अल्मोड़ा के बीहड़ों में 1100 वर्ष पुराना पाषाण रहस्य: क्या बमनस्वाल की ‘एकादश देवलियों’ में आज भी जाग्रत है त्रिनेत्र महादेव का तीसरा नेत्र?
जागेश्वर मार्ग पर स्थित बमनस्वाल घाटी में बिना गारे-चूने के शिला-संतुलन पर टिकी हैं 9वीं सदी की कत्यूरी देवलियाँ; स्कन्दपुराण के मानसखण्ड में दर्ज ‘कपिल-क्षेत्र’ और नागराज वासुकि की दावानल मुक्ति से जुड़े पुरातात्विक साक्ष्य।
विशेष खोज रिपोर्ट | रमाकान्त पन्त
विश्वप्रसिद्ध जागेश्वर धाम से महज कुछ किलोमीटर पहले, पेटशाल के समीप मुख्य मार्ग छोड़ते ही आधुनिक सभ्यता का कोलाहल पीछे छूट जाता है। देवदार और चीड़ के सघन जंगलों के बीच उतरती एक संकरी पगडंडी सीधी बमनस्वाल (बमन शिवाल) गाँव की उस मौन घाटी में ले जाती है, जहाँ काले-भूरे पाषाणों का एक ऐसा देवालय संकुल सांस ले रहा है जिसे स्थानीय जनमानस श्रद्धा से ‘त्रिनेत्रेश्वर महादेव’ अथवा ‘एकादश देवलियाँ’ कहता है।
करीब 1100 वर्ष पुराने इस संकुल में कदम रखते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि यह स्थान केवल एक प्राचीन धरोहर नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति के उस विस्मृत अध्याय का सजीव साक्षी है जिसका विस्तृत उल्लेख ‘स्कन्दपुराण’ के ‘मानसखण्ड’ में मिलता है।
बिना चूने-गारे के शिलाओं का अद्भुत संतुलन
पुरातत्वविदों के अनुसार, 9वीं से 10वीं शताब्दी के दौरान कत्यूरी और नागर शैली में निर्मित यह मंदिर समूह स्थापत्य का एक विस्मयकारी नमूना है। इन देवलियों के निर्माण में किसी गारे, चूने या बंधक सामग्री का उपयोग नहीं किया गया है; बल्कि केवल विशाल शिलाखंडों के सटीक गुरुत्वीय संतुलन पर ये मंदिर ग्यारह सौ वर्षों से प्राकृतिक आपदाओं और मौसमी थपेड़ों को झेलते हुए अडिग खड़े हैं।
स्थानीय परंपरा में इसे भगवान शिव के ग्यारह संहारक और जाग्रत स्वरूपों का प्रतीक ‘एकादश रुद्र देवलिया’ कहा जाता है। मुख्य गर्भगृह के शांत अंधकार में स्थापित शिवलिंग महादेव के तीसरे नेत्र की ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। इसी परिसर में कुमार कार्तिकेय, बटुक भैरव और उमा-महेश्वर की दुर्लभ आलिंगनबद्ध पाषाण प्रतिमा आज भी अपने मूल ओज के साथ सुरक्षित विद्यमान है।
शाली नदी और ब्रह्मकुंड: तीसरे नेत्र की संहारक ज्वाला को शांत करने का स्थल
स्कन्दपुराण के मानसखण्ड के 55वें अध्याय (शालीमाहात्म्य) में इस पूरे भौगोलिक परिक्षेत्र का सिलसिलेवार विवरण दर्ज है। पुराण के अनुसार, टंकण पर्वत के पश्चिम में स्थित श्वेतकक्ष पर्वत के धवलसर (वर्तमान धौलछीना) से सरिताओं में श्रेष्ठ ‘शाली’ नदी (वर्तमान स्वाल/सुयाल गाड़) का प्राकट्य हुआ।
यही शाली नदी बमनस्वाल की घाटी में त्रिनेत्र महादेव के पाषाण चरणों को पखारती हुई आगे बढ़ती है। मंदिर के सम्मुख नदी की धारा में चार विशाल शिलाओं के मध्य एक गहरा कुंड बनता है, जिसे ‘ब्रह्मकुंड’ कहा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि जब देवाधिदेव महादेव के तीसरे नेत्र के प्रचंड तेज से काम और अज्ञान भस्म हुआ, तब एकादश रुद्रों के उस संहारक ताप को इसी शीतल घाटी और ब्रह्मकुंड के पावन जल ने शांत किया था। मानसखण्ड में यहाँ स्थापित शिव को दिगंबर, चिता-भस्म विभूषित और श्मशान-निलय बताते हुए उनकी आराधना से सीधे शिवलोक की प्राप्ति का विधान कहा गया है।
