हिमालय के आंचल में छिपा वह पौराणिक रहस्य, जहाँ आज भी शयन मुद्रा में विश्राम कर रहे हैं स्वयं महादेव

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देवभूमि उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में द्वाराहाट की शांत पहाड़ियों से लगभग आठ किलोमीटर दूर, एक ऐसा स्थान है जहाँ पहुँचकर काल की गति भी थम सी जाती है। क्या आपने कभी किसी ऐसे धाम के बारे में सुना है जहाँ भगवान शिव केवल लिंग रूप में नहीं, बल्कि विशाल पर्वत शृंखलाओं को अपनी शय्या बनाकर गहरी योगनिद्रा में लीन हैं? इस अलौकिक और रहस्यमयी स्थान को दुनिया विभाण्डेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जानती है। स्कंद पुराण के मानसखंड में इस पावन भूमि को ‘उत्तर की काशी’ कहा गया है। मान्यता है कि जो पुण्य फल मनुष्य को काशी नगरी में हजारों वर्षों के कठिन तप से मिलता है, वह महापुण्य विभाण्डेश्वर के इस गुप्त क्षेत्र में श्रद्धापूर्वक दर्शन करने मात्र से सुलभ हो जाता है।
इस पावन धाम का सबसे बड़ा रहस्य भगवान शिव की दिव्य शयन मुद्रा से जुड़ा हुआ है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, भगवती पार्वती के साथ विवाह के पश्चात् जब महादेव ने विश्राम की इच्छा जताई, तो उन्होंने संपूर्ण पर्वत क्षेत्र को ही अपना बिछौना बना लिया। स्कंद पुराण में इस अद्भुत और अलौकिक दृश्य का वर्णन इस प्रकार मिलता है:
कटिं कृत्वा महादेवः सुपुण्ये नीलपर्वते।
भुजं नागार्जुने दक्षं वामकं भुवनेश्वरे॥
चरणौ दारुकाटने सुखं सुष्वाप देवेशो भवान्या सह शंकरः॥
इस श्लोक का भावार्थ यह है कि देवाधिदेव भगवान शिव ने अपनी कमर को परम पवित्र नील पर्वत पर रखा, अपनी दाहिनी भुजा को नागार्जुन पर्वत पर फैलाया, बाईं भुजा को भुवनेश्वर पर्वत पर टिकाया और अपने पावन चरणों को जागेश्वर के दारुकावन की ओर करते हुए भगवती पार्वती के साथ सुखपूर्वक शयन किया। जब आप इस घाटी में खड़े होकर चारों ओर फैली पर्वत शृंखलाओं को निहारते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं महादेव संपूर्ण प्रकृति को अपनी बाहों में समेटे यहाँ विश्राम कर रहे हों। यहाँ महादेव दाहिने हाथ का सहारा लिए शयन अवस्था में विराजमान हैं, जो परम शांति और अभय का संदेश देता है।
विभाण्डेश्वर धाम की केवल पौराणिक कथाएँ ही रहस्यमयी नहीं हैं, बल्कि यहाँ का प्राकृतिक स्वरूप भी किसी अलौकिक चमत्कार से कम नहीं है। नागार्जुन पर्वत की तलहटी में स्थित यह मंदिर सुरभि, नंदिनी और गुप्त रूप से प्रवाहित होने वाली सरस्वती नदी के पावन त्रिवेणी संगम पर बसा है। तीन नदियों का यह संगम श्रद्धालुओं के चित्त को आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है। इसके साथ ही, मंदिर परिसर में एक ऐसी अग्नि निरंतर प्रज्वलित हो रही है, जिसे त्रेतायुग की ‘त्रिजुगी धूनी’ माना जाता है। युग बीत गए, कई कालखंड बदल गए, परंतु यह धूनी आज तक कभी बुझी नहीं है।
सुरभि नदी के तट पर ‘कपिल गाय’ के रूप में स्थापित एक विशाल पाषाण स्तंभ भी खड़ा है। यह शिलाखंड प्राचीन इतिहास और पौराणिक गाथाओं का एक ऐसा जीवंत प्रमाण है, जो आज भी श्रद्धालुओं को आश्चर्य से भर देता है।
वर्ष में एक बार यहाँ की शांत वादियों में एक अद्भुत सांस्कृतिक उत्सव का संचार होता है। चैत्र माह के अंतिम दिनों में जब रात का अंधेरा घिरता है, तब यहाँ रात भर चलने वाले एक भव्य मेले का आयोजन होता है। पारंपरिक ढोल-नगाड़ों की गूँज, छोलिया नर्तकों का शौर्यपूर्ण नृत्य और श्रद्धालुओं के जयकारों से पूरी घाटी शिवभक्ति से सराबोर हो उठती है। महाशिवरात्रि और सावन के पावन सोमवारों पर यहाँ होने वाले विशेष रुद्राभिषेक से संपूर्ण वातावरण अलौकिक ऊर्जा से भर जाता है। विभाण्डेश्वर धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और शिवत्व के उस रहस्य का संगम है जहाँ पहुँचकर हर मन शिवमय हो जाता है।