हल्दूचौड़ (नैनीताल): सच्चा सुख और शांति भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि परमात्मा के स्मरण और उनके आनंद स्वरूप के साक्षात्कार में निहित है। कलियुग में ईश्वर की प्राप्ति का सबसे सरल, सुलभ और अचूक साधन प्रभु का पावन ‘नाम संकीर्तन’ है। यह अमृत वचन हल्दूचौड़/बच्ची धर्मा के ख्यातिप्राप्त प्रखर कथावाचक श्री रमेश चन्द्र कोटिया ‘रामानन्द महाराज’ ने एक विशेष भेंट के दौरान व्यक्त किए।
महाराज श्री ने आध्यात्मिक संवाद में ईश्वर के आनंदमय स्वरूप और ‘राम नाम’ की अलौकिक महिमा पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि परमात्मा ‘सच्चिदानंद’ (सत्-चित्-आनंद) हैं। जब जीवात्मा सांसारिक प्रपंचों से हटकर प्रभु के चरणों में चित्त लगाती है, तब उसे उस असीम आनंद की अनुभूति होती है, जिसके बाद संसार के सारे सुख फीके जान पड़ते हैं।
1. ईश्वर: अखंड आनंद और विश्राम के परम धाम
रामानन्द महाराज जी ने बताया कि भगवान श्री राम केवल एक व्यक्ति या रूप नहीं, अपितु समस्त आनंद और सुख के अथाह सागर हैं। श्रीरामचरितमानस में महर्षि वशिष्ठ जी ने नामकरण के समय भगवान के इसी आनंद स्वरूप को उजागर किया है:
चौपाई: आनंदसिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी॥ सो सुखधाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा॥
- भावार्थ: जो परमात्मा स्वयं आनंद के अथाह सिंधु और सुखों की अखंड राशि हैं, जिनके एक अंश मात्र के लेश से तीनों लोक परम सुखी हो जाते हैं, उन संपूर्ण सुखों के धाम और समस्त लोकों को विश्राम व शांति प्रदान करने वाले प्रभु का नाम ‘राम’ है।
2. नाम की महिमा: स्वयं भगवान से भी बढ़कर है उनका नाम
महाराज जी ने कहा कि शास्त्रों और संतों के मतानुसार ईश्वर से भी अधिक महिमा उनके ‘नाम’ की है। प्रभु श्री राम ने अपने अवतार काल में कुछ ही जीवों का उद्धार किया, परंतु उनके ‘नाम’ ने युगों-युगों से करोड़ों अधम और व्याकुल जीवों को भवसागर से पार उतार दिया।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने बालकाण्ड में नाम की महिमा का गुणगान करते हुए लिखा है:
चौपाई: राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥ ऋषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी॥
- भावार्थ: प्रभु श्री राम ने तो केवल एक तपस्वी की स्त्री (माता अहिल्या) का उद्धार किया, परंतु उनके पावन ‘राम नाम’ ने करोड़ों कुटिल बुद्धि वाले मनुष्यों की कुमति सुधार कर उन्हें परम पद प्रदान कर दिया।
3. कलिकाल में नाम ही एकमात्र आधार
कथावाचक रमेश चन्द्र कोटिया ‘रामानन्द महाराज’ ने भक्तों को प्रेरित करते हुए कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कठिन तप, बड़े यज्ञ या कठिन साधना हर किसी के लिए संभव नहीं है। कलियुग का सबसे बड़ा वरदान यही है कि केवल निष्कपट भाव से प्रभु के नाम का स्मरण करने मात्र से जीवन के समस्त कष्ट और पाप नष्ट हो जाते हैं:
चौपाई: कलयुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥ कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना॥
- भावार्थ: कलियुग में न तो कठिन योग संभव है, न बड़े यज्ञ और न ही गूढ़ ज्ञान। इस युग में केवल भगवन्नाम ही भवसागर से तरने का एकमात्र सुदृढ़ आधार है, जिसके निरंतर स्मरण और गुणगान से मनुष्य संसार-सागर को अनायास ही पार कर जाता है।
भक्तों को पावन संदेश:
संवाद के अंत में महाराज श्री ने क्षेत्रवासियों और श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने दैनिक जीवन में प्रतिदिन कुछ समय निकालकर प्रभु नाम जप और सत्संग अवश्य करें। जब तक वाणी पर प्रभु का नाम और हृदय में उनका आनंद स्वरूप वास नहीं करेगा, तब तक मानव जीवन की सच्ची सार्थकता सिद्ध नहीं हो सकती।
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