जब देवभूमि में टकराए ‘हर’ और ‘हरि’: जानिए उस महासंग्राम का रहस्य, जहाँ आमने-सामने आ गए थे देवाधिदेव महादेव और योगेश्वर श्रीकृष्ण

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चम्पावत

हिमालय की गोद में बसी पावन उत्तराखंड की धरती केवल ऋषि-मुनियों की तपोस्थली ही नहीं, बल्कि उन अलौकिक रहस्यों और गाथाओं की साक्षी भी है जो मानव बुद्धि को विस्मय में डाल देती हैं। ऐसी ही एक रोंगटे खड़े कर देने वाली कथा जुड़ी है ‘हर’ (भगवान शिव) और ‘हरि’ (भगवान श्रीकृष्ण) के उस ऐतिहासिक महायुद्ध से, जिसने द्वापर युग में पूरे ब्रह्मांड को कंपित कर दिया था।

यह कथा है सहस्त्रबाहु, महाबलशाली और परम शिवभक्त राजा बाणासुर की। एक ऐसा प्रतापी राजा, जिसके शौर्य की कीर्ति पाताल से लेकर हिमालय के शिखरों तक गूंजती थी, परंतु काल के प्रवाह में अहंकार के वशीभूत होकर वह उन्मत्त हो उठा। अंततः अपने ही अनन्य भक्त को अहंकारमुक्त करने के लिए महादेव ने ऐसी लीला रची कि स्वयं नारायण को रणभूमि में उतरना पड़ा और यह संग्राम बाणासुर बनाम श्रीकृष्ण न रहकर सीधे ‘शिव और कृष्ण’ का महाभयानक द्वंद्व बन गया।

कुमाऊं का चम्पावत: कर्णकरायत, बिशंग और बाणासुर का अजेय किला

उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल अंतर्गत जनपद चम्पावत का आध्यात्मिक और ऐतिहासिक वैभव अत्यंत विराट है। सदियों से आस्था, भक्ति और रोमांच का केंद्र रही यह भूमि अतीत के अनगिनत रहस्यों को समेटे हुए है। लोहावती नदी के पावन तट पर, लोहाघाट से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर सुनहरी पहाड़ियों के मध्य स्थित ‘कर्णकरायत’ (बिशंग गांव) को महाप्रतापी राजा बाणासुर की राजधानी के रूप में पूजा और जाना जाता है।

पाताल नरेश दानवीर राजा बलि के सौ पुत्रों में बाणासुर सबसे ज्येष्ठ और असीम पराक्रमी थे। बाणासुर को महाकाल, सहस्त्रबाहु और भूतराज के नामों से भी जाना जाता था। उनकी पत्नी अनौपम्या भी पति के समान ही अनन्य शिवभक्त थीं। बाणासुर ने अपनी कठोर तपस्या से देवाधिदेव महादेव को प्रसन्न कर ‘शिवपुत्र’ की पदवी और यह अमर वरदान प्राप्त किया था कि जब भी उन पर कोई संकट आएगा, स्वयं महादेव उनकी रक्षा के लिए उपस्थित होंगे।

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बाणासुर का व्यक्तित्व इतना विराट था कि उनका उल्लेख केवल द्वापर युग में ही नहीं, बल्कि त्रेता युग में माता सीता के स्वयंवर में भी आता है, जहाँ उन्होंने लंकापति रावण को अहंकार न करने की स्पष्ट चेतावनी दी थी।

स्वप्न, प्रेम और द्वारिका से अपहरण का रहस्य

महाभारत युद्ध के पश्चात जब योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारिका में वास कर रहे थे, तब उनके प्रतापी प्रपौत्र अनिरुद्ध (श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के पुत्र) और बाणासुर की परम सुंदरी पुत्री उषा के मध्य एक अनोखा संबंध बना।

माता पार्वती की प्रेरणा से राजकुमारी उषा ने स्वप्न में एक अत्यंत रूपवान राजकुमार के दर्शन किए और उनके प्रति आसक्त हो उठीं। जब उषा विरह की अग्नि में जलने लगीं, तब उनकी घनिष्ठ सखी चित्रलेखा—जो बाणासुर के महामंत्री कुंभांड की पुत्री और तंत्र, योग व चित्रकला की महान विदुषी थीं—ने अपने योगबल से कई राजकुमारों के चित्र बनाए। जैसे ही अनिरुद्ध का चित्र सामने आया, उषा लजाकर बोल उठीं कि यही उनके सपनों के राजकुमार हैं।

चित्रलेखा ने अपनी मायावी विद्या से द्वारिका जाकर शयनकक्ष में सो रहे राजकुमार अनिरुद्ध को पलंग सहित उड़ाकर बाणासुर के शोणितपुर (बिशंग) स्थित महल में पहुंचा दिया। वहाँ उषा और अनिरुद्ध ने गंधर्व विवाह कर लिया और गुप्त रूप से महल में रहने लगे।

जब भड़का महासंग्राम: हर-हरि का टकराव

जब बाणासुर को अपनी कन्या के प्रेम और अनिरुद्ध के महल में होने की सूचना मिली, तो उसका अहंकार जाग उठा। उसने अनिरुद्ध को ललकारा और घमासान युद्ध के बाद छल से उन्हें नागपाश में बांधकर कारागार में डाल दिया।

