कैलाश-मानस का दिव्य रहस्य और कालचक्र की भूलभुलैया

ख़बर शेयर करें

 

कैलाश-मानस का दिव्य रहस्य और कालचक्र की भूलभुलैया
गूंजी धारचूला/यह कहानी ब्रह्मांड के सबसे पवित्र और रहस्यमयी स्थल मानसरोवर के उस गुप्त सत्य को उजागर करती है, जो साधारण मनुष्यों की दृष्टि से ओझल है. इस दिव्य कथा का आरंभ महर्षि व्यास, धन्वन्तरि और भगवान दत्तात्रेय के बीच पवित्र संवाद से होता है. दत्तात्रेय जी काशीराज राजा को मानसरोवर की अलौकिक महिमा समझाते हुए कहते हैं कि तीनों लोकों में मानसरोवर के समान कोई दूसरा तीर्थ नहीं है. इसके जल की महिमा इतनी अपार है कि इसका स्पर्श और पान करने मात्र से परम पद की प्राप्ति होती है. इसी संदर्भ में एक सुंदर श्लोक आता है:
स्पर्शनात् शंकरपदं पानात् ब्रह्मपदं शुभम्।
प्राप्यते राजशार्दूल मानसेयजलस्य च॥
अर्थात इस पवित्र सरोवर के जल का स्पर्श करने से शिवपद और इसका जल पीने से शुभ ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है. इस महिमा को सिद्ध करने के लिए दत्तात्रेय जी सत्ययुग की एक अत्यंत प्राचीन और कौतूहल जगाने वाली कहानी सुनाते हैं.
सत्ययुग के प्रारंभ में काम्पिल्य नाम का एक अत्यंत वैभवशाली नगर था. वहाँ सुग्गों यानी तोतों का एक राजा रहता था, जिसका नाम चैत्रक था. चैत्रक नीतिवान, शास्त्रों का ज्ञाता और सभी पक्षियों का हित चाहने वाला था. परंतु, नियति का खेल देखिए, उसके चार पुत्र हुए—शौनक, बलक, हेमशृंग और हय. ये चारों अत्यंत दुराचारी, स्वार्थी और अपने ही पिता की शक्ति को नष्ट करने वाले निकले. काम और वासना में डूबे इन पुत्रों के दुखों से दुखी होकर राजा चैत्रक की मृत्यु हो गई. पिता के मरने के बाद भी उन बेटों को कोई पछतावा नहीं हुआ. वे अपने पिता का अंतिम संस्कार करके पुनः वन में स्वेच्छाचार करने लगे
वन में भटकते हुए इन दुराचारी तोतों की भेंट एक बहेलिए यानी शिकारी से हुई. अपने स्वार्थ के लिए उन्होंने बहेलिए से एक गुप्त और पापपूर्ण समझौता कर लिया. उन्होंने कहा कि तुम हमें भोजन दो और बदले में हम तुम्हें दूसरे सीधे-साधे पक्षियों को फंसाने में मदद करेंगे. इस तरह उन्होंने अपने ही पक्षी समाज के साथ विश्वासघात किया. लेकिन पाप की उम्र लंबी नहीं होती। बहेलिए ने उन तोतों को भी अपने जाल में फंसा लिया और उन्हें पिंजरे में बंद कर अपने घर ले आया. कुछ समय बाद जब बहेलिए ने उन्हें अच्छा दाना-पानी देना बंद कर दिया, तो वे भूख से तड़पने लगे. उन्हें अपने किए पर पछतावा होने लगा कि उन्होंने मित्रद्रोह और कुल का विनाश करके कितना बड़ा पाप किया है
भूख और ग्लानि से व्याकुल होकर वे चारों तोते अपनी बहन के साथ दूसरे स्थान की खोज में उड़ चले. उड़ते-उड़ते वे एक अत्यंत शीतल और सुंदर सरोवर के किनारे पहुँचे, जो कि साक्षात मानसरोवर था. वहाँ उन्होंने देखा कि पंखों से रहित एक अत्यंत वृद्ध हंस मौन धारण कर गहरी तपस्या में लीन है. वह साक्षात विष्णु भगवान के समान तेजवान लग रहा था. उस परम शांत हंस को देखकर तोतों के मन का सारा संताप और भूख गायब हो गई. वे कौतूहल और श्रद्धा से भरकर उस हंस के पास गए और अपने पिछले जन्मों के पापों के बारे में पूछने लगे
तभी वह दिव्य हंस अपनी गहन साधना से जागता है और तोतों के भीतर छिपे अज्ञान के अंधकार को दूर करने के लिए अपनी अमृतमयी वाणी में जीवन का सबसे बड़ा रहस्य समझाता है. हंस कहता है कि इस संसार में मनुष्य और प्राणी अपने पिछले जन्मों के कर्मों का फल भोगते हैं. तृष्णा अर्थात वासना और इच्छा ही सभी पापों की जड़ है. इस सत्य को स्पष्ट करते हुए हंस एक अद्भुत श्लोक कहता है:
