नागराज धौलीनाग का अनसुलझा पौराणिक रहस्य: हिमालय के शिखरों पर बांज के प्राचीन वृक्ष से गूंजी थी अलौकिक देववाणी, जहां भूमिगत सुरंग से आज भी निकलती है पावन अमृतधारा

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उत्तराखंड के बागेश्वर जनपद में विजयपुर की सुरम्य वादियों, हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं और देवदार-बांज के सघन वनों के मध्य एक ऐसा अलौकिक धाम स्थित है, जहां आज भी नागलोक की प्राचीन संस्कृति, पौराणिक गाथाएं और जन-आस्था का पावन संगम साक्षात दिखाई देता है। प्रकृति की सुरम्य गोद में स्थित नागराज धौलीनाग यानी धवल नाग का यह पावन मंदिर सदियों से भक्तों के जीवन को अतुल ऐश्वर्य, शांति, आरोग्य और आध्यात्मिक संबल प्रदान करने का परम केंद्र बना हुआ है।
स्कंद पुराण के मानस खण्ड के 83वें अध्याय में महर्षि वेदव्यास जी ने धवल नाग देवता की अपार महिमा का गुणगान करते हुए स्पष्ट उल्लेख किया है कि नागकन्याओं द्वारा सेवित नागराज धवल नाग की जो भी मनुष्य श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करता है, उस पर समस्त नाग देवता कृपालु होकर उसे जीवन में अतुलनीय ऐश्वर्य, प्रतिष्ठा और सुख-समृद्धि का वरदान देते हैं। पुराण के 79वें अध्याय में वर्णित कथा के अनुसार, जब ऋषियों ने आध्यात्मिक चर्चा के दौरान महर्षि व्यास से कौतूहलवश पूछा कि पाताल में निवास करने वाले नागों का पृथ्वी पर आगमन कैसे हुआ, तब महर्षि ने यह रहस्य उजागर किया कि सत्ययुग के आरंभ में ब्रह्मा जी ने पृथ्वी को अनेक भागों में विभक्त किया था। उन्हीं पावन भूभागों में से एक भाग नागों के निवास हेतु हिमालय के मध्य नागपुर नाम से नियत किया गया, जिसे आज भी नागभूमि के रूप में जाना जाता है। इसी पावन नगरी में नागराज श्री धौलीनाग जी अपने दिव्य स्वरूप में प्रतिष्ठित हुए।
इस पौराणिक नागभूमि में अनंत, वासुकी, शेष, पद्मनाभ, शंखपाल, धृतराष्ट्र, तक्षक, कालिया और कम्बल सहित अनेक नाग देवताओं की अदृश्य उपस्थिति मानी जाती है। क्षेत्र में संहित, बेरीनाग, फेणीनाग और हरिनाग प्रमुख रूप से पूजे जाते हैं, जबकि इन सभी में श्री मूलनारायण जी को नाग प्रमुख का सर्वोच्च पद प्राप्त है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, कभी आस्तीक ऋषि के नेतृत्व में ऋषियों ने ब्रह्मा जी के साक्षात दर्शन की अभिलाषा से यहां विराट यज्ञ का आयोजन किया था, जिसे फेनिल नाग ने अपने सहयोग से सफल बनाया। ऋषियों के तपोबल से प्रकट हुई पावन भद्रावती नदी के तट पर स्थित गोपीश्वर महादेव नागों के परम आराध्य बने। मान्यता है कि गोपीश्वर धाम में पहुंचते ही मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप सूर्योदय होने पर बर्फ की भांति पिघलकर नष्ट हो जाते हैं और इस पावन तीर्थ का पूजन समस्त पृथ्वी की इक्कीस बार परिक्रमा करने के समान महापुण्य प्रदान करता है।
कहा जाता है कि इस पावन धाम की पूजा प्राचीन काल में नाग कन्याओं द्वारा की जाती थी। इन्हीं नाग कन्याओं के तपोबल से प्रसिद्ध सनिउडियार गुफा प्रकाश में आई और स्वयं देवाधिदेव महादेव यहां गोपीश्वर रूप में प्रतिष्ठित हुए। इसी क्षेत्र के भद्रपुर में कालिया नाग के पुत्र भद्रनाग का वास है, जिनकी आराध्य देवी माता भद्रकाली हैं और भद्रा पर्वत के दक्षिण में कालिया नाग स्वयं भगवती कालिका की नित्य आराधना करते हैं।
