अयोध्या के सन्नाटे में छिपा वो कौन सा हजारों साल पुराना जीवंत गवाह है, जिसके सामने रो पड़े थे खुद भगवान राम और भरत? जानिए नंदीग्राम के उस अलौकिक पेड़ का संपूर्ण पौराणिक सच!

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अयोध्या (विशेष संवाददाता)
अयोध्या धाम से कुछ दूरी पर स्थित नंदीग्राम का भरतकुंड एक ऐसा अलौकिक स्थान है, जहाँ की हवाओं में आज भी अनन्य भक्ति, त्याग और भ्रातृ-प्रेम की गूँज सुनाई देती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि त्रेतायुग में श्रीराम के 14 वर्षों के वनवास के दौरान हुए सबसे बड़े त्याग और राम-भरत के भावुक मिलन का सच्चा साक्षी कोई इंसान नहीं, बल्कि एक अति-प्राचीन विशाल वृक्ष है?
नंदीग्राम परिसर में खड़ा विशाल पाकड़ (पाकर) और वट का पेड़ महज कोई साधारण वनस्पति नहीं है। पौराणिक आख्यानों और जनश्रुतियों के अनुसार, यह वृक्ष उस दौर का मूक साक्ष्य है जब अयोध्या की विशाल राजसत्ता को ठुकरा कर राजकुमार भरत ने एक तपस्वी का जीवन बिताया था।
शास्त्रों और धर्मग्रंथों में दर्ज है इस पावन स्थल का सच
महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित वाल्मीकि रामायण के ‘अयोध्या कांड’ और गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘श्रीरामचरितमानस’ में नंदीग्राम के इस घटनाक्रम का अत्यंत भावुक और विस्तृत वर्णन मिलता है।
श्रीरामचरितमानस के अयोध्या कांड में तुलसीदास जी लिखते हैं कि जब भगवान श्रीराम वनवास चले गए, तब भरत जी ने अयोध्या के राजमहल और सुख-सुविधाओं का पूर्णतः त्याग कर दिया। वे नंदीग्राम पहुँचे और वहाँ एक छोटी सी पर्णकुटी बनाकर रहने लगे। उन्होंने भगवान राम की पावन खड़ाऊँ (चरण पादुकाओं) को सिंहासन पर विराजमान किया और स्वयं सिर पर जटा धारण कर, भूमि पर सोकर 14 वर्षों तक उग्र तपस्या की।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, भरत जी जिस कुटिया में साधना करते थे और जहाँ बैठकर वे राज्य का संचालन प्रभु राम के प्रतिनिधि बनकर करते थे, वहाँ यह पावन पाकड़ व बरगद का वृक्ष अपनी शीतल छाया प्रदान करता था। भरत जी के आंसुओं से सींची गई यह भूमि और इस वृक्ष की जटाएँ उनके 14 वर्षों के अखंड जप, नियम और समर्पण की निरंतर गवाह बनीं।
जब दसों दिशाएं रो पड़ीं: राम-भरत का वो ऐतिहासिक मिलन
14 वर्षों का कठिन वनवास काल पूरा होने के बाद जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या की सीमा में पहुँचे, तो वे सबसे पहले नंदीग्राम में अपने प्रिय भाई भरत से मिलने उतरे।
शास्त्रों में वर्णन आता है कि जब श्रीराम और भरत का पुनर्मिलन हुआ, तो दोनों भाइयों का प्रेम इतना उफान पर था कि वे एक-दूसरे से लिपटकर अश्रुपात करने लगे। उस क्षण इस विशाल वृक्ष ने भी अपनी पुष्प-पत्तियाँ बरसाकर और अपनी जटाओं की छाँव तले दोनों भाइयों के महामिलन का अभिनंदन किया था। रामचरितमानस में इस दृश्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि उस समय न केवल मनुष्य, बल्कि प्रकृति, पशु-पक्षी और यहाँ तक कि कठोर शिलाएँ भी भरत-राम के प्रेम को देखकर द्रवीभूत हो गई थीं।
आज भी स्पंदित होती है अलौकिक ऊर्जा
वर्तमान में भरतकुंड (नंदीग्राम) आने वाले श्रद्धालु जब इस अति-प्राचीन पाकड़ और बरगद के वृक्ष को देखते हैं, तो श्रद्धा से नतमस्तक हो जाते हैं। वनस्पति विशेषज्ञों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार यह वृक्ष कई शताब्दियों से यहाँ सीना ताने खड़ा है।
इसकी विशाल छाल, दूर तक फैली शाखाएँ और झूलती हुई जटाएँ आज भी त्रेतायुग की उस महान साधना, भ्रातृ-प्रेम और त्याग की अमर कहानी सुनाती हैं। धर्मशास्त्रियों का मानना है कि नंदीग्राम का यह विशाल वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि राम-भरत के पावन संवाद और अटूट निष्ठा का एक ऐसा जीवंत प्रतीक है, जो युगों-युगों तक मानव जाति को त्याग और भ्रातृ-प्रेम का संदेश देता रहेगा।