घने जंगलों के बीच छिपा रहस्यमयी धाम: लालकुआं के बीहड़ों में कौन हैं ‘कहार महादेव’, जिनका सदियों पुराना रहस्य आज भी है अनसुलझा?

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घने जंगलों के बीच छिपा रहस्यमयी धाम: लालकुआं के बीहड़ों में कौन हैं ‘कहार महादेव’, जिनका सदियों पुराना रहस्य आज भी है अनसुलझा?

हल्दूचौड़/लालकुआं (नैनीताल)। कुमाऊं के प्रवेश द्वार लालकुआं और हल्दूचौड़ के मध्य, घने बीहड़ों के सीने में एक ऐसा अलौकिक आध्यात्मिक रहस्य धड़क रहा है, जिससे अधिकांश आधुनिक दुनिया आज भी अनजान है। घनघोर सन्नाटे और विशाल वन संपदा के पहरे में स्थित ‘कहार महादेव’ का यह प्राचीन शक्ति स्थल न केवल भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करने वाला जाग्रत केंद्र है, बल्कि अपने भीतर अनगिनत अनुत्तरित रहस्य समेटे हुए है। वियावान जंगल में इस प्राचीन शिवलिंग की स्थापना कब, किसने और किस कालखंड में की—इसका कोई प्रामाणिक इतिहास मौजूद नहीं है, लेकिन यहाँ की मिट्टी में श्रद्धा का प्रवाह युगों-युगों से अनवरत चला आ रहा है।

दूध की पहली धार और कहारों की विश्राम स्थली

वियावान जंगल के मध्य जो भी प्राणी अपनी आस्था के पुष्प भगवान आशुतोष के चरणों में अर्पित करता है, जनमान्यता है कि उसके समस्त रोग, शोक, दरिद्रता और विपदाओं का स्वतः हरण हो जाता है। विशेषकर हल्दूचौड़, भानदेव नवाड़ और कृष्णा नवाड़ के ग्रामीणों की इस पावन पीठ के प्रति गहरी निष्ठा है।

लोक-इतिहास के अनुसार, इस स्थान का नाम ‘कहार महादेव’ पड़ने के पीछे एक अत्यंत मार्मिक और ऐतिहासिक परंपरा जुड़ी है। 1960 के दशक में जब वनों के खत्तों (जैसे सापकटानी आदि) में निवास करने वाले ग्वाले और दूधिए कांवड़-कहार के रूप में वनों के बीहड़ रास्तों से दुग्ध व्यापार के लिए निकलते थे, तो यह स्थान उनकी मुख्य विश्राम स्थली हुआ करता था। अपने गंतव्य पर आगे बढ़ने से पहले वे महादेव की इस प्राचीन पिंडी पर ताजे दूध व जल का अर्घ्य देते थे। मान्यता है कि भोलेनाथ की इस कृपा से उनके घरों में दुग्ध-संपदा कभी कम नहीं हुई। आज भी परंपरा जीवित है—ग्रामीण अपने दुधारू पशुओं के दूध की पहली धार और खेतों की पहली फसल कहार महादेव को अर्पित करना नहीं भूलते।

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प्रकृति और परम-तत्व का अनूठा साक्षात्कार

घने जंगलों के मध्य बने एक छोटे से मंदिर में जब रामायण पाठ और संकीर्तन की गूंज उठती है, तो समूचा वातावरण तपोभूमि में बदल जाता है। यह स्थल सनातन संस्कृति और पर्यावरण के उस गूढ़ रहस्य को भी उजागर करता है जहाँ प्रकृति को ही ईश्वर का साक्षात स्वरूप माना गया है।

पद्म पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि जो मनुष्य वृक्षों का रोपण और संरक्षण करता है, वह स्वर्ग में उसी भांति फलता-फूलता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को ‘वृक्षों में पीपल’ कहकर प्रकृति की दिव्यता स्थापित की, तो वहीं तथागत बुद्ध ने वटवृक्ष की छत्रछाया में करुणा और ज्ञान का साक्षात्कार किया। नीम और वट के साए में बसा कहार महादेव का यह धाम मानव और प्रकृति के इसी सनातन रिश्ते का जीवंत साक्षी है।

पूरब का रहस्य: वन दुर्गा और वन शक्ति का अलौकिक घेरा

लालकुआं की वन भूमि का आध्यात्मिक विस्मय केवल पश्चिम में कहार महादेव तक सीमित नहीं है। इसके समानांतर पूर्वी वनों में, बिंदुखत्ता के आगे गौलापार क्षेत्र में आदिशक्ति ‘वन दुर्गा’ और ‘वन शक्ति’ का साम्राज्य फैला हुआ है।

