महाभारत विजय के ‘अदृश्य रहस्य’ वाले सिद्धपीठ में गूंजा देवभूमि का स्वर… कालकाजी गर्भगृह परिसर स्थित महादेव मंदिर में ‘आदि शक्ति माँ अवंतिका’ का हुआ ऐसा अलौकिक अनुष्ठान!

ख़बर शेयर करें

 

सतयुग की स्वयंभू ज्वाला और देवाधिदेव महाकालेश्वर के पावन दरबार में लक्ष्मण खाती व वरिष्ठ समाजसेवी वीरेंद्र कोरंगा ने कराया पुस्तक का विशेष पूजन; पुजारी श्रद्धेय जोगी ने संपन्न कराया वैदिक अनुष्ठान

नई दिल्ली / शैल शक्ति ब्यूरो

देश की राजधानी दिल्ली के दक्षिणी अंचल में स्थित अनादि सिद्धपीठ मां कालकाजी गर्भगृह परिसर स्थित देवाधिदेव महादेव (महाकालेश्वर) मंदिर में उस समय एक अद्भुत आध्यात्मिक संयोग देखने को मिला, जब महाभारत कालीन इस जागृत शक्ति-स्थल पर ऐतिहासिक शोध व आस्था के प्रतीक  पुस्तक‘आदि शक्ति माँ अवंतिका’ का विशेष वैदिक विधि-विधान से पूजन संपन्न हुआ। शिव और शक्ति के इस पावन मिलन स्थल पर पुस्तक को साक्षात देवाधिदेव महादेव के श्रीचरणों में श्रद्धापूर्वक समर्पित किया गया।

पुजारी श्रद्धेय जोगी के सानिध्य में संपन्न हुआ अनुष्ठान

इस अलौकिक अवसर पर मां अवंतिका मंदिर समिति लालकुआं के अध्यक्ष लक्ष्मण खाती तथा बिंदुखत्ता के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता वीरेंद्र कोरंगा ने कालकाजी मंदिर परिसर स्थित महादेव मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की।

  • मंदिर के मुख्य पुजारी श्रद्धेय जोगी ने पूर्ण वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधान के साथ ग्रंथ ‘आदि शक्ति माँ अवंतिका’ का पूजन संपन्न कराया।
  • पूजनोपरांत पुस्तक को महादेव जी के श्रीचरणों में समर्पित कर क्षेत्र एवं राष्ट्र के कल्याण, सुख-समृद्धि और आरोग्यता की मंगलकामना की गई।
यह भी पढ़ें 👉  महाभारत विजय का वह ‘अदृश्य रहस्य’... जहां अमृत कलश में स्पंदित है साक्षात पराशक्ति!

दर्शन व पूजन के उपरांत उपस्थित श्रद्धालुओं ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा:

“इस अनादि सिद्धपीठ और महादेव के पावन दरबार में प्रवेश करते ही एक असीम ब्रह्मांडीय ऊर्जा का अहसास होता है। यहां मां भगवती अमृत कलश के रूप में और महादेव स्वयंभू लिंग के रूप में साक्षात विराजित हैं। ‘आदि शक्ति माँ अवंतिका’ पुस्तक का यहां महादेव जी को समर्पित होना देवभूमि की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक चेतना का गौरव है।”

महाभारत विजय का रहस्य और अमृत कलश की शक्ति

यह भी पढ़ें 👉  महाभारत विजय का वह ‘अदृश्य रहस्य’... जहां अमृत कलश में स्पंदित है साक्षात पराशक्ति!

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुरुक्षेत्र के महासमर में उतरने से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में पांडवों ने विजयश्री का वरदान पाने हेतु इसी धरा पर मां भगवती कालिका और भगवान शिव की घोर तपस्या की थी।

  • अमृत कलश स्वरूप: मंदिर के अष्टकोणीय गर्भगृह में मां किसी साधारण प्रतिमा में नहीं, बल्कि ‘पवित्र अमृत कलश’ के रूप में संगमरमर की छतरी और रजत पत्रों के मध्य प्रतिष्ठित हैं।
  • महाकालेश्वर स्वयंभू शिवलिंग: परिसर में स्थित महादेव का स्वयंभू शिवलिंग शिव-शक्ति के शाश्वत संतुलन और भक्ति साधना का परम केंद्र है।

कालिका पुराण की दृष्टि में पराशक्ति का स्वरूप

कालिका पुराण के अनुसार, शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज के संहार हेतु मां पार्वती के ललाट से जो संहारक तेज प्रकट हुआ, वही महाकाली कहलाईं। मां काली केवल दुष्टों का दलन करने वाली ही नहीं, अपितु शरणागत भक्तों के लिए परम वात्सल्यमयी व मोक्षदायिनी हैं।

यह भी पढ़ें 👉  अभेद्य चक्रव्यूह के पार लोकतंत्र का अलौकिक आलोक: जब राष्ट्र की सर्वोच्च पीठ के गर्भगृह में पहुंचे लालकुआं के प्रतिनिधि

कल्याणकारी महाकाली मंत्र

बीज मंत्र: ॥ ॐ क्रीं कालिकायै नमः ॥

विजय व रक्षा स्तुति: ॥ ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥

ऐतिहासिक वैभव एवं वास्तुकला

  • सिद्ध परंपरा: सिद्ध संत बाबा बालक नाथ जी के तपोबल से जागृत इस धाम का जीर्णोद्धार 18वीं-19वीं शताब्दी में राजा केदारनाथ द्वारा कराया गया।
  • अष्टकोणीय संरचना: लाल बलुआ पत्थर, श्वेत संगमरमर और काले झांवा पत्थरों से निर्मित यह 8 कोनों वाला मंदिर असीम ब्रह्मांडीय ऊर्जा का संचार करता है।
  • मुंडन संस्कार की महत्ता: यह स्थल नवजात शिशुओं के मुंडन व रक्षा सूत्र अर्पण हेतु देशभर में विशेष ख्याति प्राप्त है।
ADVERTISEMENTS Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad