रामनगर के घने जंगलों में छिपा त्रेता युग का अद्भुत रहस्य

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रहस्यमयी सीतावनी: जहाँ आज भी जंगल की निस्तब्धता में सुनाई देती हैं माता सीता की पदचापें

उत्तराखण्ड की देवभूमि में ऐसे अनेक स्थल हैं, जहाँ प्रकृति और अध्यात्म एक-दूसरे में विलीन होकर किसी अलौकिक लोक का आभास कराते हैं। इन्हीं रहस्यमयी स्थलों में एक है रामनगर के घने जंगलों के बीच स्थित सीतावनी  एक ऐसा पवित्र वन, जहाँ आज भी त्रेता युग की स्मृतियाँ हवा में तैरती प्रतीत होती हैं।

रामनगर से लगभग 22 किलोमीटर दूर फैला यह वन क्षेत्र आज कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के रहस्यमयी अंचल का हिस्सा है। यहाँ दिन के उजाले में भी बाघों की दहाड़, जंगली हाथियों की चिंघाड़ और घने साल व शीशम के वृक्षों की भयावह निस्तब्धता किसी भी यात्री के मन में रोमांच और भय दोनों भर देती है। किंतु इसी वन की गहराइयों में एक ऐसा दिव्य रहस्य छिपा है, जो केवल जंगल की कहानी नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की जीवित धरोहर है।

कहा जाता है कि यह वही स्थान है जहाँ वनवास काल के दौरान माता सीता ने कुछ समय निवास किया था। यहीं उन्होंने भगवान शिव की आराधना की, और यहीं आज भी “रामधारा” तथा “सीताधारा” के रूप में वे पावन जलधाराएँ प्रवाहित होती हैं, जिनका वर्णन पुराणों में मिलता है।

स्कंदपुराण के पन्नों में दर्ज है सीतावनी का रहस्य

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पुराणों की दृष्टि से देखें तो सीतावनी केवल लोककथा नहीं, बल्कि शास्त्रीय प्रमाणों से प्रतिष्ठित एक प्राचीन तीर्थ है। स्कंदपुराण के मानसखंड में इस स्थान का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है।

पुराण में उल्लेख है कि कोसी नदी के बाईं ओर “शेषगिरि” नामक एक विशाल और पवित्र पर्वत स्थित था। यह पर्वत इतना रमणीय और दिव्य था कि इसकी तुलना स्वयं हिमालय से की गई। उस समय भी यह क्षेत्र हिंसक पशुओं—सिंहों, जंगली सूअरों और भैंसों—का निवास माना जाता था।

इसी पर्वत से “सीता” नामक पवित्र नदी निकलती थी, जो आगे चलकर कौशिकी अर्थात कोसी नदी में मिलती थी। दोनों नदियों के मध्य एक दिव्य अशोकवाटिका थी, जहाँ सप्तर्षियों और महान तपस्वियों के आश्रम स्थित थे। घने वृक्षों, पुष्पों की सुगंध और पक्षियों के कलरव से युक्त यह क्षेत्र किसी स्वर्गिक लोक जैसा प्रतीत होता था।

जब वनवास के दौरान यहाँ पहुँचे श्रीराम, सीता और लक्ष्मण

स्कंदपुराण के अनुसार, महर्षि विश्वामित्र के निर्देश पर भगवान श्रीराम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण इस पवित्र वन में आए थे।

जब माता सीता ने कोसी नदी के निर्मल जल से सिंचित उस मनोरम अशोकवाटिका को देखा, तो वे उसकी सुंदरता पर मोहित हो उठीं। पुराणों में वर्णित है कि उन्होंने भगवान राम से कहा—

 “हे महाबाहो! मैं आपके साथ वैशाख मास में इसी पवित्र वन में निवास करना चाहती हूँ और कौशिकी के पावन जल में स्नान करूँगी।”

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भगवान राम ने उनकी यह इच्छा सहर्ष स्वीकार कर ली। तभी से यह वन “सीतावनी” कहलायाअर्थात वह वन जहाँ माता सीता ने निवास किया।

जंगल में प्रकट हुईं अमृतधाराएँ

सीतावनी की सबसे रहस्यमयी कथा उस समय की है, जब वैशाख मास का स्नान पूर्ण होने के बाद माता सीता तराई क्षेत्र की ओर जा रही थीं। घने जंगल और तपती धूप के बीच उन्हें तीव्र प्यास लगी। आसपास कहीं जल नहीं था।

तब भगवान राम ने गंगा का स्मरण किया और माता सीता ने कौशिकी नदी का ध्यान किया। कहते हैं कि उसी क्षण धरती फटी और वहाँ दो पवित्र जलधाराएँ फूट पड़ीं। जंगल के मध्य अचानक प्रकट हुई वे जलधाराएँ किसी चमत्कार से कम नहीं थीं।

माता सीता ने उस अमृततुल्य जल से अपनी प्यास बुझाई और वहीं भगवान शिव का रुद्राभिषेक कर एक शिवलिंग स्थापित किया। तभी से वह शिवलिंग “सीतेश्वर महादेव” के नाम से पूजित हुआ।

आज भी सीतावनी क्षेत्र में स्थित सीतेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। स्थानीय मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने वाले भक्तों के सारे कष्ट और शोक दूर हो जाते हैं।

महाभारत में भी मिलता है उल्लेख

केवल स्कंदपुराण ही नहीं, बल्कि महाभारत के वनपर्व में भी “सीतावन” तीर्थ का उल्लेख मिलता है। ग्रंथ में कहा गया है कि जो मनुष्य श्रद्धा और नियमपूर्वक इस तीर्थ की यात्रा करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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यह उल्लेख इस स्थान की प्राचीनता और धार्मिक महत्ता को और भी अधिक प्रमाणित करता है।

जहाँ जंगल की निस्तब्धता में आज भी जीवित है त्रेता युग

आज सीतावनी आने वाला प्रत्येक यात्री केवल एक पर्यटन स्थल नहीं देखता, बल्कि वह एक ऐसे रहस्यमयी संसार में प्रवेश करता है जहाँ प्रकृति और अध्यात्म एकाकार हो जाते हैं।

घने जंगलों के बीच बहती हवा, कोसी नदी की ध्वनि, मंदिर की घंटियाँ और पक्षियों का मधुर स्वर मानो यह अनुभव कराते हैं कि यहाँ समय ठहर गया है। ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी क्षण माता सीता की पदचाप फिर सुनाई दे जाएगी, या भगवान राम की धनुषध्वनि जंगलों में गूंज उठेगी।

आज भी हजारों श्रद्धालु और साधक सीतावनी पहुँचकर “रामधारा” और “सीताधारा” में स्नान करते हैं तथा सीतेश्वर महादेव के दर्शन कर आध्यात्मिक शांति प्राप्त करते हैं।

यह रहस्यमयी वन केवल इतिहास या पुराणों की कथा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और सनातन चेतना का एक जीवंत अध्याय है—एक ऐसा अध्याय, जो आज भी देवभूमि उत्तराखण्ड की पवित्र वादियों में साँस ले रहा है।

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