
रावण की वह खौफनाक चाल जो उसी पर पड़ी भारी: जानिए माता कौशल्या के हरण का सच
रामायण की कथाओं में लंकापति रावण द्वारा माता सीता के हरण का प्रसंग सर्वविदित है। इसी घटना ने रावण के अंत और राम-रावण युद्ध की नींव रखी थी। लेकिन, बहुत कम लोग यह जानते हैं कि सीता हरण से वर्षों पूर्व, अपनी मृत्यु को टालने के लिए रावण ने एक और खौफनाक साजिश रची थी। ‘आनंद रामायण’ के पन्नों में दर्ज यह कथा बताती है कि कैसे रावण ने स्वयं अपने विनाश की पटकथा लिखी थी।
काल का भय और भगवान शंकर की आराधना
तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने वाला परम प्रतापी और मायावी रावण भी मृत्यु के भय से अछूता नहीं था। अपनी शक्ति के अहंकार में चूर होने के बावजूद, वह जानता था कि विधि का विधान अत्यंत बलवान है। अपनी मृत्यु को टालने और अमरता प्राप्त करने की लालसा में, रावण ने अपने इष्टदेव भगवान शिव (शंकर) की घोर आराधना की। वह चाहता था कि महादेव उसे अजेय होने का वरदान दें।
इसी क्रम में उसे यह ज्ञात हुआ (कुछ कथाओं में ब्रह्मा जी द्वारा) कि उसकी मृत्यु का कारण कोई और नहीं, बल्कि अयोध्या के राजा दशरथ और कौशल देश की राजकुमारी कौशल्या की होने वाली संतान होगी। यह भविष्यवाणी रावण के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं थी।
आनंद रामायण (सारकाण्ड) में वर्णित महाराज दशरथ और माता कौशल्या के विवाह की यह कथा बहुत ही अद्भुत और रोमांचित करने वाली है। यह कथा मुख्य रूप से इस बात को प्रमाणित करती है कि ‘विधि का विधान’ (नियति) कोई नहीं बदल सकता, चाहे वह तीनों लोकों का विजेता रावण ही क्यों न हो।
यहाँ उस पूरी कथा का विस्तृत वर्णन है:
रावण का भय और ब्रह्मा जी की भविष्यवाणी
लंकानरेश रावण ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी और शिव जी से कई वरदान प्राप्त कर लिए थे। उसने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी, लेकिन मृत्यु का भय उसे हमेशा सताता रहता था। एक दिन वह ब्रह्मलोक पहुंचा और ब्रह्मा जी से पूछा, “हे पितामह! मेरी मृत्यु किस प्रकार और किसके हाथों लिखी है?”
ब्रह्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “दशानन! अयोध्या के राजा अजा के पुत्र दशरथ और कोसल देश के राजा सुकोशल की पुत्री कौशल्या का विवाह होगा। उन दोनों के मिलन से चार पुत्र जन्म लेंगे, जिनमें से सबसे बड़े पुत्र का नाम ‘राम’ होगा। वही राम तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगा।”
रावण का षड्यंत्र और दशरथ पर आक्रमण
अपनी मृत्यु की ऐसी स्पष्ट भविष्यवाणी सुनकर रावण कांप उठा। उसने सोचा कि यदि दशरथ और कौशल्या का विवाह ही न हो, तो राम का जन्म ही नहीं होगा। उसने तुरंत अपनी सेना को दो हिस्सों में बांटा।
सबसे पहले रावण ने अयोध्या के राजकुमार दशरथ पर हमला करने की योजना बनाई। उस समय दशरथ अपने मंत्री सुमंत्र के साथ गंगा (या समुद्र) में नौका विहार कर रहे थे। रावण ने भयंकर आंधी और तूफान उत्पन्न कर दिया और उनकी नाव को नष्ट कर दिया। रावण को लगा कि दशरथ मारे गए, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। महाराज दशरथ और मंत्री सुमंत्र नाव के एक टूटे हुए तख्ते (लकड़ी के टुकड़े) के सहारे बहते हुए एक सुनसान द्वीप पर जा पहुंचे।
कौशल्या का अपहरण और संदूक का रहस्य
इधर, रावण ने राक्षसों की दूसरी टुकड़ी को कोसल देश भेजा। वहां सुकोशल अपनी पुत्री कौशल्या के विवाह की तैयारी कर रहे थे। रावण ने वहां हमला किया और राजकुमारी कौशल्या का अपहरण कर लिया।
