“संस्कारों की विरासत से संघर्ष तक: हरेन्द्र सिंह बोरा : जनसेवा का जीवंत प्रतीक”
लालकुआँ। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं समाजसेवी हरेन्द्र सिंह बोरा आज केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि संघर्ष, सेवा और संस्कार की जीवंत मिसाल हैं। 1962 में नवाड़ खेड़ा, गौलापार में जन्मे हरेन्द्र बोरा को जनसेवा की प्रेरणा अपने माता-पिता से विरासत में मिली। उनके पिता स्वर्गीय श्री गणेश सिंह बोरा और माता स्वर्गीय श्रीमती राधिका बोरा ने अपने जीवन को समाज के लिए समर्पित कर दिया था, जिनके आदर्श आज भी हरेन्द्र बोरा के कार्यों में स्पष्ट दिखाई देते हैं।
स्वर्गीय श्री गणेश सिंह बोरा क्षेत्र के विराट व्यक्तित्व के धनी थे। जनता के अपार प्रेम और विश्वास के चलते वे नवाड़ खेड़ा, गौलापार ग्राम सभा से लगातार 20 वर्षों तक ग्राम प्रधान रहे तथा नवाड़खेड़ा–देवला मल्ला क्षेत्र से 5 वर्षों तक क्षेत्र पंचायत सदस्य रहे। जिस दौर में गौलापार क्षेत्र में बसने से लोग भयभीत रहते थे, उस समय उन्होंने लोककल्याण के उद्देश्य से यहां भूमि लेकर स्वयं बसने का साहस दिखाया और दूसरों को भी खेती-बाड़ी व बसावट के लिए प्रेरित किया। जहरीले सांप, मच्छर और जंगली जानवरों के बीच उन्होंने सैकड़ों परिवारों को सहारा दिया, उनका संघर्ष आज भी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
इन्हीं संस्कारों की नींव पर खड़े होकर हरेन्द्र सिंह बोरा ने 1981 में एम.बी.पी.जी. कॉलेज से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की। वे कॉलेज में जॉइंट सेक्रेटरी बने और 1984 में छात्र संघ अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित हुए। इसके बाद जिला पंचायत चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने पर जनता के अपार विश्वास से वे गौलापार–चोरगलिया क्षेत्र से जिला पंचायत सदस्य चुने गए। आज वे प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य के रूप में लगातार सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन में उनकी भागीदारी उल्लेखनीय रही। बिन्दुखत्ता को राजस्व गांव का दर्जा दिलाने की लड़ाई हो या लालकुआँ के मालिकाना हक का सवाल, हरेन्द्र बोरा आज भी मुखर और अडिग आवाज बने हुए हैं। उनका संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और जनहित से जुड़ा हुआ है।
हरेन्द्र बोरा की पत्नी श्रीमती मीना बोरा, जो निर्मला कॉन्वेंट की सेवानिवृत्त शिक्षिका हैं, स्वयं सामाजिक और आध्यात्मिक कार्यों में सक्रिय रहती हैं। वे गरीबों के सुख-दुख में सहभागी बनकर समाज सेवा को अपना धर्म मानती हैं। यह दंपत्ति जनकल्याण को अपने जीवन का उद्देश्य मानता है।
मूल रूप से निरई, विकासखंड लमगाड़ा, जिला अल्मोड़ा से संबंध रखने वाले हरेन्द्र बोरा की पहचान एक संघर्षशील, संवेदनशील और जनप्रिय नेता के रूप में बनी है। उनके दादा-परदादा स्वर्गीय श्री महेन्द्र सिंह और शेर सिंह थोकदार का नाम भी क्षेत्र में सम्मान के साथ लिया जाता है, जो उनके वंश की गौरवशाली परंपरा को दर्शाता है।
2012 और 2017 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने भाग लिया। भले ही उन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन जनता के दिलों में उन्होंने जो विश्वास और सम्मान अर्जित किया, वही उनकी सबसे बड़ी जीत है। आज वे आने वाले चुनावों के लिए पूरी सजगता और विश्वास के साथ तैयार हैं। उन्हें दृढ़ भरोसा है कि इस बार जनता का आशीर्वाद अवश्य मिलेगा।
