कैलाश की ओझल गुफा और सहस्र सूर्यों का रहस्य स्कन्दपुराण के मानसखण्ड से एक अलौकिक एवं रहस्यमयी गाथा

ख़बर शेयर करें

कैलाश मानसरोवर क्षेत्र की पावन महिमा और अलौकिक सौंदर्य
हिमालय का उत्तुंग कैलाश क्षेत्र केवल पत्थरों और बर्फ की विशाल शृंखला नहीं है, बल्कि यह अनंत चेतना, शांति और अलौकिक ऊर्जा का शाश्वत स्रोत है। यहाँ की बर्फीली हवाओं में ओमकार की दिव्य ध्वनि तैरती है और मानसरोवर का निर्मल स्फटिक सम जल सीधे परमेश्वर के निवास का आभास कराता है। इस पावन भूमि में बिखरे रहस्य युगों-युगों से ऋषियों, मुनियों और साधकों को आकर्षित करते रहे हैं।
पुराणों के अनुसार कैलाश पर्वत संपूर्ण ब्रह्मांड का केंद्र और देवाधिदेव महादेव का प्रत्यक्ष निवास स्थल है। यहाँ की प्रत्येक कंदरा और गुफा अपने भीतर गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य छिपाए हुए है। इसी पावन मानसखण्ड के आँचल में एक ऐसी दिव्य गुफा का वर्णन आता है, जिसकी रचना स्वयं सृष्टि रचयिता ब्रह्मा ने की थी और जहाँ देवों के देव महादेव का ऐसा तेजोमय रूप प्रकट हुआ था जिसे देखकर गन्धर्वराज पुष्पदन्त भी स्तब्ध रह गए थे।
गुफा का गुप्त निर्माण और पार्वती जी का संशय
स्कन्दपुराण के मानसखण्ड के उन्नीसवें अध्याय में शूलगुहा के पावन माहात्म्य की कथा आती है। माता पार्वती के मन में कौतूहल जागृत हुआ कि गन्धर्वराज पुष्पदन्त किस प्रकार कैलाश की इस गुप्त महागुफा में पहुँचे और भगवान शिव के परम भक्त बन गए। उन्होंने भगवान शिव से जिज्ञासा व्यक्त करते हुए पूछा कि इस अलौकिक गुफा का निर्माण किसने किया और इसका मार्ग कहाँ-कहाँ खुलता है।
देव्युवाच:
स कथं पुष्पदन्तो वै प्राप्तं पुण्यां महागुहाम्। कथं ते महिमानं वै दृष्ट्वा भक्तिमवाप्तवान्॥
कथं कैलासमध्ये वै गुहाद्वारमभूत् प्रभो। लङ्का-मानसयोर्मध्ये कथं सा वर्ण्यते गुहा॥
माता पार्वती के प्रश्नों का उत्तर देते हुए भगवान शिव ने कैलाश और मानसरोवर के बीच छिपे इस महान रहस्य का अनावरण किया। उन्होंने बताया कि सृष्टि के पितामह ब्रह्मा जी ने अनेक गुप्त द्वारों से युक्त स्फटिक मणि के समान पारदर्शी और दिव्य गुफा की रचना की थी। ब्रह्मा जी ने इस गुफा का एक गुप्त द्वार लंकासर (राक्षसताल) और मानसरोवर के मध्य बनाया, जबकि दूसरा गुप्त द्वार सीधे कैलाश पर्वत के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया।
ईश्वर उवाच:
शृणुष्व तां गुहां देवि ब्रह्मा लोकपितामहः। विरच्य विविधद्वारैः संवृतां स्फाटिकीं यथा॥
लङ्कामानसयोर्मध्ये द्वारमेकं विरच्य वै। एकं कैलासमध्यं वै विरच्य स प्रजापतिः॥
दिव्य गुफा में प्रवेश और पुष्पदन्त का आगमन
गुफा के निर्माण के उपरांत ब्रह्मा जी ने अत्यंत विनम्रता से महादेव से प्रार्थना की कि वे माता पार्वती और अपने गणों के साथ इस पवित्र स्थान पर निवास करें। ब्रह्मा जी के आग्रह को स्वीकार कर भगवान शिव अपने प्रिय नंदी और भगवती पार्वती को साथ लेकर इस विशाल, चंद्रमा जैसी शुभ्र और परम पवित्र गुफा में पधारे।
कालान्तर में गन्धर्वों के स्वामी महामति पुष्पदन्त मंदाकिनी नदी के रमणीक तटों पर भ्रमण करते-करते कैलाश शिखर पर पहुँचे। वहाँ विचरण करते हुए उनकी दृष्टि ब्रह्मा जी द्वारा निर्मित उस अत्यंत गुप्त और अलौकिक गुफा के द्वार पर पड़ी। उत्सुकता और कौतुक से भरे पुष्पदन्त अन्य सभी साधारण गुफाओं और शिवगणों को पीछे छोड़ते हुए गुफा के भीतर प्रविष्ट हो गए।
