देवभूमि का अद्भुत रहस्य: जहाँ महादेव ने अपने विवाह से पूर्व की थी भगवान गणेश की आराधना

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​उत्तराखंड की पावन देवभूमि अपने आंचल में अनगिनत पौराणिक और आध्यात्मिक रहस्य समेटे हुए है। इन्हीं रहस्यों में से एक है जनपद अल्मोड़ा का ‘गण पर्वत’ (गणानाथ पर्वत)। यह वही पवित्र स्थान है, जहाँ त्रिलोकीनाथ भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह करने से पूर्व, अपने कार्यों को निर्विघ्न संपन्न करने के लिए प्रथम पूज्य श्री गणेश जी की आराधना की थी।
​आज अल्मोड़ा मुख्यालय से 45 किलोमीटर दूर ताकुला और रनमन की सुरम्य पहाड़ियों के मध्य स्थित यह महान आध्यात्मिक केंद्र अपनी बदहाली की दास्तां बयां कर रहा है, जबकि शास्त्रों में इसकी महिमा स्वयं महादेव ने गाई है।

​स्कंद पुराण में उद्घाटित है गण पर्वत का रहस्य

​इस अलौकिक रहस्य का विस्तारपूर्वक वर्णन महर्षि वेदव्यास जी ने स्कंद पुराण के मानस खंड के 68वें अध्याय में किया है। कथा के अनुसार, जब अनेक ऋषि-मुनियों ने महर्षि व्यास जी से जानना चाहा कि देवों के देव महादेव ने गण पर्वत पर श्री गणेश का पूजन किस उद्देश्य से किया था, तब व्यास जी ने इस गूढ़ रहस्य से पर्दा उठाया।

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​तारकासुर का आतंक और शिव का संकल्प

​कथा की पृष्ठभूमि माता सती के देह त्याग और उनके माता पार्वती (गिरिजा) के रूप में पुनर्जन्म से जुड़ी है।

​देवताओं की चिंता: उस कालखंड में तारकासुर नामक दैत्य का घोर आतंक था। त्रस्त होकर देवराज इंद्र और ब्रह्मा जी सहित सभी देवता भगवान शिव की शरण में गए।

​कामदेव का भस्म होना: शिव उस समय गहन समाधि में लीन थे। उनका ध्यान भंग करने के लिए देवताओं ने कामदेव को भेजा। शिव के कोप से कामदेव भस्म हो गए, परंतु उनकी पत्नी रति की करुण पुकार सुनकर महादेव ने वरदान दिया कि द्वापर युग में कामदेव भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र ‘प्रद्युम्न’ के रूप में जन्म लेंगे और शंबरासुर का वध कर पुनः रति से मिलन प्राप्त करेंगे।

​विवाह की स्वीकृति: देवताओं के अनुनय-विनय और तारकासुर के वध (जो केवल शिव-पुत्र द्वारा ही संभव था) के लिए भगवान शिव ने देवी गिरिजा से विवाह करने की स्वीकृति दे दी।

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​गण पर्वत पर प्रथम पूज्य की वंदना

जब भगवान शिव विवाह के लिए राजा हिमाचल के घर की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब उनके प्रमुख गणों ने सुझाव दिया कि विवाह में कोई विघ्न न आए, इसके लिए गणाध्यक्ष भगवान गणेश जी का पूजन किया जाना चाहिए।

​विश्वकर्मा द्वारा प्रतिमा का निर्माण: महादेव को यह सुझाव अत्यंत प्रिय लगा। देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने इसी गण पर्वत के अग्रभाग पर श्री गणेश जी की एक अत्यंत भव्य और दिव्य प्रतिमा का निर्माण किया।

​महादेव द्वारा पूजन: स्वयं महादेव ने गण पर्वत पर रुककर उस प्रतिमा को प्रणाम किया और अपने विवाह की निर्विघ्न पूर्णता के लिए भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की।

पूजन का महात्म्य और वर्तमान स्थिति

महर्षि व्यास जी के अनुसार, इस लोक में मनुष्यों के समक्ष आने वाली हर बाधा को दूर करने का मार्ग इसी पर्वत से होकर जाता है।

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​गणेश पूजा की अनिवार्यता: श्री गणेश की वंदना के बिना भगवान शंकर की पूजा भी व्यर्थ मानी जाती है। जो भी भक्त गंध, पुष्प, अक्षत, दूर्वा और धूप से गणानाथ जी का पूजन करता है, वह समस्त सांसारिक दुःखों से मुक्त हो जाता है।
​गणिकेश और गिरिजा का वास: यहाँ ‘गणिकेश’ के रूप में स्वयं भगवान शिव और माता गिरिजा देवी का भी पूजन किया जाता है, जिसके दर्शन मात्र से सत्यलोक की प्राप्ति होती है।
​सनातन काल से पूजनीय कुमाऊं की धरती पर स्थित यह गणानाथ मंदिर आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। हालांकि, पर्वतों में प्रथम पूज्य इस स्थान को आज जिस संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता है, उसका अभाव इसकी वर्तमान बदहाली में स्पष्ट झलकता है। इस पावन धरोहर को सहेजना हम सभी का दायित्व है।

लेखक: रमाकान्त पन्त

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