मानसखण्ड के पन्नों में नया रहस्य: ‘कपिल-क्षेत्र’ और नागराज वासुकि की शरणागति
इस देवालय का संबंध केवल एक स्थानीय मान्यता तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसखण्ड के 56वें और 57वें अध्याय के पुरातात्विक और आध्यात्मिक प्रमाण इसे एक व्यापक शैव परिमंडल से जोड़ते हैं। पुराण के अनुसार, कौशिकी के वामभाग में स्थित पवित्र शक्तिपीठ ‘वृन्दगिरि’ (वर्तमान बानोली देवी) और देवाधिदेव के परम धाम ‘दारुकानन’ (जागेश्वर) के मध्य का यह समूचा भूभाग ‘कपिल-क्षेत्र’ कहलाता है।
महर्षि व्यास वर्णन करते हैं कि यह क्षेत्र नंदी, स्कंद, गणेश और षोडश (सोलह) मातृकाओं की जाग्रत ऊर्जा से सुरक्षित है। मानसखण्ड के 56वें अध्याय के अंत और 57वें अध्याय में दर्ज प्रसंग के अनुसार, जब नागराज वासुकि और अन्य नाग सांसारिक पापों और संताप रूपी दावानल से झुलसने लगे (“अद्य दावाग्निदग्धास्त्वां वयं हि शरणं गताः”), तब वे मुक्ति की पुकार लेकर इसी क्षेत्र में स्थित महर्षि कपिल के पावन आश्रम में पहुँचे थे। नागों की जिज्ञासा थी कि जो जन सांख्य-योग के नियमों को नहीं जानते, वे किस तीर्थ के दर्शन से इस भव-दावानल से छूट सकते हैं?
तब महर्षि कपिल ने दीर्घ समाधि के पश्चात जिस पावन भूमि और महाशिव स्वरूप का दर्शन नागों को कराया था, वह यही दारुक और वृन्दगिरि के मध्य फैला क्षेत्र था।
मौन साधकों की योगस्थली: कपिलेश्वर और त्रिनेत्र महादेव का साम्य
मानसखण्ड में इस क्षेत्र में प्रतिष्ठित महादेव को मौन साधकों का उद्धारक बताते हुए कहा गया है:
“मूकमागंरतानां च योगमार्गप्रदर्शकः। तमाराध्य मनुष्याणां जायते सिद्धिरुत्तमा ॥”
अर्थात् जो साधक बाहरी प्रपंचों और वाणी के कोलाहल से दूर रहकर अंतर्यात्रा करते हैं, उन्हें कपिलेश्वर महादेव अनायास ही योगसिद्धि प्रदान करते हैं। बमनस्वाल की यह एकादश देवलियाँ इसी मौन साधना का पाषाण-विग्रह प्रतीत होती हैं, जहाँ सदियों से साधक निस्तब्धता में ध्यानमग्न होते रहे हैं।
जागेश्वर की चकाचौंध के बीच संरक्षण की बाट जोहता तीर्थ
जहाँ एक ओर जागेश्वर धाम को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर पर्यटन और तीर्थाटन के प्रमुख केंद्र के रूप में ख्याति मिली है, वहीं उसी आध्यात्मिक परिपथ पर शाली नदी के तट पर बसा बमनस्वाल का यह त्रिनेत्रेश्वर देवालय आज भी व्यापक प्रचार और संरक्षण की बाट जोह रहा है। 1100 वर्षों से सीना ताने खड़े ये दुर्लभ पाषाण मंदिर, उनका अद्वितीय गुरुत्वीय संतुलन और स्कन्दपुराण के पन्नों में दर्ज इनका इतिहास आज भी इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और श्रद्धालुओं के लिए एक गहन अनुसंधान का विषय बना हुआ है।
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