अहंकार का आवरण: जब लंका के द्वार से बैरंग लौटाए गए देवगुरु बृहस्पति

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अहंकार का आवरण: जब लंका के द्वार से बैरंग लौटाए गए देवगुरु बृहस्पति
त्रेतायुग का वह काल, जब स्वर्ण नगरी लंका अपने वैभव और शक्ति के चरम पर थी। त्रैलोक्य विजेता दशानन रावण के प्रताप से सूर्य और पवन भी दिशाएं बदल देते थे। लेकिन, बाहर से सोने की तरह चमकती लंका के भीतर, अहंकार का एक ऐसा अंधकार पनप रहा था, जो धीरे-धीरे रावण के विवेक को निगलने वाला था।
यह कथा मात्र लंका के ऐश्वर्य की नहीं, बल्कि इस आध्यात्मिक सत्य की है कि जब व्यक्ति के भीतर ‘मैं’ (अहंकार) बहुत बड़ा हो जाता है, तो उसके जीवन से ‘गुरु’ और ‘ज्ञान’ की विदाई तय हो जाती है।

बलपूर्वक ज्ञान का अर्जन: रावण का दैनिक नियम
रावण अत्यंत विद्वान था, लेकिन उसकी विद्या भक्ति से नहीं, बल्कि शक्ति के प्रदर्शन से उपजी थी। अपने त्रिलोक विजय के मद में उसने देवताओं को अपने अधीन कर लिया था। अद्भुत रामायण के प्रसंगों के अनुसार, रावण के दरबार में प्रतिदिन तीन महान शक्तियों को विवश होकर हाजिरी लगानी पड़ती थी:
सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी: रावण को वेदों का गूढ़ अध्ययन कराने के लिए।
देवगुरु बृहस्पति: नित्य शास्त्र वाचन और नीति का पाठ पढ़ाने के लिए।
गंधर्व कुमरु (तुम्बुरु): अपने मधुर संगीत से रावण को प्रसन्न करने के लिए।
रावण ने ज्ञान को अपना बंदी बना लिया था। वह यह भूल गया था कि विद्या विनय से आती है, बल प्रयोग से नहीं।

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जब लंका के द्वार पर हुआ ‘विवेक’ का तिरस्कार
एक प्रातः काल, जब ब्रह्मा जी, देवगुरु बृहस्पति और गंधर्व कमरु अपने नित्य नियम के अनुसार लंका के भव्य सिंहद्वार पर पहुँचे, तो एक अभूतपूर्व घटना घटी। रावण के एक साधारण द्वारपाल ने अपना भाला आगे कर उनका रास्ता रोक दिया।
द्वारपाल के नेत्रों में अपने स्वामी के बल का अहंकार साफ झलक रहा था। उसने कठोर स्वर में कहा, “लौट जाइए! आज महाराज दशानन की कोई भी शास्त्र सुनने या पढ़ने की इच्छा नहीं है। हे ब्रह्मा, आप अपने लोक वापस चले जाएं।”
जब देवगुरु बृहस्पति ने इस अचानक हुए व्यवहार पर प्रश्न करना चाहा, तो द्वारपाल ने उन्हें बीच में ही टोकते हुए अपमानित किया— “ऐ बृहस्पति! चुप हो जाओ। यह तुम्हारे देवराज इंद्र की सभा नहीं है जहाँ तुम्हारी कोई बात सुनी जाएगी। यह लंकापति रावण का द्वार है। कुमरु, तुम भी यहाँ से तुरंत वापस लौट जाओ!”
तीनों देव शांत भाव से इस अपमान को सहकर लौट गए। ब्रह्मा जी और देवगुरु बृहस्पति समझ चुके थे कि अब रावण के अंत का समय निकट आ गया है।

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कथा का आध्यात्मिक रहस्य: पतन का पहला संकेत
आध्यात्मिक दृष्टि से यह केवल एक द्वारपाल की धृष्टता नहीं थी, बल्कि यह रावण के अंतर्मन की स्थिति का प्रतीक था।
सद्बुद्धि से दूरी: देवगुरु बृहस्पति ‘सद्बुद्धि’ और ‘विवेक’ के प्रतीक हैं। जब रावण के द्वार से देवगुरु बृहस्पति को लौटाया गया, तो इसका आध्यात्मिक अर्थ यह था कि रावण ने अपने जीवन से सद्बुद्धि और सही-गलत समझने के विवेक को पूरी तरह त्याग दिया था।
अहंकार की पराकाष्ठा: जब मनुष्य यह मान लेता है कि अब उसे किसी ब्रह्मा (सृजन) या बृहस्पति (गुरु/मार्गदर्शक) की आवश्यकता नहीं है, तब वह अपने विनाश का मार्ग स्वयं खोल लेता है।
विनाश काले विपरीत बुद्धि: यह प्रसंग उस शाश्वत सत्य को सिद्ध करता है कि जब किसी के पतन का समय निकट आता है, तो वह सबसे पहले संतों, गुरुओं और सच्चे ज्ञान का ही अपमान करता है।
 आध्यात्मिक सार:
शक्ति और धन का संचय मनुष्य को रावण तो बना सकता है, लेकिन यदि जीवन में विनय और गुरु का सम्मान न हो, तो वह सारा ऐश्वर्य उसी तरह राख हो जाता है, जैसे लंका हुई थी। जब मन रूपी लंका के द्वार अहंकार से बंद हो जाते हैं, तब ईश्वर की कृपा और देवगुरु बृहस्पति जैसा मार्गदर्शक ज्ञान बाहर से ही लौट जाते हैं।

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