देवर्षि नारद के माध्यम से जब यह समाचार द्वारिका पहुंचा, तो श्रीकृष्ण और बलराम अत्यंत क्रुद्ध होकर चतुरंगिणी सेना के साथ शोणितपुर पर टूट पड़े। बाणासुर की सेना परास्त होने लगी। अपने पराभव को देखकर बाणासुर ने अपने इष्ट भगवान आशुतोष का स्मरण किया। महादेव अपने भक्त को दिए वचन से बंधे थे; परिणामस्वरूप भगवान शिव अपने रुद्रगणों सहित बाणासुर की ओर से रणभूमि में आ डटे।

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एक ओर चक्रधारी श्रीकृष्ण और दूसरी ओर त्रिशूलधारी महादेव! इतिहास का वह सबसे दुर्लभ और भयावह युद्ध छिड़ गया। प्रकृति डोल उठी, अस्त्र-शस्त्रों के टकराव से आकाश में ज्वालाएं फूटने लगीं। जब युद्ध किसी निर्णय पर नहीं पहुंचा, तब श्रीकृष्ण ने भगवान शिव की गुप्त स्तुति कर निवेदन किया:

“हे देवाधिदेव! बाणासुर का अहंकार नष्ट करना आवश्यक है, किंतु आपके सम्मुख रहते यह संभव नहीं। आप ही इस लीला का मार्ग प्रशस्त करें।”

महादेव ने प्रभु के संकेत को समझा और श्रीकृष्ण को एक विशेष अस्त्र का संधान करने की प्रेरणा दी, जिससे शिवजी योगनिद्रा के प्रभाव में आ गए। इसी क्षण का लाभ उठाकर श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र का संधान किया और बाणासुर की दो (या चार) भुजाओं को छोड़कर शेष सभी भुजाएं काट डालीं।

जब श्रीकृष्ण बाणासुर का अंत करने ही वाले थे, तभी महादेव ने सुदर्शन चक्र के वेग को रोक दिया और अपने प्रिय भक्त के प्राणों की भिक्षा मांगी। हर और हरि की इस अद्भुत लीला को देखकर बाणासुर का सारा अहंकार गलकर बह गया। उसे बोध हुआ कि शिव और कृष्ण दो नहीं, अपितु एक ही परमतत्व हैं। बाणासुर ने नतमस्तक होकर क्षमा मांगी, अनिरुद्ध को मुक्त कर उषा का विवाह पूरे विधि-विधान से उनके साथ कराया।

आज भी चम्पावत के कर्णकरायत में स्थित बाणासुर का प्राचीन किला अपने विशाल पत्थरों, मजबूत प्राचीरों और हिमालयी दृश्यों के साथ इस अमर गाथा की गवाही देता है।

ऐसा भी माना जाता है: गढ़वाल का उषा-मठ (उखीमठ) और ओंकारेश्वर का पावन प्रसंग

हिमालयी भूभाग के रहस्यों की कोई सीमा नहीं है। कुमाऊं के चम्पावत के साथ-साथ, ऐसा भी माना जाता है कि राजा बाणासुर का गढ़वाल मंडल के वर्तमान रुद्रप्रयाग जिले से भी अत्यंत गहरा और अटूट संबंध था।

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रुद्रप्रयाग का प्रसिद्ध तीर्थ ‘उखीमठ’ पौराणिक काल में ‘उषामठ’ (उषामाथ) के नाम से विख्यात था, जिसका नामकरण बाणासुर की पुत्री उषा के नाम पर ही हुआ था। यह वही पावन स्थल है जहाँ भगवान केदारनाथ जी की छह माह तक शीतकालीन पूजा संपन्न होती है और ओंकारेश्वर मंदिर पंचकेदार का प्रमुख केंद्र है।

गढ़वाल क्षेत्र की मान्यताओं के अनुसार:

  • राजा बाणासुर का मुख्य महल और तपोभूमि इसी क्षेत्र में विस्तृत थी। यहीं पर अनिरुद्ध और उषा के प्रेम की पृष्ठभूमि तैयार हुई थी।
  • जब श्रीकृष्ण ने शोणितपुर पर धावा बोला था, तब उखीमठ के समीपवर्ती मैदानों में बलराम जी ने बाणासुर के महाबली सेनापति कुंभांड और कूपकर्ण का वध किया था।
  • यहाँ के स्थानीय आख्यानों में वर्णन आता है कि जब युद्ध में भगवान शिव ने अपना रौद्र रूप धारण कर त्रिशूल उठाया, तो केवल श्रीकृष्ण ही उनके तेज के सम्मुख टिक सके थे।
  • श्रीकृष्ण ने जब महादेव को उनके वचन का स्मरण कराया कि बाणासुर का मान-मर्दन निश्चित है, तब महादेव संतुष्ट होकर अंतर्ध्यान हुए। अंत में बाणासुर के अहंकार का अंत कर इसी उषा-मठ में अनिरुद्ध और उषा का दिव्य मिलन हुआ।

देवभूमि में अमर है हर-हरि की लीला

कुमाऊं के चम्पावत का कर्णकरायत-बिशंग हो या गढ़वाल के रुद्रप्रयाग का उखीमठ—उत्तराखंड का कण-कण उस दिव्य संदेश को संजोए हुए है जहाँ भगवान शिव ने अपने भक्त का उद्धार किया और योगेश्वर श्रीकृष्ण ने यह सिद्ध किया कि ईश्वर के दरबार में अहंकार की कोई जगह नहीं होती। सदियों बाद भी इन ऐतिहासिक धरोहरों और किलों के खंडहरों से एक ही गूंज सुनाई देती है—‘शिव ही कृष्ण हैं, और कृष्ण ही शिव हैं।’

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