“वो खोए पहाड़, और लौटती यादें”

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कुमाऊं की ऊँचाई पर बसा छोटा सा गाँव, हर सुबह सूरज की पहली किरण से जगता था। गाँव के घरों की लकड़ी की खिड़कियाँ, कच्ची मिट्टी की गलियाँ, और देवदार के जंगल सब कुछ यहाँ की पहचान थे। लेकिन आज वहाँ कुछ बदल गया था। गाँव की गलियों में पहले जैसी हँसी नहीं थी। बच्चों की किलकारियाँ, गाय-भैंस के आवाज़ों में गूँजती हल्की-हल्की गीतों की धुनें, अब एक अजीब खामोशी में बदल गई थीं।
पार्थ अपने पैतृक घर के बरामदे में बैठा था। उसकी आँखें दूर पहाड़ की ढलानों पर टिक गई थीं, जहाँ कभी उसके दोस्त खेलते थे, और गाँव के त्योहारों में सारी रौनक बसती थी। लेकिन अब वहाँ बस खाली मैदान और सूखी पगडंडी रह गई थी। उसके मित्र, उसके दोस्त सब शहर की ओर निकल चुके थे, कुछ रोजगार के लिए, कुछ पढ़ाई के लिए।
पार्थ ने महसूस किया कि पहाड़ का प्यार, उसकी मिट्टी की खुशबू, ठंडी हवा और हर सुबह की ताजगी सब कुछ अब सिर्फ़ यादों में रह गया है। परिवार की आर्थिक स्थिति ने उन्हें मजबूर किया था। माँ ने कई बार रोते हुए कहा था
“बेटा, हम चाहें तो रह सकते हैं, लेकिन तुम्हारा भविष्य… शहर में ही है।”
शहर की चमक और अवसरों ने गाँव की मासूमियत को पीछे छोड़ दिया। पार्थ को समझ आया कि पलायन केवल स्थान बदलने की कहानी नहीं है। यह सपनों, मजबूरियों, और अनकही भावनाओं की कहानी है, जो हर परिवार की ज़िंदगी में उतरती है। पार्थ अक्सर अपने बचपन की यादों में खो जाता। वह याद करता गाँव की छोटी-छोटी खुशियाँ बरसात में धारा में नहाना, पेड़ों पर चढ़कर आम तोड़ना, और दोस्तों के संग त्योहारों की तैयारी। वह याद करता उन रातों को, जब पूरा परिवार बाखली पर बैठकर सितारों को गिनता था। अब वही रातें, वही सितारे, सिर्फ़ उसकी यादों में थे।
एक दिन पार्थ बरामदे पर बैठा, हाथों में पुरानी तस्वीरें लिए, धीरे-धीरे खुद से कहने लगा
“मैं यहाँ की हवाओं को, पहाड़ों की ठंडी छाँव को कभी नहीं भूलूँगा। शहर में सब कुछ होगा रोज़गार, पढ़ाई, दोस्त… लेकिन ये पहाड़ की मिट्टी, ये गांव की गलियाँ, ये हर सुबह की शांति—इनको कहाँ ढूँढूँगा?”
गाँव की नदी अब भी बह रही थी, लेकिन उसके पानी में पहले जैसा जीवन नहीं था। वह नदी मानो कह रही थी”जो चला गया, लौट कर आएगा, लेकिन वही जगह, वही खुशियाँ, वही हवा बस यादों में रह जाएंगी।”
पार्थ ने महसूस किया कि पलायन सिर्फ़ दूरी नहीं बढ़ाता, बल्कि दिल में खाली जगह भी छोड़ जाता है। पर वही खाली जगह, वही यादें, वही प्यार एक ऐसी चीज़ है जो किसी शहर की चमक में नहीं मिलती।
शहर जाने की तैयारी करते हुए पार्थ ने गाँव की ओर आखिरी बार देखा। आँखे नम थीं, मन भारी था। उसने माँ की ओर मुस्कराते हुए कहा
“माँ, मैं लौटकर आऊँगा, और फिर इस गाँव की खुशबू, इस पहाड़ की हवा, इन यादों को हर पल अपने साथ रखूँगा।”
शहर की रोशनी के बीच भी उसके मन में गाँव की हर धड़कन, हर खुशबू जिंदा थी। उसने जाना पहाड़ से पलायन केवल एक यात्रा नहीं, यह दिल, यादों और सपनों की लंबी कहानी है, जिसे हर पल महसूस किया जा सकता है।

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