अद्भुत रामायण का परम रहस्य: जब स्वयं भगवान श्रीराम ने की ‘महाकाली’ स्वरूपा माता सीता की स्तुति

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 अद्भुत रामायण का परम रहस्य: जब स्वयं भगवान श्रीराम ने की ‘महाकाली’ स्वरूपा माता सीता की स्तुति

‘अद्भुत रामायण’ में जहाँ एक ओर श्रीराम ने हनुमान जी को अपने ‘परब्रह्म’ स्वरूप का ज्ञान दिया था, वहीं इस ग्रंथ का सबसे बड़ा और विस्मयकारी रहस्योद्घाटन तब होता है, जब स्वयं भगवान श्रीराम अपनी अर्धांगिनी माता सीता की स्तुति करते हैं। सामान्य रामायणों में श्रीराम को सर्वशक्तिमान नायक और रक्षक के रूप में चित्रित किया गया है, परंतु अद्भुत रामायण में माता सीता ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्ति ‘आदिपराशक्ति’ के रूप में उभरती हैं। श्रीराम द्वारा की गई सीता जी की यह स्तुति केवल एक पति द्वारा पत्नी की प्रशंसा नहीं है, बल्कि ‘शक्तिमान’ (ईश्वर) द्वारा अपनी ही ‘शक्ति’ (माया) की तात्विक और दार्शनिक वंदना है।

सहस्रानन (हजार सिर वाले रावण) का आतंक और श्रीराम का अचेत होना

अद्भुत रामायण के अनुसार, जब पुष्कर द्वीप का राजा सहस्रानन रावण श्रीराम की सेना पर प्रहार करता है, तो उसके एक ही बाण के प्रचंड वेग से सुग्रीव, हनुमान और लक्ष्मण सहित पूरी वानर सेना उड़कर अयोध्या जा गिरती है। उस महाबली राक्षस के प्रहार से स्वयं भगवान श्रीराम भी युद्धभूमि में मूर्च्छित हो जाते हैं। ब्रह्मांड को इस भयानक संकट में और अपने स्वामी को अचेत देख माता सीता का कोमल रूप विलुप्त हो जाता है और वे एक अत्यंत विकराल **’महाकाली’ (भद्रकाली) का रूप धारण कर लेती हैं।

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महाकाली का तांडव और शिव का हस्तक्षेप

क्षण भर में माता सीता उस महादानव के हजार सिर काट देती हैं और उसकी पूरी सेना का संहार कर देती हैं। लेकिन शत्रुओं के विनाश के बाद भी उनका क्रोध शांत नहीं होता और वे प्रलयंकारी तांडव नृत्य करने लगती हैं। उनके इस रौद्र रूप से पूरी सृष्टि कांप उठती है। तब ब्रह्मांड की रक्षा के लिए स्वयं भगवान शिव माता सीता के चरणों के नीचे आकर लेट जाते हैं (यही दृश्य माँ काली और शिव के वर्तमान प्रचलित स्वरूप का मूल आधार है)। भगवान शिव के स्पर्श से माता का वेग कुछ थमता है।

श्रीराम का चेतन होना और माता सीता की स्तुति

जब भगवान श्रीराम की चेतना लौटती है, तो सामने माता सीता के इस विकराल, विकृत और भयानक स्वरूप को देखकर वे अत्यंत विस्मित और भयभीत हो जाते हैं। उनके हाथों से धनुष छूट जाता है। तब देवर्षि ब्रह्मा वहाँ प्रकट होते हैं और श्रीराम को माता सीता के वास्तविक स्वरूप (निर्गुण परब्रह्म और महामाया) का स्मरण कराते हैं।

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ब्रह्मा जी के वचनों को सुनकर श्रीराम हाथ जोड़कर माता सीता के उस रौद्र रूप को शांत करने के लिए उनकी एक अलौकिक स्तुति करते हैं। ‘अद्भुत रामायण’ में इस स्तुति को माता सीता के 1008 नामों (सहस्रनाम) के माध्यम से किया गया है।

श्रीराम द्वारा की गई स्तुति का दार्शनिक सार

श्रीराम माता सीता की वंदना करते हुए कहते हैं:

 परब्रह्म और आदि शक्ति: श्रीराम स्तुति करते हुए कहते हैं:

    “त्वमेव परमं व्योम महाज्योतिर्निरञ्जनम्। शिवं सर्वगतं सूक्ष्मं परं ब्रह्म सनातनम्॥”*

   (अर्थात: हे सीते! आप ही परम आकाश, महान ज्योति, निरंजन, सर्वव्यापी, सूक्ष्म और सनातन परब्रह्म हैं।)

   

 उत्पत्ति, स्थिति और संहार की अधिष्ठात्री: श्रीराम कहते हैं कि हे देवी! आप ही इस सम्पूर्ण सृष्टि को रचने वाली (उत्पत्ति), इसका पालन करने वाली (स्थिति) और अंततः इसका विनाश करने वाली (संहारकारिणी) हैं।

 शक्ति और शक्तिमान का अभेद: श्रीराम यह स्वीकार करते हैं कि उनके भीतर जो भी बल, चेतना या ईश्वरत्व है, वह केवल माता सीता (शक्ति) के कारण ही है। जैसे सूर्य और उसकी धूप को अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही राम और सीता अभिन्न हैं। आप ही योगमाया हैं और मैं केवल उस माया को धारण करने वाला हूँ।

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 सौम्य रूप की प्रार्थना: अंत में श्रीराम अत्यंत विनम्रता से प्रार्थना करते हैं कि, “हे जगन्माता! आपके इस विश्वरूपी रौद्र स्वरूप को देखकर मेरे मन में भय उत्पन्न हो रहा है। कृपया ब्रह्मांड के कल्याण और मेरे लिए अपने उसी पुराने, कोमल और सौम्य ‘सीता’ रूप को पुनः धारण करें।”

‘अद्भुत रामायण’ में श्रीराम द्वारा की गई माता सीता की यह स्तुति हिंदू दर्शन के ‘शाक्त संप्रदाय’ (देवी को सर्वोच्च मानने वाले विचार) का एक अत्यंत प्रामाणिक और सुंदर स्वरूप है। यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि ईश्वर (राम) चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, वे अपनी ‘शक्ति’ (सीता) के बिना अधूरे हैं। श्रीराम और माता सीता वास्तव में दो अलग-अलग देह नहीं, बल्कि एक ही पूर्ण और सनातन सत्य के दो अभिन्न रूप हैं।

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