मानसखण्ड के पन्नों में दर्ज पिथौरागढ़ की ‘विश्वकर्मा गुफा’: बाणासुर की माता कोटवी का जाग्रत शक्तिपीठ, जहाँ सुरक्षित है सदियों का पौराणिक व पुरातात्विक वैभव
स्कंद पुराण के 131वें और 132वें अध्याय में वर्णित है घुन्स्यारी देवी व सोर घाटी का महात्म्य; कत्यूरी मूर्तिकला, धार्मिक इतिहास और लोक-आस्था का प्रमुख केंद्र बनी घुंसेरा की प्राकृतिक गुफा
पिथौरागढ़: देवभूमि उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ (प्राचीन सोर घाटी) की उपत्यकाओं में सनातन संस्कृति, इतिहास और पुराणों के कई ऐसे अध्याय सुरक्षित हैं, जो आज भी शोधकर्ताओं और श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखते हैं। जिला मुख्यालय से मात्र 5 से 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित घुंसेरा गांव की ऐतिहासिक प्राकृतिक गुफा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इस गुफा में प्रतिष्ठापित ‘माता कोटवी देवी’ (जिन्हें लोक-परंपरा में ‘घुन्स्यारी देवी’ व ‘घुंघरू वाली देवी’ भी कहा जाता है) का देवालय केवल एक स्थानीय पूजा-स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन ग्रंथों में उल्लेखित एक सिद्ध शक्तिपीठ है। अपनी दुर्लभ कत्यूरी कालीन मूर्तिकला और बेजोड़ पाषाण शिल्प के कारण इस स्थल को ऐतिहासिक रूप से ‘विश्वकर्मा की गुफा’ के नाम से भी ख्याति प्राप्त है।
रामायण एवं महाभारत कालीन आख्यानों में माता कोटवी का संदर्भ पौराणिक इतिहास के अनुसार माता कोटवी सहस्रबाहु असुर सम्राट बाणासुर की माता थीं। बाणासुर का प्रभाव इतना व्यापक माना गया है कि कम्बन रामायण और आनन्द रामायण जैसे प्राचीन ग्रंथों के सीता-स्वयंवर प्रसंगों में भी इस पराक्रमी राजा का उल्लेख मिलता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण एवं विष्णु पुराण में वर्णित द्वापर युग के एक प्रसंग के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण और बाणासुर के मध्य भीषण संग्राम हुआ, तब श्रीकृष्ण के अमोघ सुदर्शन चक्र से अपने पुत्र बाणासुर के प्राणों की रक्षा करने के लिए माता कोटवी रणभूमि में स्वयं ढाल बनकर उपस्थित हुई थीं। उन्होंने एक उग्र मातृशक्ति के रूप में प्रकट होकर बाणासुर के जीवन की रक्षा की थी। पिथौरागढ़ की घुंसेरा गुफा में माता कोटवी के इसी रक्षक और शक्ति-स्वरुप की आराधना सदियों से चली आ रही है।
स्कंद पुराण के मानसखण्ड में भौगोलिक एवं आध्यात्मिक प्रमाण पिथौरागढ़ क्षेत्र की ऐतिहासिकता का सबसे सशक्त शास्त्रीय प्रमाण स्कंद पुराण के मानसखण्ड के 131वें और 132वें अध्याय में मिलता है:
- अध्याय 131 (शाल्मल पर्वत एवं घुन्स्यारी देवी): महर्षि वेदव्यास मुनियों को शाल्मल पर्वत (शाल्मलाद्रि) के महात्म्य के विषय में बताते हैं। यहाँ देवगणों द्वारा पूजित ‘शतलिङ्ग’ का उल्लेख है, जिसकी पहचान आधुनिक सतसिलिंग (सातसिलिंग) और सलमोड़ा ग्राम के संगम स्थल से की जाती है। इसी क्षेत्र के ‘देवाल’ नामक पावन स्थल पर स्थित शक्ति की आराधना से समस्त दुःस्वप्नों और कष्टों के निवारण का उल्लेख है। यही शक्ति लोक-आस्था में ‘घुन्स्यारी देवी’ के रूप में पूजी जाती हैं। इसी गुहा के पार्श्व में विजय प्रदायिनी ‘वाराही देवी’ का वास भी वर्णित है।
