देवशिल्पी विश्वकर्मा के रहस्य से जुड़ा वो अनूठा धाम: गंगोलीहाट का छिपा हुआ बद्रीनाथ दरबार, जहाँ बहन को ‘भिटौली’ देने आते हैं साक्षात नारायण
उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में कई ऐसे देवस्थल हैं, जिनका इतिहास और रहस्य आज भी लोगों को विस्मय में डाल देता है। पिथौरागढ़ जनपद के गंगोलीहाट से महज 10 किलोमीटर दूर, पवित्र रामगंगा नदी के तट पर बसा ‘कनारा गूंथ’ गांव ऐसा ही एक अलौकिक धाम समेटे हुए है। यहाँ कुलदेवी माँ कनारा के आंचल में भगवान श्री बद्रीनाथ जी का सदियों पुराना पावन मंदिर स्थित है। तीर्थाटन के नक्शे पर भले ही यह मंदिर लंबे समय तक गुमनामी के साये में रहा हो, लेकिन इसकी आध्यात्मिक भव्यता और रहस्यमयी परंपराएं किसी को भी मंत्रमुग्ध कर देने के लिए पर्याप्त हैं।
नेपाल नरेश की प्रेरणा और ‘नैनाक’ की अनूठी परंपरा
कनारा गूंथ गांव के निवासी सूरज सिंह भंडारी बताते हैं कि सैकड़ों वर्ष पूर्व, कुमाऊं के राजा ने नेपाल नरेश की प्रेरणा से यह पावन भूमि भगवान बद्रीनाथ को समर्पित की थी। उस दौर में नेपाल से बद्रीनाथ धाम जाने वाले श्रद्धालु इसी रास्ते से गुजरते थे और भगवान को भोग (स्थानीय भाषा में ‘नैनाक’) अर्पित करते थे।
राजाज्ञा के तहत यहाँ भंडारी उपजाति के एक परिवार को बसाया गया और निर्देश दिया गया कि वे यहाँ सुखपूर्वक खेती करें तथा हर फसल का पहला अन्न (‘नैनाक’) प्रभु बद्रीनाथ को अर्पित करें। भगवान विष्णु की कृपा से स्थापित यह धाम और नैनाक भोग की परंपरा आज भी बद्रीश भक्त भंडारी परिवार द्वारा उसी श्रद्धा से निभाई जा रही है।
भाई-बहन का अमर स्नेह: नवरात्र में निकलती है ‘भिटौली’ की डोली
इस मंदिर की सबसे अनूठी और भावुक कर देने वाली मान्यता यह है कि भगवान बद्रीनाथ जी को क्षेत्र की अधिष्ठात्री एवं कुलदेवी माँ कनारा का भाई माना जाता है।
हर वर्ष चैत्र मास के पहले नवरात्र पर यहाँ एक दुर्लभ दृश्य देखने को मिलता है। लोक परंपरा के अनुसार, भगवान बद्रीनाथ की भव्य डोली अपनी बहन माता भगवती कनारा को ‘भिटौली’ (कुमाऊं में विवाहित बहनों को उपहार देने की लोक परंपरा) देने निकलती है। संकटहरणी और मंगलकरणी माँ कनारा और उनके भ्राता भगवान बद्रीश के इस मिलन के साक्षी बनने के लिए दूर-दराज से भक्त खिंचे चले आते हैं।
देवशिल्पी विश्वकर्मा की विरासत का आभास
कुमाऊं क्षेत्र के सोमेश्वर में स्थित प्राचीन बद्रीनाथ मंदिर की तरह—जिसके बारे में मान्यता है कि वहाँ स्थापित श्री बद्रीश की दिव्य मूर्ति को स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा ने गढ़ा था—कनारा गूंथ का यह बद्रीनाथ मंदिर भी अपने पौराणिक शिल्प और दिव्यता के लिए विख्यात है। यहाँ पहुँचने वाले श्रद्धालुओं को बद्रीनाथ मुख्य धाम जैसी ही आध्यात्मिक ऊर्जा और विश्वकर्मा कालीन प्राचीन शिल्पकला के दर्शन की अनुभूति होती है।
वीर चक्र विजेता की जन्मभूमि से जुड़ा गौरव
कनारा गांव केवल आध्यात्म का ही नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति और शौर्य का भी पावन प्रतीक है। भारतीय सेना के जांबाज सपूत और माँ काली के अनन्य भक्त, वीर चक्र विजेता स्वर्गीय श्री शेर सिंह भंडारी ने इसी पावन माटी पर जन्म लिया था। यह वही वीर सेनानी हैं, जिन्होंने 26 जनवरी 1950 को प्रथम गणतंत्र दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर प्रसिद्ध शक्तिपीठ हाट कालिका में पहली भव्य मूर्ति की स्थापना कराई थी।
वर्तमान में जरमालगांव से कनारा गूंथ तक जाने वाली सड़क का नामकरण इन्हीं वीर चक्र विजेता श्री शेर सिंह भंडारी के नाम पर किया गया है। लगभग दो वर्ष पूर्व निर्मित यह सड़क माँ कनारा देवी धाम की सुंदर परिक्रमा भी कराती है, जिससे अब श्रद्धालुओं के लिए इस गुप्त तीर्थ तक पहुँचना अत्यंत सुगम हो चुका है।
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