काशी की अधिष्ठात्री: माँ अन्नपूर्णा की पौराणिक कथा

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काशी की अधिष्ठात्री: माँ अन्नपूर्णा की पौराणिक कथा
​​संसार की सबसे प्राचीन नगरी काशी, जो भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी मानी जाती है, केवल मोक्ष की नगरी नहीं है, बल्कि यह जीवन और पोषण की भी नगरी है। शास्त्रों और पुराणों में वर्णित है कि काशी में भगवान विश्वनाथ जहाँ जीवों को तारक मंत्र देकर मोक्ष प्रदान करते हैं, वहीं माता अन्नपूर्णा उनके भौतिक जीवन का पोषण करती हैं। माँ अन्नपूर्णा की यह कथा न केवल जगज्जननी की महिमा का बखान करती है, बल्कि ‘ब्रह्म’ और ‘माया’ (प्रकृति) के संतुलन को भी बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत करती है।

​शिव-पार्वती का संवाद और ‘माया’ का प्रश्न

​पौराणिक कथाओं (मुख्यतः स्कंद पुराण के काशी खंड) के अनुसार, एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती के बीच सृष्टि के गूढ़ रहस्यों पर चर्चा हो रही थी। वैरागी शिव ने माता पार्वती से कहा, “हे देवी! यह संपूर्ण चराचर जगत, यहाँ तक कि अन्न (भोजन) भी केवल ‘माया’ (भ्रम) है। केवल ब्रह्म ही सत्य है।”
​माता पार्वती प्रकृति स्वरूपा हैं, वे ही संसार का भौतिक आधार और पालनकर्त्री हैं। शिव के मुख से अन्न को ‘माया’ या ‘भ्रम’ सुनकर वे सहमत नहीं हुईं। उनका मानना था कि अन्न के बिना शरीर का अस्तित्व संभव नहीं है और शरीर के बिना धर्म, कर्म और मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। अन्न के महत्व को सिद्ध करने और यह बताने के लिए कि ‘प्रकृति’ के बिना ‘पुरुष’ (शिव) भी अधूरे हैं, माता पार्वती अंतर्ध्यान (अदृश्य) हो गईं।

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​सृष्टि में हाहाकार और भयंकर अकाल

​माता पार्वती के अदृश्य होते ही प्रकृति रूठ गई। पृथ्वी पर भयंकर सूखा पड़ गया। अन्न के दाने-दाने के लिए त्राहि-त्राहि मच गई। खेत सूख गए, नदियाँ जलविहीन हो गईं और संसार में भयंकर अकाल आ गया। केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि देवता, ऋषि-मुनि और सभी जीव भूख से व्याकुल होकर तड़पने लगे।
​संपूर्ण ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया। जब यह करुण क्रंदन माता पार्वती के कानों तक पहुँचा, तो अपने बच्चों (जीवों) की पीड़ा उनसे देखी न गई। करुणामयी माँ ने तुरंत अपने भक्तों की रक्षा का संकल्प लिया।

​काशी में माँ अन्नपूर्णा का प्राकट्य

​अपने भक्तों की क्षुधा शांत करने के लिए माता पार्वती ने मोक्षदायिनी काशी नगरी को चुना। उन्होंने एक अत्यंत दिव्य और ममतामयी रूप धारण किया—माँ अन्नपूर्णा का। उनके एक हाथ में स्वर्ण का पात्र (जिसमें स्वादिष्ट और दिव्य खीर भरी थी) और दूसरे हाथ में अन्न बांटने के लिए रत्नजड़ित कलछुल (चम्मच) था। काशी में प्रकट होकर माता ने सभी जीवों को भरपेट अन्न बांटना शुरू कर दिया।

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महादेव का भिक्षाटन और सत्य का बोध

जब भगवान शिव ने देखा कि संसार भूख से नष्ट हो रहा है और प्रकृति के बिना सृष्टि का संचालन असंभव है, तब उन्हें माता पार्वती के रूठने का कारण समझ में आया। जीवों के कल्याण के लिए और अन्न के वास्तविक महत्व को स्वीकार करते हुए, त्रिलोकीनाथ भगवान शिव ने एक भिक्षुक का रूप धारण किया।
​हाथ में भिक्षाटन का खप्पर (भिक्षा पात्र) लिए महादेव स्वयं काशी पहुँचे। उन्होंने माँ अन्नपूर्णा के द्वार पर जाकर अलख जगाई और कहा—
​”भिक्षां देहि कृपावलंबनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी।”
(अर्थात: हे कृपा करने वाली माता अन्नपूर्णेश्वरी! मुझे भिक्षा दें।)
​माँ अन्नपूर्णा ने मुस्कुराते हुए अपने पति और संसार के स्वामी भगवान शिव के भिक्षा पात्र में अन्न (खीर) डाला। उस क्षण महादेव ने यह स्वीकार किया कि यद्यपि आत्मा के लिए ‘ब्रह्म’ ही अंतिम सत्य है, परंतु इस भौतिक शरीर को धारण करने और सुचारू रूप से चलाने के लिए ‘अन्न’ (प्रकृति/माया) परम आवश्यक है। अन्न कोई भ्रम नहीं, बल्कि साक्षात ब्रह्म का ही एक रूप है (अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्)।

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​काशी का वरदान

​भिक्षा प्राप्त करने के पश्चात भगवान शिव ने माता से वचन मांगा कि काशी में कोई भी प्राणी कभी भूखा नहीं सोएगा। माँ अन्नपूर्णा ने उन्हें यह वरदान दिया। मान्यता है कि तब से लेकर आज तक माँ अन्नपूर्णा काशी में विराजमान हैं और यह उनकी ही कृपा है कि काशी नगरी में कोई भी व्यक्ति भूखे पेट नहीं सोता।

​आज भी काशी के श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के समीप माँ अन्नपूर्णा का भव्य मंदिर स्थित है। धनतेरस और दीपावली के अवसर पर यहाँ विशेष स्वर्णमयी प्रतिमा के दर्शन होते हैं, जो भक्तों को सुख, समृद्धि और पूर्णता का आशीर्वाद देती है।

लेखक: रमाकान्त पन्त

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