पारिवारिक जटिलताओं और जीवन की भारी विपत्तियों के बीच भी हरेन्द्र सिंह बोरा कभी अपने जनसेवा के संकल्प से विचलित नहीं हुए। लोगों के दुख-दर्द में खड़ा रहना, जरूरतमंदों की सहायता करना और समाज को नई दिशा देना ही उनका जीवन ध्येय है।
वास्तव में, हरेन्द्र सिंह बोरा केवल एक नेता नहीं, बल्कि संस्कारों की विरासत को संघर्ष के पथ पर आगे बढ़ाने वाले जनसेवा के सच्चे साधक हैं जिनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का दीपस्तंभ है।
“कोरोना काल में सेवा की अतुलनीय मिसाल रहे : हरेन्द्र सिंह बोरा”
कोरोना महामारी का समय मानवता के लिए एक कठिन परीक्षा था। भय, असहायता और अनिश्चितता के उस दौर में जब कई लोग अपने-अपने घरों में सिमट गए थे, वहीं कुछ ऐसे व्यक्तित्व भी सामने आए जिन्होंने सेवा को अपना धर्म बना लिया। हरेन्द्र सिंह बोरा उन्हीं विरले व्यक्तियों में से एक हैं, जिनकी सेवा उस संकट काल में अतुलनीय, अनुकरणीय और अविस्मरणीय रही।
जब लॉकडाउन के कारण रोज़गार ठप हो गए, मजदूर, बुज़ुर्ग, महिलाएं और बच्चे भुखमरी के कगार पर पहुँच गए, तब हरेन्द्र बोरा ने बिना किसी प्रचार और बिना किसी स्वार्थ के जरूरतमंदों तक सहायता पहुँचाने का संकल्प लिया। उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर राशन वितरण, दवाइयों की व्यवस्था और जरूरतमंद परिवारों को आर्थिक सहयोग प्रदान किया। अनेक ऐसे परिवार थे जिनके घर चूल्हा जलना बंद हो गया था, वहां उनकी पहल से फिर से जीवन की लौ जली।
बीमारों और बुज़ुर्गों के लिए उन्होंने दवा, ऑक्सीजन सिलेंडर और चिकित्सा परामर्श की व्यवस्था में भी सक्रिय भूमिका निभाई। कई बार स्वयं जोखिम उठाकर संक्रमित क्षेत्रों में जाकर जरूरतमंदों की सहायता करना, उनके हालचाल पूछना और उन्हें मानसिक संबल देना उनकी संवेदनशीलता का जीवंत प्रमाण रहा। उस समय उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा नेता वही होता है जो संकट में जनता के साथ खड़ा हो, न कि केवल मंचों से भाषण दे।
कोरोना काल में सामाजिक दूरी आवश्यक थी, लेकिन हरेन्द्र बोरा ने मानवीय निकटता बनाए रखी। वे पीड़ित परिवारों से फोन पर लगातार संपर्क में रहे, युवाओं को सेवा कार्यों के लिए प्रेरित किया और एक स्वयंसेवी समूह की तरह समन्वय बनाकर राहत कार्यों को गति दी। उन्होंने प्रशासन के साथ समन्वय कर जरूरतमंदों तक सहायता पहुँचाने में सेतु की भूमिका निभाई।
इस महामारी ने कई परिवारों से उनके अपने छीन लिए। ऐसे दुखद क्षणों में हरेन्द्र बोरा शोकाकुल परिवारों के साथ खड़े रहे, उन्हें ढांढस बंधाया और हरसंभव सहायता का भरोसा दिलाया। उनका यह मानवीय स्पर्श पीड़ितों के लिए दवा से कम नहीं था।
कोरोना काल की यह सेवा केवल सहायता तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह उनके जीवन मूल्यों और संस्कारों की सच्ची परीक्षा भी थी — जिसमें वे पूरी तरह खरे उतरे। माता-पिता से प्राप्त सेवा, करुणा और समर्पण के संस्कार उन्होंने इस संकट में जीवंत कर दिखाए।
निस्संदेह, कोरोना काल में हरेन्द्र सिंह बोरा की सेवा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी। यह अध्याय उनके जीवन की उस उज्ज्वल गाथा का प्रतीक है, जिसमें मानवता सर्वोपरि रही और सेवा ही सबसे बड़ा धर्म बनी।
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