रावण ने कौशल्या को एक मजबूत लकड़ी के संदूक (मंजूषा) में बंद कर दिया। रावण कौशल्या को मारना नहीं चाहता था (क्योंकि स्त्री हत्या का पाप लगता), इसलिए उसने उस संदूक को समुद्र में फेंक दिया। उसने ‘तिमिंगल’ (एक अत्यंत विशालकाय समुद्री जीव/मछली) को आदेश दिया कि वह उस संदूक को निगल ले और उसे सुरक्षित रखे, ताकि किसी को वह संदूक न मिल सके।
नियति का खेल और द्वीप पर मिलन
कुछ समय बाद, उस विशाल मछली को घबराहट महसूस हुई और वह उसी सुनसान द्वीप के किनारे आ गई जहां दशरथ और सुमंत्र मौजूद थे। मछली ने उस संदूक को उगल दिया और वापस समुद्र में चली गई।
दशरथ और सुमंत्र ने किनारे पर एक सुंदर संदूक देखा। जब उन्होंने उत्सुकतावश उसे खोला, तो भीतर एक अत्यंत सुंदर कन्या को भयभीत अवस्था में पाया। महाराज दशरथ ने जब उसका परिचय पूछा, तो कन्या ने रोते हुए बताया, “मैं कोसल नरेश की पुत्री कौशल्या हूं। मुझे रावण ने यहाँ कैद कर दिया है।” दशरथ ने भी अपना परिचय दिया।
मंत्री सुमंत्र, जो बहुत ज्ञानी थे, तुरंत समझ गए कि ब्रह्मा जी की भविष्यवाणी सच हो रही है। उन्होंने कहा, “महाराज! यह विधि का विधान है। आप दोनों को अग्नि को साक्षी मानकर यहीं विवाह कर लेना चाहिए।”
द्वीप पर ही लकड़ियाँ जलाकर, सुमंत्र के मंत्रोच्चारण के साथ दशरथ और कौशल्या का गंधर्व विवाह संपन्न हुआ। इसके बाद, अपनी सुरक्षा के लिए दशरथ, कौशल्या और सुमंत्र—तीनों उसी संदूक में छिपकर बैठ गए और संदूक को भीतर से बंद कर लिया।
ब्रह्मा जी की सभा में रावण का अहंकार
इधर रावण अहंकार से भरकर सीधा ब्रह्मलोक पहुंचा। उसने अट्टहास करते हुए ब्रह्मा जी से कहा, “पितामह! आपकी भविष्यवाणी झूठी साबित हुई। मैंने दशरथ को समुद्र में डुबो कर मार डाला है और कौशल्या को एक संदूक में बंद करके तिमिंगल मछली के पेट में सुरक्षित करवा दिया है। अब राम का जन्म कैसे होगा?”
ब्रह्मा जी शांत भाव से मुस्कुराए और बोले, “रावण, तुम अज्ञानी हो। विधि का लिखा कोई मिटा नहीं सकता। दशरथ और कौशल्या का विवाह हो चुका है। यदि विश्वास न हो, तो वह संदूक मँगवा कर देख लो।”
रावण का मान-मर्दन
रावण ने क्रोधित होकर तुरंत तिमिंगल मछली को बुलाया और संदूक लेकर ब्रह्मलोक वापस आया। भरी सभा में जब रावण ने वह संदूक खोला, तो सभी देवता और रावण स्वयं स्तब्ध रह गए। संदूक के भीतर माता कौशल्या के साथ महाराज दशरथ और मंत्री सुमंत्र बैठे हुए थे।
रावण का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने अपनी तलवार निकाल ली और तीनों का वध करने के लिए आगे बढ़ा। तभी ब्रह्मा जी ने उसे रोकते हुए कहा, “दशानन! रुक जाओ। यह नियति है। यदि तुम आज इन्हें मार भी दोगे, तो भगवान विष्णु किसी अन्य रूप में, किसी अन्य माता-पिता के घर जन्म लेकर तुम्हारा वध करेंगे। व्यर्थ में स्त्री और राजा की हत्या का पाप अपने सिर मत लो।”
अयोध्या वापसी और राम जन्म की नींव
रावण समझ गया कि भगवान की माया और काल के चक्र को जीतना असंभव है। हताश और निराश होकर उसने अपनी तलवार म्यान में रख ली। ब्रह्मा जी के आदेश पर रावण ने महाराज दशरथ, माता कौशल्या और मंत्री सुमंत्र को सकुशल छोड़ दिया।
वे तीनों सम्मानपूर्वक अयोध्या लौटे। अयोध्या में महाराज दशरथ और माता कौशल्या का पुनः पूरे राजसी ठाठ-बाट और वैदिक रीति-रिवाजों के साथ विवाह हुआ। और फिर कालांतर में, इसी पवित्र बंधन से भगवान श्री राम ने जन्म लिया, जिन्होंने अंततः रावण के अत्याचारों से संसार को मुक्त किया।
आनंद रामायण की यह कथा रामायण के सबसे अनूठे प्रसंगों में से एक है।
लेटैस्ट न्यूज़ अपडेट पाने हेतु -
👉 वॉट्स्ऐप पर हमारे समाचार ग्रुप से जुड़ें