- अध्याय 132 (श्यामा महात्म्य एवं जल-तीर्थ): इस अध्याय में शाल्मल पर्वत श्रृंखला से निकलने वाली पावन जलधाराओं का विस्तृत वर्णन है। यहाँ ‘असुरचूड़’ (असुरचूला पर्वत) से निकलने वाली ‘बासुरी’ धारा, मठगाड़, स्नानजा संगम, शमद सरोवर तथा बटकेश्वर (बटक तीर्थ) का भौगोलिक विवरण दर्ज है। अंततः श्यामा नदी का पावन सरयू में संगम होता है। पुराण के अनुसार इस संगम क्षेत्र के महात्म्य के श्रवण और दर्शन से इक्कीस कुलों के उद्धार का पुण्यफल प्राप्त होता है।
कत्यूरी शिल्पकला का अद्वितीय केंद्र: ‘विश्वकर्मा की गुफा’ गुफा के भीतर कत्यूरी शैली में गढ़ी गई प्राचीन पाषाण प्रतिमाएं मौजूद हैं। पत्थरों को तराश कर बनाई गई देवी-देवताओं की ये मूर्तियां मध्यकालीन कुमाऊं की उन्नत मूर्तिकला और स्थापत्य का प्रमाण हैं। लोक-मान्यताओं में इस गुफा के अप्रतिम शिल्प के कारण इसे ‘देवशिल्पी विश्वकर्मा’ की कृति माना गया है। स्थानीय श्रद्धालु मंदिर परिसर में एक विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा और ‘घुंघरू वाली देवी’ की उपस्थिति की अनुभूति करते हैं।
सोर घाटी के प्रमुख तीर्थों से जुड़ी आध्यात्मिक श्रृंखला घुंसेरा स्थित कोटवी मंदिर के अतिरिक्त यह पूरा क्षेत्र एक समृद्ध धार्मिक परिपथ से जुड़ा हुआ है:
- असुरचुल मंदिर: घुंसेरा के शीर्ष शिखर पर स्थित यह धाम बाणासुर के कुल और स्थानीय लोक देवता ‘असुर’ को समर्पित है, जहाँ से हिमालय की विस्तृत श्रृंखलाएं दृष्टिगोचर होती हैं।
- मोस्टामानू मंदिर: पिथौरागढ़ का यह प्रसिद्ध मंदिर न्याय और वर्षा के लोक देवता मोस्टा का मुख्य केंद्र है।
- माँ उल्का देवी मंदिर: नगर की मुख्य अधिष्ठात्री देवी के रूप में स्थापित यह शक्तिपीठ क्षेत्रीय आस्था का प्रमुख आधार है।
- थल केदार: मानसखण्ड में केदारनाथ धाम के समतुल्य फलदायी माना गया यह प्राचीन शिवालय आध्यात्मिक साधना का केंद्र है।
- नकुलेश्वर मंदिर: खजुराहो शैली के समान उत्कृष्ट नक्काशीदार मूर्तियों से सुसज्जित यह देवालय पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है।
यातायात एवं संपर्क मार्ग
- सड़क मार्ग: घुंसेरा गांव पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 5 से 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ तक पहुँचने के लिए पिथौरागढ़ नगर से स्थानीय टैक्सियाँ और निजी वाहन सुलभता से उपलब्ध हैं।
- रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन टनकपुर (दूरी लगभग 145 किमी) है, जहाँ से नियमित बस व टैक्सी सेवाओं के माध्यम से पिथौरागढ़ पहुंचा जा सकता है।
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