और दुविधाओं से मुक्ति के लिए माँ की साधना अचूक है।

 संकट और रोग निवारण: असाध्य रोगों, अचानक आए संकटों और नवग्रहों की शांति के लिए माँ बगलामुखी का अनुष्ठान तत्काल फलदायी माना गया है।

 सुरक्षा का अहसास: माँ की शरणागति व्यक्ति को सामाजिक, आर्थिक और शत्रुओं से जुड़ी हर प्रकार की असुरक्षा से मुक्त कर अभय प्रदान करती है।

मंगल चतुर्दशी की मकार कुल नक्षत्रों वाली ‘वीर रात्रि’ के दूसरे पहर में माँ का प्राकट्य माना जाता है। पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ जो भी भक्त माँ पीताम्बरा के दरबार में जाता है, ममतामयी माँ उसके हर द्वंद्व और पीड़ा को हर कर जीवन में विजयश्री का आशीर्वाद देती हैं।

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