स्मृतियों के झरोखे से: कुचौली गाँव का वह पावन आंगन
यह तस्वीर सिर्फ ईंट-पत्थर से बने एक पुराने मकान की नहीं है, बल्कि एक पूरे युग, अनगिनत यादों और गहरी आस्था का जीवंत दस्तावेज है। नीली ग्रिल वाली वो पुरानी सीढ़ियां, सफेदी की चादर ओढ़े वो कच्ची-पक्की दीवारें, और वो खुला हुआ आंगन… जनपद बागेश्वर के कुचौली गाँव की इस माटी में जैसे आज भी बीता हुआ कल धड़कता है।
आस्था और वात्सल्य का केंद्र
यह पावन आवास माँ भद्रकाली मन्दिर के परम आदरणीय आचार्य स्व० श्री पूरन चन्द्र पन्त जी का है। इस मकान की हर दीवार ने उनके मुख से निकले पवित्र मंत्रों का उच्चारण सुना है। यह केवल एक घर का आंगन नहीं था, बल्कि एक ऐसी पाठशाला थी जिसने कई धर्म प्रेमियों को अपने आंचल में पाला है। बचपन की वो अल्हड़ भागदौड़, मंदिर की घंटियों की गूंज के बीच खेले गए खेल, और आचार्य जी के स्नेह भरे आशीर्वाद की छांव—इन सभी अनमोल पलों की गवाह ये पुरानी सीढ़ियां रही हैं।
तस्वीर में ठहरा हुआ समय
तस्वीर में सीढ़ियों पर खड़े ये लोग महज़ एक तस्वीर नहीं खिंचवा रहे हैं; वे उस गहरी विरासत को सहेज कर खड़े हैं। गेरुए वस्त्रों और पारंपरिक वेशभूषा में सजे चेहरों से लेकर सादे कपड़ों में खड़े अपनों तक, सभी की आँखों में इस जगह के लिए एक अनकहा सम्मान और स्मृतियों की एक मीठी सी चमक है। यह तस्वीर उस समय को रोक लेने की एक कोशिश है, जब वह पुराना स्वरूप अपने वजूद में था।
बदलाव और अमर यादें
आज समय का पहिया घूम चुका है। यह पुराना मकान अब एक नए और आधुनिक आकार में ढल चुका है। वो पुरानी दीवारें अब इतिहास हो गई हैं, और वो नीली जालियां अब शायद स्मृतियों के किसी कोने में सिमट गई हैं।
लेकिन क्या इमारतें बदलने से यादें मिट जाती हैं? बिल्कुल नहीं। कुचौली गाँव का यह मकान भले ही आज एक नया रूप ले चुका हो, लेकिन इसकी नींव में आज भी स्व० श्री पूरन चन्द्र पन्त जी का तपोबल और माँ भद्रकाली का आशीर्वाद बसा है। आज भी जब वो लोग इस नए आंगन में कदम रखते होंगे, तो उन्हें बंद आँखों से उन पुरानी सीढ़ियों पर दौड़ते अपने बचपन की खिलखिलाहट साफ़ सुनाई देती होगी।
ढांचे भले ही बदल जाएं, पर जो आध्यात्मिक और भावनात्मक नींव इस आंगन ने गढ़ी है, वह हमेशा अमर रहेगी।
लेटैस्ट न्यूज़ अपडेट पाने हेतु -
👉 वॉट्स्ऐप पर हमारे समाचार ग्रुप से जुड़ें
