कोटद्वार की वादियों में छिपा वो अलौकिक रहस्य, जहाँ दो अमर शक्तियों के महायुद्ध से हुआ एक जाग्रत धाम का उदय
खोह नदी के तट पर छिपा वो अलौकिक रहस्य, जहाँ दो अमर शक्तियों के महायुद्ध से हुआ एक दिव्य प्रहरी का उदय
देवभूमि उत्तराखंड के आँचल में न जाने कितने ही ऐसे गूढ़ रहस्य और अलौकिक स्थल छिपे हैं, जो मानव बुद्धि को विस्मय में डाल देते हैं। इसी पावन शृंखला में उत्तराखंड के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले कोटद्वार नगर से महज़ दो किलोमीटर की दूरी पर एक ऐसा ही विहंगम और जाग्रत स्थान है, जिसे दुनिया सिद्धबली हनुमान दरबार के नाम से जानती है। पुण्यतोया खोह नदी के कल-कल बहते जल के किनारे, एक छोटी और सुरम्य पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि अटूट श्रद्धा, कठोर तप और प्रकृति के अनुपम सौंदर्य का एक जीवंत संगम है। जब आप इसकी पृष्ठभूमि में फैली हरी-भरी पर्वत शृंखलाओं को देखते हैं, तो मन अनायास ही एक असीम और अनिवर्चनीय शांति के सागर में डूब जाता है।
इस पावन सिद्धपीठ की उत्पत्ति और इसके अस्तित्व के पीछे एक ऐसा रहस्यमयी और रोमांचक प्रसंग छिपा है, जो सदियों से भक्तों को चमत्कृत करता आ रहा है। यह कथा नाथ संप्रदाय के परम सिद्ध संत गुरु गोरखनाथ और साक्षात रुद्रावतार भगवान हनुमान के बीच हुए एक अभूतपूर्व मिलन की है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार महान योगी गुरु गोरखनाथ अपने गुरु मत्स्येंद्रनाथ के कल्याण की कामना लिए भ्रमण करते हुए इस घने वन क्षेत्र से गुज़र रहे थे। वातावरण शांत था, लेकिन तभी अचानक नियति ने एक विस्मयकारी मोड़ लिया। एक दिव्य और अपरिचित शक्ति ने उनका मार्ग रोक लिया। वह कोई और नहीं, बल्कि स्वयं संकटमोचन हनुमान थे, जो भेष बदलकर वहाँ उपस्थित थे।
इसके बाद जो हुआ, उसकी कल्पना भी दुर्लभ है। एक तरफ भगवान शिव के अवतार माने जाने वाले परम तपस्वी गुरु गोरखनाथ थे और दूसरी तरफ स्वयं पवनपुत्र हनुमान। दोनों ही शक्तियों के बीच एक भीषण और घनघोर युद्ध छिड़ गया। दोनों ही अजेय थे, दोनों की शक्तियां अनंत थीं। वन के वृक्ष और आकाश इस महायुद्ध के साक्षी बने। जब युद्ध का कोई अंत दिखाई नहीं दिया, तब हनुमान जी ने अपने वास्तविक, विराट और भव्य स्वरूप को प्रकट किया। साक्षात बजरंगबली को सम्मुख देखकर गुरु गोरखनाथ ने अत्यंत आदर और भक्ति भाव से उन्हें नमन किया। तब कौतुकवश हनुमान जी ने उनसे पूछा कि उनके इस क्षेत्र में आने का क्या उद्देश्य है और उनके लिए क्या आज्ञा है? गुरु गोरखनाथ ने अत्यंत विनम्रता से प्रार्थना की कि वे इस महान सिद्ध भूमि को अपनी छत्रछाया में ले लें और यहाँ एक सजग प्रहरी के रूप में वास कर जनमानस के कष्टों का निवारण करें। करुणामयी हनुमान जी ने इस आग्रह को सहर्ष स्वीकार कर लिया। इसी कारण, गुरु गोरखनाथ (सिद्ध बाबा) और हनुमान जी (बली) के इस पावन मिलन के कारण यह पवित्र स्थल सिद्धबली के नाम से अमर हो गया।
यह भूमि केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक ऐसी जाग्रत तपोभूमि है जहाँ सिद्धियों ने स्वयं आकार लिया था। माना जाता है कि इसी पवित्र पहाड़ी पर महान योगी गुरु गोरखनाथ ने वर्षों तक अत्यंत कठिन और निराहार तपस्या की थी, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें अनेक दुर्लभ और अलौकिक सिद्धियां प्राप्त हुईं। आज भी भक्तगण यहाँ सिद्ध बाबा के रूप में उनका पूर्ण श्रद्धा से पूजन करते हैं। जनश्रुतियों के अनुसार, प्राचीन काल में भी कई ऋषि-मुनियों ने इस स्थान की दैवीय ऊर्जा को पहचान कर यहाँ तप किया था, जिससे प्रसन्न होकर हनुमान जी आज भी यहाँ सूक्ष्म रूप में विचरण करते हैं और अपने भक्तों की पुकार सुनते हैं।
इस मंदिर की इसी असीम आध्यात्मिक महत्ता और अद्वितीय इतिहास को देखते हुए, इसे एक वैश्विक पहचान तब मिली जब वर्ष 2008 में भारत सरकार के डाक विभाग ने सिद्धबली मंदिर के सम्मान में एक विशेष डाक टिकट जारी किया। इस ऐतिहासिक घटना ने इस पावन दरबार को देश और दुनिया के धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर सुनहरे अक्षरों में अंकित कर दिया, जिससे यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।
सिद्धबली दरबार के बारे में यह अटूट विश्वास है कि जो भी भक्त यहाँ सच्चे और निर्मल मन से आता है, उसकी कोई भी मनोकामना अधूरी नहीं रहती। जब भक्तों की मन्नतें पूरी होती हैं, तो वे अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए यहाँ विशाल भंडारे का आयोजन करते हैं। यह परंपरा यहाँ अनवरत चलती रहती है। मुख्य मंदिर के गर्भगृह के समीप ही भगवान शिव का एक अत्यंत मनोहारी और दिव्य स्फटिक शिवलिंग स्थापित है। इसके साथ ही माँ जगदंबा की सौम्य प्रतिमा और शनि देव का मंदिर भी इस परिसर की आध्यात्मिक ऊर्जा को कई गुना बढ़ा देता है।
यूं तो यहाँ साल के बारह महीने श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन हनुमान जयंती के पावन अवसर पर यहाँ की छटा देखते ही बनती है। मंदिर की सीढ़ियों को चढ़ते हुए भक्तों का हर एक कदम उन्हें एक ऐसी लौकिक ऊर्जा के समीप ले जाता है, जो सांसारिक संतापों को क्षण भर में नष्ट कर देती है। शांत वादियां, शंख और घंटियों की गूंज, और चारों ओर बिखरी हरियाली के बीच कोटद्वार का यह सिद्धबली मंदिर सचमुच आत्मिक शांति और परमात्मा से साक्षात्कार का एक अनुपम द्वार है।
@# रमाकान्त पन्त@#
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