सहस्र सूर्यों सा तेजोमय रूप और अनन्य स्तुति
गुफा के गहन आंतरिक भाग में प्रवेश करते ही गन्धर्वराज पुष्पदन्त एक अद्भुत और अकल्पनीय दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए। उनके सामने स्वयं भगवान शिव विराजमान थे, जिनका तेज हजारों सूर्यों के एक साथ चमकने के समान था और जिनसे अग्नि की विशाल लपटें उठती हुई प्रतीत हो रही थीं। इस अति-प्राकृतिक और तेजोमय दृश्य को देखकर पुष्पदन्त भय और असीम भक्ति से भर गए। उन्होंने तुरंत हाथ जोड़कर महादेव के चरणों में प्रणाम किया और स्तुति प्रारंभ की।
पुष्पदन्त उवाच:
ततो ददर्श मां देवि ज्वलदग्निशिखोपमम्। सहस्रादित्यसंकाशं तुष्टाव प्रणताञ्जलिः॥
नमो देवाधिदेवाय विरूपाक्षाय ते नमः। कपर्दिने नमस्तुभ्यं शितिकण्ठाय ते नमः॥
भवो भव्बीजाय सृष्टिस्थित्यन्तकारिणे। भूताय भूतनाथाय नागहाराय ते नमः॥
भस्मोद्धूलितसर्वाङ्गमौलिमालाधराय च। कालाय कालकल्पाय नमः कालान्तकाय च॥
पृथिवी-वायु-राकाश-महिम्ना येन व्यापितम्। तस्मै शिवाय शान्ताय हराय च नमो नमः॥
पुष्पदन्त ने अत्यंत भावविभोर होकर कहा कि हे देवाधिदेव, हे त्रिनेत्र, हे जटाजूटधारी और नीलकंठ, आपको मेरा बारंबार प्रणाम है। आप ही इस संपूर्ण विश्व के बीज हैं, सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करने वाले हैं। भस्म रमाए, मुंडमाला धारण करने वाले, काल के भी काल महाभैरव स्वरूप प्रभु, आपके चरणों में मेरा कोटि-कोटि नमन है। पृथ्वी, वायु और आकाश सब आपकी ही महिमा से व्याप्त हैं।
वरदान, अष्टसिद्धियाँ और शिवलिङ्ग की स्थापना
गन्धर्वराज पुष्पदन्त की निश्छल और परम पावन स्तुति से प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव ने उन्हें दर्शन दिए। शिवजी ने पुष्पदन्त को आठों महान सिद्धियों के दर्शन कराए और देवी पार्वती की कृपा स्वरूप उन्हें परम भक्ति का उपदेश दिया। भगवान शिव की कृपा प्राप्त कर पुष्पदन्त का जीवन धन्य हो गया।
ईश्वर उवाच:
इति तेन महादेवि संस्तुतस्तुष्टोऽस्म्यहम्। मया तस्मै महापुण्या दर्शिताष्टसिद्धयः॥
पुष्पदन्तोऽपि तत्रैव प्रहृष्टेनान्तरात्मना। चिरं निवस्य तां पुण्यां ययौ मानसरोवरम्॥
उस पावन गुफा में चिरकाल तक रहकर भक्ति साधना करने के उपरांत पुष्पदन्त मानसरोवर की ओर प्रस्थान कर गए। लंकासर और मानसरोवर के बीच बने ब्रह्मा जी के सुयंत्रित गुप्त द्वार के निकट पहुँचकर उन्होंने अपने नाम से एक परम पवित्र शिवलिङ्ग की स्थापना की। इसके पश्चात् मानसरोवर के पवित्र जल में स्नान कर वे सिद्धि और असीम आनंद प्राप्त करते हुए अपने लोक को लौट गए।
स्कन्दपुराण का यह पावन आख्यान हमें सिखाता है कि कैलाश मानसरोवर की पावन धारा में जो भी भक्त निष्काम भाव और अनन्य भक्ति के साथ प्रभु की शरण में आता है, वह जीवन के समस्त बंधनों से मुक्त होकर परम सिद्धि और शाश्वत सुख प्राप्त करता है।

 

यह भी पढ़ें 👉  11 हजार फीट की ऊँचाई पर दफन मोक्ष का भूगोल: जहाँ बर्फ के गर्भ से फूटती है अग्नि, पारे के बुदबुदाते हैं कुंड और लोहे को स्वर्ण बनाती है लाल धारा

@# रमाकान्त पन्त

ADVERTISEMENTS Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad