खामोश लहरों के नीचे दफन है युगों का तिलिस्म: क्या वक्त की गर्द में हमेशा के लिए खो जाएंगे पांडवों और नागलोक से जुड़े ये रहस्यमयी सरोवर?

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खामोश लहरों के नीचे दफन है युगों का तिलिस्म: क्या वक्त की गर्द में हमेशा के लिए खो जाएंगे पांडवों और नागलोक से जुड़े ये रहस्यमयी सरोवर?

देवभूमि उत्तराखंड की शांत घाटियों और बांज-बुरांश के घने जंगलों के बीच पसरे नीले जलकुंड केवल प्रकृति का अनूठा उपहार भर नहीं हैं, बल्कि यह उस अदृश्य तिलिस्म का प्रवेश द्वार हैं जहां इतिहास, पौराणिक आख्यान और रहस्यमयी मान्यताएं एक दूसरे में घुलमिल जाती हैं। सतयुग की तपस्या से लेकर द्वापर के महाभारत काल तक की अनगिनत ऐतिहासिक घटनाओं के मूक साक्षी रहे ये ताल आज अपनी ही नियति पर आंसू बहा रहे हैं। सदियों तक अध्यात्म और शक्ति का केंद्र रहे ये दिव्य सरोवर अब प्रशासनिक उपेक्षा, अवैध अतिक्रमण और वक्त की मार के चलते विस्मृति के गहरे अंधकार में समाने की कगार पर खड़े हैं।

पर्यटन के वैश्विक नक्शे पर चमकता नैनीताल का त्रिऋषि सरोवर अपनी जिस जादुई छटा से सैलानियों को बांधता है, वह प्रकृति का एक विस्मयकारी खेल है। गगनचुंबी पहाड़ियों से घिरे इस ताल के शांत सीने पर बादलों और विशाल वृक्षों का अक्स किसी बहुरूपिया दर्पण जैसा जान पड़ता है। इस पानी की तासीर भी किसी पहेली से कम नहीं—जेठ की तपती दोपहरों में इसका रंग पन्ने जैसा गहरा हरा दिखता है, बादलों के बरसते ही यह मटमैला रूप धर लेता है, और बर्फीली सर्दियां आते ही इसका स्वरूप पारदर्शी आसमानी नीलम जैसा चमकने लगता है।

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मगर नैनीताल की चकाचौंध से आगे बढ़ते ही लोकगाथाओं का रहस्यमयी जाल और गहरा हो जाता है। 21 किलोमीटर दूर स्थित भीमताल का विस्तार 449 मीटर लंबाई, 175 मीटर चौड़ाई और 50 मीटर की अथाह गहराई में फैला है। जनश्रुतियों के अनुसार, जब पांडव अज्ञातवास के दौरान प्यास से व्याकुल हुए, तब महाबली भीम ने अपनी गदा के प्रचंड प्रहार से पाताल को भेदकर इस जलधारा को प्रकट किया था। ताल के ठीक मध्य में स्थित निर्जन टापू और उसके जल के भीतर कत्यूर व नागवंशीय गाथाओं, विशेषकर नागराज कर्कोटक का वास आज भी स्थानीय मान्यताओं में खौफ और श्रद्धा दोनों जगाता है।

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कुछ ही फासले पर परिंदों के कलरव से गूंजता नौकुचियाताल अपनी अथाह गहराई के साथ एक ऐसा रहस्य समेटे है जिसके अनुसार कोई भी इंसान एक नजर में इसके नौ कोने नहीं देख सकता। इसी क्षेत्र में स्थित पंचकोणीय नल-दमयंती ताल पुष्कर के चक्रवर्ती राजा नल और महारानी दमयंती के दुर्दिनों का गवाह है। कहा जाता है कि जब राजा नल पर शनि का प्रकोप था, तब उन्होंने इसी तट पर घोर तप किया था, जिसके फलस्वरूप उन्हें पाताल भुवनेश्वर की गुफाओं में समस्त शिवलोक के अलौकिक दर्शन हुए। वहीं बांज के जंगलों में आपस में गुंथे सात झीलों का समूह सातताल (राम, सीता और लक्ष्मण ताल) त्रेतायुग की स्मृतियों को अपने निर्मल जल में संजोए हुए है।

रहस्यों की यह शृंखला केवल कुमाऊं की ऊंची पहाड़ियों तक सीमित नहीं है। तराई के काशीपुर में स्थित द्रोण ताल कौरव-पांडवों के गुरु और महाबली अश्वत्थामा के पिता गुरु द्रोणाचार्य की कठोर तपोस्थली रहा है। तट पर स्थापित गुरु द्रोण की प्राचीन प्रतिमा इस बात की ताकीद करती है कि कभी यहां महाबली योद्धाओं ने दिव्यास्त्रों की दीक्षा ली थी।

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इसके उलट, चंपावत का संतों की साधना से जुड़ा श्यामला ताल, रहस्यमयी गहराइयों वाला हरीश ताल, घोड़े की नाल के आकार का हरा-भरा खुर्पाताल, और घने बांज-देवदार के बीहड़ में छुपा झिलमिल ताल आज बदहाली की मार झेल रहे हैं। गढ़वाल की केदारघाटी से लेकर कुमाऊं के दूरस्थ अंचलों तक फैले ये सरोवर केवल शिव की आराधना के प्रतीक नहीं, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी की जीवन-रेखा हैं। गाद भरने, अनियंत्रित निर्माण और सुनियोजित संरक्षण नीति के अभाव में इन ऐतिहासिक सरोवरों का दायरा लगातार सिकुड़ रहा है। अगर समय रहते इन पौराणिक धरोहरों के संरक्षण की मजबूत पहल नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए पांडवों और राजा नल की ये जीवित निशानियां केवल दंतकथाओं के पन्नों तक सिमट कर रह जाएंगी।

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