धौलीनाग का वर्तमान मंदिर भीमकाय पाषाणों से निर्मित एक अद्वितीय स्थापत्य है, जहां नाग देवता की भव्य मूर्ति के सम्मुख अन्य देव प्रतिमाएं हाथ जोड़े वंदना मुद्रा में दिखाई देती हैं। स्थानीय इतिहास और परंपरा के अनुसार इस पाषाण मंदिर की स्थापना लगभग चार सौ वर्ष पूर्व हुई थी। उससे पहले धौलीनाग देवता यहां स्थित बांज के एक विशालकाय वृक्ष पर निवास करते थे, जो वृक्ष आज भी मंदिर परिसर में अटूट आस्था का साक्षी बनकर अडिग खड़ा है।
जनश्रुति के अनुसार एक बार रात्रि के समय समीपवर्ती सघन जंगलों में अचानक भीषण दावाग्नि धधक उठी, तब उसी बांज के वृक्ष से साक्षात धौलीनाग देवता की अलौकिक देववाणी गूंजी कि जंगल में आग लग गई है, इसे बुझाने के लिए आओ। यह दिव्य आवाज सुनकर भूल समुदाय के लोग 22 हाथ लंबी जलती मशाल लेकर रात्रि में ही आग बुझाने दौड़ पड़े। देवता के जयकारों की गूंज सुनकर धपोला और चंदोला वंश के लोग भी मशालें हाथों में थामकर निकल पड़े और सामूहिक प्रयास से जंगल की रक्षा हुई। तभी से यह मशाल परंपरा अटूट आस्था के साथ आज भी जीवित है।
बांज, बुरांश, चीड़, काफल और देवदार के घने जंगलों से आच्छादित यह धाम आज दो हजार से अधिक परिवारों की आस्था का मुख्य केंद्र है। चंदोला, धपोला, धामी, राणा, पंत, पांडे, कांडपाल, कर्म्याल और भूल आदि समुदाय के लोग धौलीनाग को अपना कुलदेवता व इष्टदेव मानते हैं। दूर-दराज प्रवास में रहने वाले लोग जब भी अपने पैतृक गांव लौटते हैं, तो सर्वप्रथम धौलीनाग के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। परंपरा के अनुसार धामी वर्ग के लोग मंदिर के मुख्य पूजक हैं, जबकि खंतोली गांव के पंत पुरोहित सात्विक पूजन संपन्न कराते हैं और पांडे परिवार द्वारा शुद्ध घी, दूध व खीर का दिव्य भोग तैयार किया जाता है। स्थानीय लोग अपनी हर नई फसल का पहला अन्न नैवेद्य के रूप में अपने इष्टदेव को ही समर्पित करते हैं।
क्षेत्र के बुजुर्गों का अटूट विश्वास है कि धौलीनाग जी की छत्रछाया के कारण इस पूरे अंचल में महामारी, सूखा, अकाल, बाढ़, भूस्खलन, सर्पदंश और हिंसक जंगली जानवरों का कोई भय नहीं रहता। स्थानीय बोली में इसे उधाण मंदिर भी कहा जाता है, जहां देवता पिंडी स्वरूप में पूजे जाते हैं। मंदिर के पूर्व में नौलिंग, पश्चिम में मां भगवती, उत्तर में बंजैण मूल नारायण तथा दक्षिण में हुरमल व भूमिया देवता के मंदिर सुरक्षा चक्र के रूप में स्थित हैं। इस मंदिर का एक अद्वितीय रहस्य यह भी है कि जब धौलीनाग जी की पिंडी को दूध, जल और पुष्पों से स्नान कराया जाता है, तो वह पावन जल भूमिगत प्राकृतिक सुरंग के माध्यम से तीन किलोमीटर दूर देलख गांव में प्रकट होता है।
महर्षि कश्यप और माता कद्रू के गर्भ से उत्पन्न नागवंश की यह पावन परंपरा समूचे कुमाऊं और गढ़वाल मंडल के जन-मानस में रची-बसी है। पाताल के स्वामी नागराज का हिमालय के इस रमणीक शिखर पर साक्षात वास न केवल देवभूमि की अलौकिक संस्कृति को दर्शाता है, बल्कि प्रकृति, देव-शक्तियों और मानवीय आस्था के उस रहस्यमयी संबंध को भी उजागर करता है जो युगों-युगों से इस धरा को धन-धान्य, शांति और अखंड खुशहाली से परिपूर्ण बनाए हुए है।
@ रमाकान्त पन्त

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