जीर्यन्ति जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः।
चक्षुःश्रोत्राणि जीर्यन्ति तृष्णैका तरुणायते॥
अर्थात उम्र बढ़ने के साथ मनुष्य के बाल सफेद हो जाते हैं, दांत टूट जाते हैं, आँख और कान जैसी इंद्रियां भी शिथिल हो जाती हैं, लेकिन एक मात्र तृष्णा यानी जीने की और भोगने की इच्छा कभी बूढ़ी नहीं होती, वह हमेशा जवान बनी रहती है. इसी तृष्णा के कारण जीव बार-बार पाप कर्मों में लिप्त होता है और जन्म-मरण के चक्र में फंसा रहता है.
जब हंस ने यह ज्ञान दिया, तो तोतों को अपने पूर्व जन्म का पूरा दृश्य किसी चलचित्र की भांति याद आ गया. वे भावुक होकर अपने जीवन का वह रहस्यमयी सत्य बताते हैं जिसे सुनकर कोई भी चौंक जाए. वे कहते हैं कि हे हंसराज, आज से सात जन्म पहले हम तैलंग देश में भारद्वाज कुल में पैदा हुए अत्यंत ज्ञानी, वेदपाठी ब्राह्मण थे. पिता की मृत्यु के बाद हमें बहुत धन मिला, लेकिन उस धन के अहंकार में आकर हम भ्रष्ट हो गए. हम इतने पापी हो गए कि ऋषियों के लिए बनाए गए पवित्र भोजन यानी चरू-भाग का खुद उपभोग करने लगे और उसे दूसरों को बांटने लगे. इस अपवित्र कार्य को देखकर एक क्रोधित ऋषि ने हमें शाप दे दिया कि तुम पांच जन्मों तक कौआ और तोता बनोगे. जब हमने रोकर उनसे क्षमा मांगी, तो उन्होंने दया करके कहा कि तोता रूपी अंतिम जन्म में तुम्हें मानसरोवर के किनारे एक दिव्य हंस मिलेगा, जिसके दर्शन से तुम्हारा उद्धार होगा.
यह सुनकर वह दयालु हंस उन्हें मुक्ति का गुप्त मार्ग बताता है. हंस कहता है कि मैं स्वयं इसी मानसरोवर के पुण्य प्रताप से अजर-अमर और देवताओं द्वारा पूजनीय हुआ हूँ. तुम सब इसी समय मानसरोवर के पवित्र जल में स्नान करो. चैत्र मास के इस पावन समय में जो भी यहाँ आता है, उसके ब्रह्महत्या और गोवध जैसे भयानक पाप भी तत्क्षण धुल जाते हैं. हंस ने उन तोतों को तीन दिन तक अपने आश्रम में ठहरने को कहा क्योंकि शीत ऋतु के कारण साधारण जीवों के लिए मानसरोवर का वेग सहना कठिन था
इसके बाद कहानी में एक अत्यंत चमत्कारी और जानदार मोड़ आता है। हंस ने स्वयं आकाश मार्ग से जाकर मानसरोवर में विधि-विधान से स्नान किया, भगवान शिव की आराधना की और वहाँ का अलौकिक, पवित्र जल लाकर उन तोतों और उनकी बहन पर छिड़क दिया. जैसे ही वह जल उन पर पड़ा, एक जादुई चमत्कार हुआ. उन तोतों ने अपने पक्षी शरीर को वहीं छोड़ दिया और वे साक्षात दिव्य देवताओं का रूप धारण कर गए. उसी क्षण स्वर्ग से एक चमचमाता हुआ विमान आया, जिसमें बैठकर वे अप्सराओं और गंधर्वों के साथ इंद्रपुरी और फिर ब्रह्मलोक को प्रस्थान कर गए. इतना ही नहीं, उस बहेलिए ने भी जब हंस के इन वचनों को सुना, तो उसका हृदय परिवर्तित हो गया. उसने भी मानसरोवर में बार-बार स्नान किया और अंत में ऋषियों द्वारा पूजनीय परम पद को प्राप्त किया
भगवान दत्तात्रेय जी इस परम पावन कथा का समापन करते हुए कहते हैं कि मानसरोवर के जल की एक बूंद मात्र से बड़े से बड़ा पापी भी परम गति को प्राप्त कर लेता है. इसके महात्म्य का वर्णन करने में स्वयं देवता भी समर्थ नहीं हैं. जो भी मनुष्य इस रहस्यमयी और पवित्र शुक उपाख्यान को सुनता या सुनाता है, उसे जीवन में सुख, समृद्धि, लंबी आयु और आरोग्य की प्राप्ति होती है और वह अंत में विष्णुलोक तथा रुद्रलोक में स्थान पाता है. इस प्रकार यह पौराणिक गाथा हमें यह सिखाती है कि चाहे जीवन में कितने ही पाप क्यों न हुए हों, सच्चे पश्चाताप और पवित्र सत्संग से मुक्ति का मार्ग सदैव खुल जाता है.
@ रमाकान्त पन्त#@