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बिंदुखत्ता के पूर्वी छोर पर गौला गेट के जंगलों में स्थित माता वन दुर्गा का मंदिर साधकों की प्रमुख स्थली रहा है। मंदिर प्रांगण में विद्यमान दो समाधियां इस अलौकिक शक्ति का प्रमाण हैं, जहाँ सिद्ध संत रामगिरी महाराज ने 33 वर्षों तक और मनीष भारती ने 5 वर्षों तक अखंड साधना की थी। मंदिर में स्थापित मां काली की मूर्ति का इतिहास भी चमत्कारी है—कहा जाता है कि संत रामगिरी महाराज को गौला नदी के भीतर इस दिव्य विग्रह का स्वप्न हुआ था, जिसके बाद खनन कार्य के दौरान मजदूरों को यह मूर्ति प्राप्त हुई और इसे विधि-विधान से स्थापित किया गया।

वन दुर्गा मंदिर से उत्तर की ओर बढ़ने पर ‘देवी वन शक्ति’ का वह पावन क्षेत्र आता है जहाँ कोई भव्य मंदिर, छत या धर्मशाला नहीं है। खुले वियावान आकाश के नीचे, एक विशाल वट वृक्ष की छांव में कुछ सिंदूरी शिलाएं और उन पर बंधी चुनरियां ही इस शक्तिपीठ की पहचान हैं। 60 वर्षों तक यहाँ मौन तपस्या करने वाले विलक्षण संत रामबाबा के अनुसार, यह स्थान इतना जाग्रत है कि आज भी भगवती के वाहन सिंह की मौजूदगी यहाँ के सन्नाटे में महसूस की जाती है। इसी प्रकार चोरगलिया से 10 किमी दूर स्थित रैखाल वन क्षेत्र की देवी मैय्या भी संपूर्ण सृष्टि का समाचार जानने वाली वन देवी के रूप में पूजी जाती हैं।

त्रेतायुग की कथा और महादेव का दिव्य वचन

जनश्रुतियों में वन देवियों और कहार महादेव के परस्पर संबंध को लेकर एक अत्यंत दुर्लभ पौराणिक कथा प्रचलित है। मान्यता है कि त्रेतायुग में लंकापति रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए जब अपनी समस्त शक्तियां अर्पित कर दीं, तब अंत में उसने अपनी परम सुंदर दिव्य कन्याओं को भी महादेव के चरणों में समर्पित कर दिया। उन दिव्य कन्याओं ने कैलाश पर्वत पर जाकर कठोर तप किया। महादेव ने प्रसन्न होकर दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा।

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मानव काया त्याग चुकी उन तपस्विनी कन्याओं ने प्रभु के चरणों में स्थान मांगा। तब महादेव ने वरदान दिया कि वे मृत्युलोक के वनों में वास करते हुए ‘वन देवी’ के रूप में पूजी जाएंगी और भक्तों की रक्षा करेंगी। साथ ही भोलेनाथ ने वचन दिया कि जिस वन क्षेत्र में इन वन देवियों की आराधना होगी, वहाँ वे स्वयं भी ‘कहारों के देवता’ (कहार महादेव) के रूप में प्रतिष्ठित होकर संसार के कष्टों का निवारण करेंगे।

उपेक्षा के अंधेरे में छिपा आध्यात्मिक रत्न

आध्यात्मिक, पौराणिक और प्राकृतिक दृष्टि से अद्वितीय होने के बावजूद यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हल्दूचौड़ और लालकुआं के अधिकांश स्थानीय निवासी भी कहार महादेव के इस पावन महात्म्य से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। यदि शासन-प्रशासन और समाज का ध्यान इस ओर जाए, तो घने जंगलों के बीच स्थित यह स्थल उत्तराखंड के प्रमुख आध्यात्मिक पर्यटन और पर्यावरण-तीर्थ के रूप में वैश्विक पटल पर उभर सकता है।

दर्शन एवं मार्गदर्शन हेतु संपर्क: इस पावन और रहस्यमयी स्थल के दर्शन, पूजन और वन मार्ग की जानकारी के लिए कहार महादेव के निष्ठावान भक्त से संपर्क किया जा सकता है:

  • नाम: डी० के० जोशी
  • दूरभाष: +91 9927292620
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