❝घृत कमल में लीन हुए जागनाथ :शीत में तप, घी में समाधि; एक माह बाद खुलेंगे शिव के दिव्य द्वार❞

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अल्मोड़ा जनपद स्थित जागेश्वर धाम में मकर संक्रांति के पावन अवसर पर सदियों पुरानी अद्भुत परंपरा के साक्षी बने हजारों श्रद्धालु, जब भगवान जागनाथ (महादेव शिव) शुद्ध गाय के घी से निर्मित घृत कमल की गुफा में साधनारत हो गए। जैसे-जैसे जागेश्वर की घाटियों में भीषण शीत बढ़ती है, नदी-नाले जमने लगते हैं और पाले की चादर बिछ जाती है वैसे ही माघ एक गते को महादेव एक माह के लिए घी की गुफा में समाधिस्थ हो जाते हैं।
 जागेश्वर मंदिर प्रांगण में वेद मंत्रोच्चार, स्वस्ति वाचन और अग्नि प्रज्ज्वलन के साथ घृत कमल निर्माण की विधि आरंभ हुई। मंदिर समिति, श्रद्धालुओं और पुरोहितों के सहयोग से लगभग 251 किलोग्राम शुद्ध गाय के घी की व्यवस्था की गई। बड़े-बड़े बगौनों में घी को पिघलाकर शुद्ध किया गया और फिर उसे शीतल जटागंगा के जल में ठंडा कर ठोस रूप दिया गया। दोपहर तक घृत कमल तैयार हुआ और विधिवत पूजा-अर्चना के पश्चात ज्योतिर्लिंग बाबा को घी की गुफा के आवरण में विराजमान किया गया। पूरे क्षेत्र में भक्ति और रहस्य का अद्भुत संगम दिखाई दिया।

एक माह तक घृत कमल स्वरूप में पूजा

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मंदिर के पुरोहितों के अनुसार, अब फाल्गुन एक गते तक भगवान शिव का पूजन घृत कमल स्वरूप में ही होगा। इस अवधि में देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु जागेश्वर धाम पहुंचकर इस दुर्लभ दर्शन के साक्षी बनते हैं। फाल्गुन एक गते को महादेव घी के आवरण से बाहर प्रकट होंगे। तत्पश्चात घृत कमल का घी प्रसाद के रूप में वितरित किया जाएगा जिसे सेवन नहीं किया जाता, बल्कि श्रद्धालु उसे शिरोधार्य करते हैं।

महामण्डलेश्वर श्री कैलाशानन्द महाराज ने कहा
“जागेश्वर धाम में घृत कमल की परंपरा केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और तपस्या के साथ शिव के अद्वैत का प्रतीक है। शीत की चरम अवस्था में महादेव का घी की गुफा में साधनारत होना यह संदेश देता है कि तप, संयम और करुणा से ही जीवन का कल्याण संभव है। घृत कमल शुद्धता का प्रतीक है यह शरीर नहीं, भाव को शुद्ध करता है। जो श्रद्धालु इस काल में जागनाथ के दर्शन करते हैं, उनके अंतःकरण में शांति और वैराग्य का उदय होता है।”
आस्था, परंपरा और रहस्य का संगम
यह समस्त धार्मिक अनुष्ठान महामण्डलेश्वर श्री कैलाशानन्द महाराज एवं जागेश्वर धाम के पुरोहितों की अगुवाई में विधिवत संपन्न हुआ। जागेश्वर धाम की यह अनूठी परंपरा आस्था, रहस्य और सनातन संस्कृति की गहन साधना को जीवंत करती है जहाँ घी में गुफा बनती है और शिव समाधि में लीन होकर भक्तों को आत्मिक आलोक प्रदान करते हैं।

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घृत कमल का औषधीय व आध्यात्मिक महत्व

जागेश्वर धाम में निर्मित घृत कमल केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि आयुर्वेदिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है। शुद्ध देशी गाय का घी आयुर्वेद में सात्त्विक, ओजवर्धक और त्रिदोषनाशक माना गया है। हिमालयी क्षेत्र की कठोर ठंड में यह घी प्राकृतिक रूप से जमकर एक विशिष्ट संरचना ग्रहण करता है, जिससे इसके औषधीय गुण और अधिक प्रभावी हो जाते हैं।
मान्यता है कि फाल्गुन एक गते को वितरित किया जाने वाला यह घी सिरदर्द, माइग्रेन, नेत्र विकार, मानसिक तनाव एवं शीतजन्य रोगों में लाभकारी होता है। परंपरा अनुसार इस घी का सेवन नहीं किया जाता, बल्कि इसे ललाट अथवा शिर पर धारण किया जाता है, जिससे यह स्नायु तंत्र को शांति प्रदान करता है और मन में स्थिरता लाता है।
आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार, वेदमंत्रों के उच्चारण, अग्नि संस्कार और जटागंगा के अत्यंत शीतल जल से शुद्ध होकर बना यह घृत कमल ऊर्जा-परिवर्तित (Energised) माना जाता है। इसी कारण इसे सामान्य घी से अलग, औषधीय प्रसाद का स्थान प्राप्त है।
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि जागनाथ के तपोमय सान्निध्य में रहने से यह घी दैहिक रोगों के साथ-साथ मानसिक क्लेश और नकारात्मक ऊर्जा को भी शांत करता है, यही कारण है कि सदियों से यह परंपरा अक्षुण्ण चली आ रही है।

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